DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अविरल गंगा की चिंता और सौ साल पुराना एक आंदोलन

अविरल गंगा, निर्मल गंगा के सवाल पर वह अद्भुत जन-जागरण था। ठीक सौ साल पहले साल 1916 में गंगा के सवाल पर जनमानस उद्वेलित हो उठा था। गंगा के सवाल पर सभी उठ खड़े हुए थे। क्या आस्थावान, क्या आमजन, उस समय की रियासतों, राजे-रजवाड़ों के राजा-महाराजा, सभी की ऐसी एकजुटता कि अंग्रेज शासन घुटने टेकने को मजबूर हो गया। ब्रिटिश शासन और गंगा के लिए चिंता और चिंतन करने वाले भारतीयों के बीच ऐतिहासिक समझौता अस्तित्व में आया। सौ साल बाद आज हम उस जन-जागरण, गंगा के सवाल पर अभूतपूर्व जन-भागीदारी के उदाहरण से सीख ले सकते हैं।

सौ साल पहले जब यह समझौता हुआ, उस समय अंग्रेज हुक्मरान भीमगौड़ा (हरिद्वार) में गंगा की धारा को पूरी तरह बांधने के लिए कमर कस चुके थे। गंगा के अस्तित्व के प्रति खतरे की इस आहट के बाद एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया। इसकी अगुवाई महामना मदन मोहन मालवीय कर रहे थे। इस जनांदोलन की दिशा निश्चित करने के लिए उन्होंने कोई एक दशक पहले ही 1905 में गंगा महासभा की स्थापना की थी। 1916 आते-आते आंदोलन ने जोर पकड़ा, तो ब्रिटिश सरकार ने गंगा के सवाल पर उभरे व्यापक जन असंतोष को देखते हुए 18-19 दिसंबर को दो दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया। उद्वेलित जन साधारण के साथ ही देश के नौ राजा-महाराजा, देश के शीर्ष अंग्रेजी हुक्मरान हाड़कंपाती सर्दी में भी सम्मेलन में भाग लेने भीमगौड़ा पहुंच गए। बनारस, दरभंगा, सुदौली, कुवेसर, अलवर, जयपुर, बीकानेर और कासिमपुर राज-शासन के ‘हिज हाइनेस’ महाराजा अपने सभासदों और लाव-लश्कर के साथ पहुंचे। अंग्रेज लेफ्टिनेंट गवर्नर सर मेस्टन खुद वहां थे। ‘न्यू गैंजेज कैनाल वक्र्स’ नाम से शुरू गंगा को बांधने की अंग्रेज शासन की परियोजना पर विराम लग गया।

मालवीय जी के नेतृत्व में हुए समझौते पर हिंदू महासभा के तत्कालीन जनरल सेक्रेटरी लाला सुखबीर सिंह और अंग्रेज शासकों, अधिकारियों ने हस्ताक्षर करके यह वचनबद्धता स्वीकार की थी कि गंगा की मुक्त धारा में कोई रोक-टोक नहीं की जाएगी। कोई बांध या फाटक लगाकर या नहर खोलकर प्रवाह नहीं रोका जाएगा। गंगा की मुख्य और पूरक धाराओं में हर दशा में हमेशा 1000 क्यूसेक जल का प्रवाह बना रहेगा। आज गंगा की अविरल और निर्मल धारा की स्थिति 100 साल पहले की अपेक्षा अत्यंत भयावह है। प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, गंगा के व्यापारीकरण, गंगा तट पर अनियंत्रित निर्माण-विकास और अतिक्रमण से गंगा के अस्तित्व और भारत सरकार की महत्वाकांक्षी ‘नमामि गंगे’ परियोजना की तेजी पर ग्रहण लग गया है। वर्ष 1916 के समझौते को हालांकि ‘नमामि गंगे’ का नीतिगत आधार बनाया गया है, पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गोमुख से गंगा सागर तक पांच राज्यों- उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल- को शामिल कर तीन महीने में अंतरराज्यीय परिषद् बनाने और ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आगे गंगा की निर्मलता पर एक भी पैसा न खर्च करने का आदेश दिया है।

सरकार ने गंगा के लिए नई कंपनी, कॉरपोरेशन या टास्क फोर्स बनाकर तीन से दस साल में गंगा जल को आचमन और स्नान-योग्य बनाने के वादे किए हैं। पर गति इतनी धीमी है कि लक्ष्य प्राप्ति में संदेह स्वाभाविक है। हमारी मान्यता यह है कि गंगा कभी गंदी हो ही नहीं सकती। लंदन की टेम्स, अफ्रीका की नील और चीन की यांग्त्से जैसी नदियां प्रदूषण रहित हैं, पर गंगा की तरह मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक जीवन से जुड़ी नहीं। गंगा की धारा और इसका जल लोगों की आस्था और विश्वास की अतल गहराइयों में बसती धारा का जल है। गंगा का जल पहले तहखाने में, छतों पर या दीवारों में चिनवाकर सालों-साल सुरक्षित रखा जाता रहा है। वर्षों बाद जैसा था, वैसा ही मिला। जयपुर राजघराने के सिटी पैलेस में 1922 में दो घड़ों में बंद रखा गंगाजल 40 साल बाद 1962 में खोलने पर वैसा ही मिला, जैसा रखते समय था। गंगा जल में जीवाणुभोजी (बैक्टीरियो-फेज) अब भी विद्यमान हैं, पर मानक से बहुत कम। ‘नमामि गंगे’ से लोगों को बहुत उम्मीद है, जिसके बाद शायद वही रास्ता बचेगा, जो साल 1916 में अपनाया गया था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:one hundred years old ganga incessant anxiety and agitation