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नोटबंदी पर केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू, यह वक्त की जरूरत है

नोटबंदी पर केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू, यह वक्त की जरूरत है

देश की आर्थिक तस्वीर एक झटके में, खासकर रोजाना के लेन-देन के मामले में पूरी तरह बदल गई है। आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि मोची से लेकर कंपनी के सीईओ तक, सभी भारतीयों का जीवन लेन-देन के मामले में बदल गया है। यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस फैसले से हुआ कि 1000 और 500 के पुराने नोटों को चलन से बाहर कर दिया जाए। इस क्रांतिकारी कदम ने आर्थिक सुधार के साथ-साथ इस बात का भी माहौल बना दिया है कि अब हर कोई किसी भी प्रकार के लेन-देन के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करेगा और इसको बढ़ावा देगा। अब यह हर युवा और डिजिटल-साक्षर लोगों की जिम्मेदारी है कि वे निरक्षरों या कम पढ़े-लिखे लोगों को आर्थिक लेन-देन के लिए मोबाइल या डिजिटल तरीके बताएं।

आठ नवंबर को हुई घोषणा के पीछे मकसद काला धन और भ्रष्टाचार से निजात पाना तो था ही, इसका एक मकसद पाकिस्तान द्वारा आतंकियों को की जाने वाली फंडिंग और आईएसआई द्वारा चलाए जा रहे जाली नोटों के उद्योग को पूरी तरह से नेस्तानाबूद करना भी था। दरअसल, यह वक्त हमारे लिए डिजिटल अर्थव्यवस्था पर भरोसा करने का एक ईश्वर-प्रदत्त मौका है, और उन तमाम फायदों को बटोरने का एक अवसर भी, जिसका गवाह आने वाले दिनों में देश बनने जा रहा है। इससे हमारी औपचारिक अर्थव्यवस्था को व्यापक रूप में फायदा होगा और दीर्घावधि में देश की जीडीपी भी बेहतर होगी। किसी भी देश के इतिहास में वह मौका जरूर आता है, जब लोगों के व्यवहार को बदलने के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला लिया जाता है और यह उन लोगों को खासतौर पर चोट पहुंचाता है, जो तंत्र की कमियों का फायदा उठाकर गैर-कानूनी या काला धन जमा करते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने तमाम तात्कालिक मुश्किलों को जानते हुए भी व्यापक जनहित में यह कदम उठाया है। असल में, काला धन हमारी अर्थव्यवस्था के समानांतर तेजी से बढ़ रहा था। इतना ही नहीं, जाली नोट सीमा पार से बड़ी मात्रा में पहुंचाए जा रहे थे और आतंकियों, तस्करों, अलगाववादियों, महिला और बाल तस्करों, ड्रग्स कारोबारियों द्वारा भयावह तरीके से इसका इस्तेमाल हो रहा था। प्रधानमंत्री ने लीक से हटकर यह फैसला इसलिए भी लिया, ताकि अवैध आर्थिक गतिविधियों से देश को होने वाले भारी नुकसान को टाला जा सके। यह फैसला अचानक नहीं लिया गया। प्रधानमंत्री ने यह कदम उठाने से पहले तमाम जरूरी सावधानियां बरती हैं।

साल 2014 में जब एनडीए सत्ता में आया, तब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अपनी पहली बैठक में ही विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन किया था, जिसके मुखिया सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एमबी शाह थे। जाहिर है, यह एसआईटी काला धन को लेकर बनाई गई थी। नवंबर, 2014 में ब्रिसबन की अपनी पहली जी-20 बैठक में भी प्रधानमंत्री मोदी ने तमाम वैश्विक नेताओं के सामने काला धन का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। उनके शब्द थे, ‘पूंजी और प्रौद्योगिकी में गतिशीलता बढ़ने से कर बचाने और लाभ के बंटवारे से बचने के नए अवसर भी पैदा हुए हैं। मैं सभी देशों, खासकर टैक्स हैवेन देशों (कर पनाह वाले देश) से गुजारिश करता हूं कि वे संधि दायित्वों के अनुसार सूचनाएं साझा करें।’ बैठक के अंतिम घोषणापत्र में कर चोरी का मुकाबला करने संबंधी प्रावधान का होना प्रधानमंत्री मोदी द्वारा तैयार की गई बुनियाद का ही परिणाम था।

