इंटरनेट का अपना संसार बनाता ईरान

बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्विपक्षीय संबंधों को गति देने ईरान पहुंचे थे। संयोग से, उस समय मैं भी वहां था, और मैंने महसूस किया कि ईरान में आप इंटरनेट का पूरा उपयोग नहीं कर सकते। वहां सोशल...

इंटरनेट का अपना संसार बनाता ईरान

बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्विपक्षीय संबंधों को गति देने ईरान पहुंचे थे। संयोग से, उस समय मैं भी वहां था, और मैंने महसूस किया कि ईरान में आप इंटरनेट का पूरा उपयोग नहीं कर सकते। वहां सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर मनाही है। हालांकि अभी तक भले ही वहां के लोग इंटरनेट के माध्यम से ‘ग्लोबल वल्र्ड’ से न जुड़ सके हों, मगर मुल्क के अंदर वे आपस में बखूबी जुड़े हुए हैं। 93 फीसदी साक्षरता दर वाले इस देश में मोबाइल की पेनिटे्रशन यानी सक्रिय मोबाइल उपभोक्ताओं की दर 120 फीसदी है। वहां इंटरनेट पेनिट्रेशन 73 फीसदी है और इंटरनेट पर मौजूद 40 फीसदी सामग्री स्थानीय स्तर पर ही गढ़ी गई है।

मैं जब क्राउड-सोर्सिंग वीक द्वारा आयोजित कांफ्रेंस में भाग लेने राजधानी तेहरान पहुंचा, तो मुझे ईरान के बारे में कुछ नहीं पता था। एयरपोर्ट पर न तो वाई-फाई की सुविधा थी और न इंटरनेट की। होटल में जरूर वाई-फाई मुझे मिली, मगर वहां सोशल साइट्स प्रतिबंधित थीं। रिसेप्शन पर मौजूद कर्मी ने मुझे वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क नामक एप के बारे में बताया, जो इस प्रतिबंध की काट था। कांफ्रेंस में आए डेलिगेट्स में 50 फीसदी महिलाओं का होना मेरे लिए आश्चर्य की बात थी। वहां मुझे पता चला कि इंटरनेट पर जो कुछ भी खास है, ईरान ने स्थानीय स्तर पर उसका विकल्प तैयार कर लिया है। मसलन, फेसबुक के बदले वहां क्लूब है, यू-ट्यूब की जगह अपैरेट, और गूगल ऐनालिटिक की जगह वेबगूजर। इसी तरह, ईबे के बदले वहां ईसैम है, अमेजन की जगह डिजिकला और किंडल की जगह फीडीबो। वहां गूगल प्ले स्टोर की जगह कैफे बाजार का उपयोग होता है, पेपल की जगह जरीनपल, शोपफा उनके लिए देशज शोपीफी है और टूनेट व हेमीजू स्वदेशी क्राउड-फंडिंग प्लेटफॉर्म हैं।

ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि आर्थिक प्रतिबंधों के दौर में ईरान पिछड़ गया है, पर वास्तव में इंटरनेट पर निगरानी के बावजूद इन वर्षों में वहां उद्यमशीलता खूब फली-फूली। स्थानीय न्यूज वेबसाइट अल-मॉनिटर  की एक रिपोर्ट की मानें, तो इंटरनेट पर पाबंदी ने यहां के युवाओं को बेहतर घरेलू प्रौद्योगिकी बनाने में मदद की है। यहां लोकप्रिय 100 वेबसाइटों में 10 से भी कम दूसरे देशों की हैं। गूगल की जगह लेने वाले स्वदेशी पारसीजू सर्च ईंजन पर एक अरब से ज्यादा पेज हैं। हालांकि स्टार्ट-अप में विश्वास रखने वाले लोग इन प्रतिबंधों को भले एक अवसर मानें, आम जनता खास तौर पर युवा ज्यादा खुश नहीं है। वे प्रॉक्सी वेबसाइटों से पाबंदियों की काट ढूंढ़ते हैं।

ईरान नेशनल इंटरनेट प्रोजेक्ट (अपना इंटरनेट विकसित करने जैसा) की ओर तेज कदम बढ़ा रहा है। यह वर्ल्ड वाइड वेब की जगह लेगा। ईरान से हम यह सीख सकते हैं कि देश के अंदर ही कैसे इंटरनेट पेनिट्रेशन को बढ़ाया जा सकता है, पर इसका मतलब यह नहीं है कि घरेलू इंटरनेट को समृद्ध करने के लिए वैश्विक इंटरनेट पर रोक लगा दें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


 

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