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बाजार से बढ़ेगा हिंदी का रुतबा

एक विश्वविद्यालय से छात्रों के सामने हिंदी दिवस पर बोलने का अनुरोध आया और विषय दिया गया हिंदी का भविष्य? थोड़ा धक्का लगा, क्योंकि आम तौर से भविष्य के साथ प्रश्नचिह्न तभी लगाते हैं, जब आपके मन में उसे लेकर संशय हो। तो क्या संविधान में राजभाषा घोषित होने के 60-65 साल बाद ही ऐसी नौबत आ गई कि हिंदीप्रेमियों के मन में उसके भविष्य को लेकर चिंता पैदा होने लगी है? मेरे मन में हिंदी के भविष्य को लेकर कोई संशय नहीं है, पर इसका कारण यह मत समझें कि अचानक सरकार उसको लेकर अधिक गंभीर हो गई है या हिंदी समाज ने अपनी भाषा को ज्यादा सम्मान देना शुरू कर दिया है। आज भी, जब तक मजबूर न हो जाए, नौकरशाही अंग्रेजी में ही काम करना पसंद करती है और सरकारी दफ्तर दिनोंदिन घटते जा रहे उत्साह के साथ हर साल कर्मकांड की तरह हिंदी-पखवाड़ा मनाते हैं। आज भी हिंदी प्रदेशों में लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में शिक्षा दिलाना पसंद करते हैं, क्योंकि यही भाषा आभिजात्य और रोजगार की कुंजी है। फिर मैं क्यों हिंदी के भविष्य को लेकर आश्वस्त हूं? इसके कारणों को खंगालना दिलचस्प होगा।

आधुनिक अर्थों में आज हम जिसे हिंदी कहते हैं, वह लगभग दो-ढाई सौ वर्ष पहले विकसित हुई थी और सौ से कुछ ही वर्ष पहले तक उसे खड़ी बोली कहते थे। बोली से भाषा तक की यह यात्रा बड़े रोचक मोड़ों से गुजरी है। आधुनिक हिंदी के पहले बड़े रचनाकार भारतेंदु हरिश्चंद्र मानते थे कि खड़ी बोली में कविता नहीं लिखी जा सकती। वह गद्य खड़ी बोली और पद्य बृजभाषा में लिखते थे। और हिंदी की उन्नति के लिए 19वीं शताब्दी में बनी और इस क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण योगदान करने वाली संस्था काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने खड़ी बोली समर्थकों के बड़े जद्दोजहद के बाद लगभग अनिच्छा से खड़ी बोली में भी कविता करने की अनुमति दी थी। एक बार शुरुआत हो जाने के बाद खड़ी बोली ही आधुनिक कविता का माध्यम बनी। ऐसा इसलिए संभव हो सका कि बृज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, मगही या अंगिका, बज्जिका समेत तमाम बोलियों के मुकाबले खड़ी बोली ज्यादा आधुनिक, विपुल शब्द-संपदा से भरपूर और बेहतर अभिव्यक्ति का माध्यम थी। कविता का माध्यम बनने के दो-तीन दशकों के भीतर ही इसके मानकीकृत स्वरूप को हिंदी कहा जाने लगा।

मेरा मानना है कि हिंदी का प्रारंभिक दौर ही उदारता और अनुदारता के बीच संघर्ष का दौर था। पहला इम्तिहान तो यह था कि नई बनी भाषा के साहित्य में क्या सिर्फ खड़ी बोली के साहित्य का शुमार होगा? अवधी, बृज या मैथिली जैसी बोलियों की परंपरा को काटने के बाद हमारे पास बचता क्या? यह अकादमिक प्रश्न था और आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे विद्वानों ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखते समय या विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम बनाने के क्रम में इसका उत्तर दे दिया। सारी बोलियां हिंदी थीं और उन सबका साहित्य हिंदी का था। आज भी ये बोलियां हिंदी के लिए खाद का काम कर रही हैं।

दूसरा प्रश्न थोड़ा जटिल था और उसका समाधान होने में भी लगभग सौ वर्ष लगे। हिंदी अपनी जड़ें संस्कृत में तलाशेगी या फिर लोक में प्रचलित अरबी, फारसी, पुर्तगाली, फ्रेंच और द्रविड़ भाषाओं के शब्द भी उसके शब्दकोश के अंग बनेंगे? प्रश्न काफी हद तक सांप्रदायिक था और भारतीय समाज के कटु यथार्थ से जुड़ा था। खास तौर से देश के विभाजन की परिस्थितियों से यह और जटिल हो गया। शुरू में तो शुद्धतावादियों को बढ़त मिलती सी लगी। आजादी के फौरन बाद बने पारिभाषिक शब्द या आकाशवाणी के समाचारों में प्रयुक्त भाषा इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं।

