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राजनीति का एक करिश्मा थीं जयराम जयललिता

जयराम जयललिता नहीं रहीं। 68 वर्ष के जीवन का आधा वक्त राजनीति में बीता। वह 15 साल सत्ता में रहीं और तमिलनाडु का चेहरा बदल डाला। उन्हें महिलाओं और गरीब तबके का जबर्दस्त समर्थन हासिल हुआ। सच तो यही है कि लोकप्रियता और लोक-कल्याण के कामों से अपने गुरु एम जी रामचंद्रन को भी पछाड़ दिया। वह पुरुष वर्चस्व वाले राजनीतिक परिदृश्य में तमाम मुश्किलों से लड़ीं और मजबूती से साथ शासन किया। जयललिता का पूरा जीवन संघर्ष से भरा रहा। हर उतार-चढ़ाव के बाद वह नई आभा लेकर लौटीं। दो साल की थीं कि पिता नहीं रहे। मां, अभिनय की दुनिया में इतनी व्यस्त कि उनका प्यार भी मुश्किल से मिल पाता। एक बार जयललिता को ‘मेरे लिए मां का मतलब’ निबंध पर पुरस्कार मिला। मां को दिखाने के लिए देर रात तक इंतजार करती रहीं, आखिर थककर कॉपी सीने पर रखे हुए सो गईं। मां संध्या शूटिंग से वापस लौटीं, तो सुबकती बच्ची ने उन्हें बताया कि वह किस तरह दो दिन से अपना निबंध दिखाने के लिए उनका इंतजार कर रही थी।

जयललिता बनना तो चाहती थीं वकील, लेकिन मां के दबाव और पारिवारिक हालात ने उन्हें फिल्मों में काम करने को मजबूर कर दिया। एक इंटरव्यू में जयललिता ने बताया कि उनका प्रारंभिक जीवन दो लोगों के  असर में रहा। मां के दबाव में फिल्मी दुनिया में आईं और एमजीआर के दबाव ने उन्हें राजनीति में धकेला। हालांकि दोनों ही क्षेत्रों में वह उत्कृष्ट रहीं। एमजीआर सिनेमा की दुनिया से ही उनके गुरु रहे। दो दर्जन फिल्मों में साथ काम किया। बाद में राजनीति में आए, तो 1982 में जयललिता भी एमजीआर की अन्नाद्रमुकसे जुड़ गईं। सफल भी रहीं, लेकिन 1987 में एमजीआर का निधन हो गया।

जयललिता खुद को एमजीआर की असली वारिस के रूप में देख रही थीं, लेकिन पार्टी को यह मंजूर नहीं था। पार्टी बंट गई, क्योंकि एमजीआर ने उत्तराधिकार की कोई योजना नहीं दी थी। जयललिता को एमजीआर के घर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। भागकर राजाजी हाल पहुंचीं, जहां पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा था। जयललिता ने एमजीआर के शव के ठीक बगल में अपने लिए जगह बनाई और अगले दो दिन वहीं खड़ी रहीं। बाद में जयललिता को उस वाहन तक पर नहीं फटकने दिया गया, जिससे एमजीआर को अंतिम यात्रा के लिए ले जाया जाना था। लेकिन इन अपमानों ने उनके प्रति सहानुभूति जगा दी। जयललिता को फिर अपमान सहना पड़ा, जब उन्हें सदन में ही जमीन पर गिराया गया और साड़ी तक खींची गई। उनकी जीवनी के अनधिकृत लेखक वासंथी ने लिखा,‘व्यथित पांचाली की तरह जयललिता ने शपथ खाई कि विधानसभा भवन में तब तक कदम नहीं रखेंगी, जब तक कि मुख्यमंत्री नहीं बन जातीं।’ जयललिता ने अपनी कसम पूरी की और जुलाई 1991 में राज्य की मुख्यमंत्री के रूप में सदन में लौटीं। पुरुष वर्चस्व वाली विधानसभा में यह ऐतिहासिक घटना थी।

द्रमुक और अन्नाद्रमुक की बदले की राजनीति में भी जयललिता नहीं टूटीं। वह अपनी गलतियों से सबक भी लेती थीं। पहले शासनकाल में दत्तक पुत्र सुधाकरण की शादी में जब शाही खर्च और शानो शौकत के तमाम पैमाने तोड़ दिए, तो जनता ने इसे अपने धन की बर्बादी के रूप में देखा और वह अगला चुनाव हार गईं। जब सत्ता में लौटीं, तो एक गहना नहीं पहना। शायद प्रायश्चित स्वरूप। तीसरी बार चुने जाने पर एक बदली हुई जयललिता दिखाई दीं, जो सिर्फ जन-कल्याण की बातें कर रही थीं। वह दिल जीत रही थीं, मगर आय से अधिक संपत्ति का मामला पीछा कर रहा था।

उन्हें जेल जाना पड़ा, लेकिन सारी उठापटक के बावजूद जयललिता कमजोर नहीं पड़ीं। बरी होकर लौटीं और लीक से हटकर लिए गए फैसलों के साथ जनता के दिलों में घर करती गईं। राजनीति में भी उनके तमाम फैसले लीक से हटकर दिखे। इस साहसिक महिला की राष्ट्रीय राजनीति में छाने की मंशा भले न पूरी हुई हो, मगर तमिलनाडु की जनता के दिलों पर वह पूरी तरह काबिज थीं। जयललिता अब नहीं हैं, पर उन्होंने जो लकीर खींची है, उसे छोटा कर पाना उनके उत्तराधिकारी के लिए आसान न होगा। क्षेत्रीय ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति में भी उनकी कभी अखरेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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  • Web Title:jayaram jayalalitha was a miracle of politics