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बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती समारोहों के बीच यह विडंबना ही है कि दलित उत्पीड़न की घटनाएं भयावह रूप में सामने आ रही हैं। अब उत्तराखंड में दलितों के मंदिर प्रवेश पर हिंसा की घटना घटी है।

उत्तराखंड का जौनसाब भाबर का इलाका अपनी कुदरती खूबसूरती, रीति-संस्कृति और मंदिरों के वास्तु-शिल्प व ऐतिहासिकता के लिए जाना जाता रहा है, तो वहीं यह जातीय कट्टरपंथ के लिए भी कुख्यात रहा है। यहां स्थानीय देवताओं के भी मंदिर हैं, जिनके प्रति स्थानीय लोगों में गहरी श्रद्धा है।

दलितों के मंदिर प्रवेश को लेकर यहां आंदोलनों का भी इतिहास रहा है, पर इस दिशा में कोई सार्थक निरंतरता रह पाई हो, यह कहना मुश्किल है। प्रशासन व आंदोलनकारियों के दबाव में दलितों को मंदिर में प्रवेश मिलने लगा है, पर कुल मिलाकर समाज में अब भी एक अदृश्य दीवार खिंची हुई है। दलितों के पक्ष में ऐसी ही एक कोशिश के तहत सांसद तरुण विजय पिछले दिनों चकराता के पोखरी गांव स्थित मशहूर शिल्गुर देवता मंदिर में गए थे।

स्थानीय सूत्रों का कहना है कि उनके साथ दलितों का एक समूह था, लेकिन उन्हें वहां स्थानीय लोगों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। बात बिगड़ती गई और तरुण विजय व उनकी टोली पर पथराव कर दिया गया। सवाल यह है कि जब एक दलित लड़की आईएएस की परीक्षा में टॉप कर रही है और देश के हर दूसरे व्यक्ति के हाथों में मोबाइल और इंटरनेट हैं, तब भी हमारा समाज किन रूढि़यों में जकड़ा हुआ है?
डायचे वेले में शिवप्रसाद जोशी

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  • Web Title:oppression of dalits in uttarakhand