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निराधार नहीं हैं आधार पर उठ रही आशंकाएं

निराधार नहीं हैं आधार पर उठ रही आशंकाएं

हाल में ही टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धौनी की निजी जानकारी आधार कार्ड बनाने वाली एजेंसी ने सोशल नेटवर्किंग साइट पर लीक कर दी। इस पर जब हंगामा हुआ, तो जानकारी लीक करने वाली एजेंसी को 10 साल के लिए ब्लैक लिस्ट कर दिया गया। अब सवाल यह नहीं है कि इस मामले में कार्रवाई हुई या नहीं, मुख्य सवाल यह है कि क्या आधार कार्ड की वजह से देश के करोड़ों लोगों की निजता खतरे में है? आधार कार्ड का पूरा डाटाबेस कभी भी कोई भी अपने फायदे के लिए प्रयोग कर सकता है? या उसकी जानकारी किसी भी प्लेटफॉर्म पर लीक कर सकता है?

निजता पर हमले की आशंका के जवाब में सरकार का सुप्रीम कोर्ट में कोई ठोस तर्क न दे पाना बताता है कि यह मामला जल्द सुलझने वाला नहीं है। आधार कार्ड वह प्रामाणिक आधार बन सकता है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में दोहरा और फर्जी लाभ लेने वालों पर अंकुश लगे और सरकारी खजाने पर सेंधमारी भी रुके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि यह निजता पर खतरा कैसे नहीं है, सरकार इसे स्पष्ट करे। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में सरकार के उस विचार को खारिज कर दिया था, जिसके तहत आधार कार्ड को सभी सरकारी योजनाओं के लिए अनिवार्य बनाया जाना था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने एलपीजी और पीडीएस योजना में आधार कार्ड के इस्तेमाल को अपनी अनुमति प्रदान कर दी है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अब तक 90 करोड़ से ज्यादा भारतीयों का आधार कार्ड बन चुका है।

आधार परियोजना के तहत अलग-अलग निजी और सरकारी डाटाबेस (रेलवे यात्रा, वोटर आईडी, पैन कार्ड, बैंक अकाउंंट, मोबाइल नंबर और पीडीएस आदि) में हर व्यक्ति का आधार नंबर जोड़ने का प्रस्ताव है। जब ये काम पूरा हो जाएगा, तब किसी व्यक्ति का प्रोफाइल तैयार करना काफी आसान हो जाएगा। उस व्यक्ति ने कब और कैसे यात्रा की, किसे फोन किया, किसके साथ पैसे का लेन-देन किया, ये जानकारियां पाना किसी के लिए बहुत आसान हो जाएगा। यानी आधार परियोजना आम लोगों की निगरानी करने का सबसे बड़ा तरीका बन सकती है। निगरानी और निजता का मुद्दा आपस में जुड़ा हुआ है। चिंताजनक बात यह है कि भारत में निजता संबंधी कोई कानून नहीं है। यानी आधार परियोजना एक तरह के कानूनी निर्वात में काम कर रही है। आधार का इस्तेमाल किसलिए हो सकता है, इससे जुड़ी जानकारी कौन और किन परिस्थितियों में मांग सकता है, इन सवालों को लेकर नियम या दिशा-निर्देश नहीं हैं।

महज एक आदेश पर 2011 में शुरू इस योजना के लिए तब न तो कोई विधिक और न ही सांविधानिक प्रावधान किए गए थे। बाद में जो भी किया गया, एक तरह से आधा-अधूरा था, क्योंकि तब भी इसके आंकड़ों के दुरुपयोग को रोकने और निजता के उल्लंघन से निपटने का ध्यान नहीं रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट में भी बहस के दौरान सरकार का तर्क यही था कि निजता का अधिकार मूल अधिकार नहीं है। सांविधानिक रूप से यह सच भी हो, पर इससे भय पैदा होता है। सरकार के दावे के मुताबिक आधार कार्ड सुरक्षित हैं और इसकी जानकारी केवल सरकार और आपके पास होती है। लेकिन, जिस तरह से इन दिनों आधार कार्ड से संबंधित जानकारी लीक होने के मामले सामने आ रहे हैं, वे सरकार पर सवाल खडे़ करते हुए नजर आ रहे हैं। देश में आधार कार्ड बनाने वाली कई एजेंसियां गैर-कानूनी रूप से काम कर रही हैं, जिसके लिए सरकार को यह चेतावनी भी देनी पड़ी है कि अगर आप 50 से 200 रुपये देकर प्लास्टिक कार्ड बनवा रहे हैं, तो सावधान हो जाएं। 

आधार कार्ड व्यक्तिगत विशिष्ट पहचान यानी यूनीक आइडेंटिटी का वैज्ञानिक तरीका हो सकता है, होना भी चाहिए, ताकि व्यक्ति की ऑनलाइन पहचान हो सके। लेकिन इसके लिए साफ प्रावधान होने चाहिए और कई पहचान पत्रों से मुक्ति मिलनी चाहिए। यदि इसके जरिये निजी क्रिया-कलापों को सार्वजनिक मंच से जोड़ा जाएगा, तो यह निजता पर हमले की बात लगेगी ही। यह मामला बहुत जटिल और संवेदनशील है, लेकिन सरल बनाने के लिए सरकारी पहल भी नहीं दिख रही है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:mahendra singh dhoni aadhar card