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देखने का तरीका

चीजें कम ही बदलती हैं, नजरिया ज्यादा बदलता है। नजर बदलते ही नजारे बदल जाते हैं। आप जैसा बोएंगे, वैसा काटेंगे की तरह यह बात भी शाश्वत सत्य है कि जैसा नजरिया होगा, चीजें वैसी ही नजर आएंगी। 

प्रोफेसर बारबरा फ्रेडरिक्सान नॉर्थ कैरोलीना यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफेसर हैं। वह कहती हैं, बड़े नजरिये से चीजों को देखना तय करता है कि आप किसी भी परिस्थिति में तस्वीर के हर पहलू को देखते हैं और आखिर समस्या का हल खोज निकालने में कामयाब होते हैं। वह कहती हैं कि नजरिये को विकसित करने के लिए सबसे जरूरी है- सकारात्मक सोच। दरअसल, नजरिया ही यह तय करता है कि किसी स्थिति के केंद्र में क्या है- समस्या या समाधान। 

दिक्कत यह है कि ज्यादातर लोगों में सधे हुए नजरिये का अभाव होता है। वे हर चीज को दोआयामी तरीके से देखते हैं। उनके लिए कोई चीज सच है या फिर झूठ। महान फिल्मकार अकीरो कुरोसावा ने इस सच को पहचाना। उनकी फिल्म रशोमोन  में सच को कई एंगल से दिखाया गया है। एक ही चीज अलग-अलग तरीके से लोगों का सच हो सकती है। हमें अपने नजरिये को हमेशा परिष्कृत करने की कोशिश करनी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि आप साहित्य पढ़ें, नए-नए लोगों से मिलें, नई-नई जगहों पर घूमने निकलें। और भी रास्ते हैं। 

एक यह भी है कि आप सामने वाले के नजरिये को सम्मान दें। इससे भी एक नजरिया विकसित होता है। 
लेखक इरविन स्टोन ने एक किताब लिखी है-लस्ट फॉर लाइफ।  महान चित्रकार विन्सेंट वॉन गॉग के जीवन पर लिखी गई इस किताब में एक जगह कहा गया है- आदमी का व्यवहार, काफी कुछ ड्रॉइंग की तरह होता है, आंख का कोण बदलते ही सारा दृश्य बदल जाता है, यह बदलाव दृश्य पर नहीं, देखने वाले पर निर्भर करता है। यह सच है कि हमारे सामने तरह-तरह की ड्रॉइंग आती-जाती रहती हैं और हम तरह-तरह से चीजों को देखते हैं।    
प्रवीण कुमार

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