लगभग अरुचि उत्पन्न करने वाली तथा दुरूह शब्दों से भरी इनकी भाषा कभी भी जनता को स्वीकार्य नहीं हुई और लोग इनका उपयोग सिर्फ लतीफे गढ़ने के लिए करते रहे। जैसे-जैसे उदारता हमारे लोकतंत्र का अंग बनती गई, भाषा भी लोक के करीब गई। पिछड़ों, दलितों, स्त्रियों जैसे हाशिये पर सिमटे लोगों की राजसत्ता में भागीदारी बढ़ने के साथ ही यह भी तय हो गया कि जन सामान्य के बीच बोली जाने वाली भाषा हिंदी ही होगी। सहज भाषा ने दो दिख सकने वाले चमत्कार किए- साक्षरता की दर में तेज वृद्धि संभव हो सकी और हिंदी अखबार दुनिया में सबसे बड़ी पाठक संख्या वाले अखबार बने। वर्धा हिंदी शब्दकोश पर काम करते समय हमने पाया कि व्यवहार में आने वाले शब्दों में अधिकांश की व्युत्पत्ति का स्रोत संस्कृत नहीं था।

हिंदी के भविष्य में मुझे बाजार की भी बड़ी भूमिका लगती है। भारत पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ा बाजार बनकर उभरा है। यहां का मध्यवर्ग अपनी आबादी के लिहाज से यूरोप से भी बड़ा है। दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां महानगरों से भी परे छोटे शहरों और कस्बों में फैले बाजारों तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश कर रही हैं। इस बाजार के उपभोक्ताओं से संपर्क करने के लिए किसी एक भारतीय भाषा का जानना हमेशा मददगार होगा। स्वाभाविक रूप से यह भाषा हिंदी हो सकती है, क्योंकि आधे भारत की यह मातृभाषा है और शेष भारत के अधिकांश हिस्से में इसे बोलकर अपना काम चलाया जा सकता है।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में मुझे यह देखकर बड़़ा आश्चर्य होता था कि विदेशी छात्रों को हिंदी सिखाने के हमारे कार्यक्रमों में सबसे अधिक संख्या में चीनी छात्र भाग लेते थे। भारत और चीन पिछले दशकों से किसी भी अर्थ में अच्छे पड़ोसी के रूप में नहीं रह रहे हैं, फिर भी क्या कारण है कि हिंदी भाषा सीखने में चीनियों की इतनी अधिक दिलचस्पी है? न सिर्फ वर्धा, बल्कि दिल्ली, वाराणसी और जयपुर जैसे शहरों में भी बड़ी संख्या में चीनी छात्रों को हिंदी सीखते हुए पाया जा सकता है। कुछ वर्षों पूर्व चीन की अपनी यात्रा के दौरान मैंने वहां के आधा दर्जन से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी का पठन-पाठन होते देखा था।

चीन में हिंदी सीखने का बढ़ रहा उत्साह किसी शून्य से नहीं उपजा है। दरअसल, चीन हर काम बहुत ही सुचिंतित और सुनियोजित तरीके से करता है। हिंदी को लेकर भी कुछ ऐसा ही मामला है। चीन की नजर इस बढ़ते बाजार पर है और इसीलिए वह बड़ी संख्या में ऐसे नौजवान तैयार कर रहा है, जो हिंदी जानते हों, और जिनकी मदद से भारतीय बाजारों में उसकी रसाई हो सके। बाजार का प्रभाव भारतीय संदर्भ में भी देख सकते हैं। सूचना-प्रौद्योगिकी के चलते लाखों की संख्या में भारतीय नौजवान देश के विभिन्न शहरों में गए हैं और फलस्वरूप आज चेन्नई, बेंगलुरु, पुणे या हैदराबाद मे हिंदी में काम चलाना ज्यादा आसान हुआ है।

मेरा मानना है कि हिंदी के भविष्य का प्रश्न भविष्य की हिंदी के स्वरूप से जुड़ा है। यदि भविष्य में भी हिंदी का स्वरूप समावेशी बना रहा और उसने दूसरी भाषाओं या बोलियों को आत्मसात करने की अपनी क्षमता बरकरार रखी, तो उसके लिए कोई खतरा नहीं है। सरकारी समर्थन कम होने के बाद भी बाजार की जरूरतें उसे प्रासंगिक  बनाए रखेंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
राय की राय स्तंभ अभी तक हर पखवाड़े बुधवार को प्रकाशित होता था, अब यह हर दूसरे मंगलवार को प्रकाशित होगा।

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