बाद के दिनों में भी कई प्रयास किए गए थे। जैसे काला धन (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति) और कर अधिरोपण कानून, 2015 को लागू किया गया, जो एक जुलाई, 2015 से अस्तित्व में आया। इस कानून के तहत, तीन महीने का समय दिया गया और कहा गया कि 60 फीसदी कर देकर विदेश में रखे गए काले धन को सार्वजनिक किया जा सकता है। इसके अलावा, पनामा पेपर लीक मामले में मल्टी-एजेंसी ग्रुप का निर्माण किया गया और बेनामी ट्रांजेक्शन बिल, 2015  की राह आसान की गई। अमेरिका सहित कई देशों के साथ भारत ने बैंकिंग जानकारी साझा करने में नए प्रावधान जोड़ने वाले समझौते भी किए। दोहरे कराधान से बचाव की संधि भी कई देशों के साथ की गई। इसके अलावा, कर चोरी का मुकाबला करने और काला धन का पर्दाफाश करने के लिए भारत बहुपक्षीय सक्षम प्राधिकारी समझौता (एईओआई) में भी शामिल हुआ। आय घोषणा योजना की भी घोषणा हुई और आखिरकार प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘मन की बात’ में काले धन रखने वालों को चेत जाने के लिए भी कहा।

निस्संदेह, देश इस वक्त एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहा है। हमारा सौभाग्य है कि तमाम भारतीय इस नोटबंदी का समर्थन कर रहे हैं। हमें उन तमाम भारतीयों को सलाम करना चाहिए, जो देशहित में अपनी तात्कालिक मुश्किलों को भूलकर सरकार के साथ हैं। हाल के चुनावी-नतीजों में भी यह दिखाई दिया है। डिजिटल लेन-देन की ओर बढ़ना वक्त की जरूरत है। बेशक, भारत जैसे विविध व जटिल समाज में चुनौतियां तमाम हैं, मगर प्रधानमंत्री मोदी के जैसी दूरदर्शी सोच से ही इससे निजात पाई जा सकती है। सरकार ने अपने तईं नकद के कम से कम इस्तेमाल को लेकर लोगों को कई उपाय सुझाए हैं। निश्चय ही, जब अधिक से अधिक लोग डिजिटल मुद्रा की तरफ बढ़ेंगे, कागजी मुद्रा खुद-ब-खुद कम होती जाएगी। हमें समझना चाहिए कि नकदी का अधिक से अधिक इस्तेमाल देश की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाता है, जिसका बड़ा लाभ देश को नहीं मिलता।

कम नकदी के इस्तेमाल से जाहिर है, काले धन को वैध बनाना संभव नहीं होता, जिससे स्वाभाविक तौर पर सरकार की आय बढ़ती है। इससे आम लोगों को ही फायदा मिलता है। मूडीज की रिपोर्ट में भी यह अनुमान लगाया गया है कि इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन के कारण उभरते बाजारों की जीडीपी में 0.8 फीसदी तक की वृद्धि होती है। लिहाजा लोगों को सारे लेन-देन इलेक्ट्रॉनिक तरीके से करना चाहिए, जो न सिर्फ तेजी से होता है, बल्कि इसका पता लगाना भी आसान है। प्रधानमंत्री मोदी ने तो इसके लिए अपने व्यक्तिगत स्टॉफ के लिए एक कार्यशाला भी आयोजित की थी, ताकि उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म से रूबरू कराया जा सके। सरकार के तमाम मंत्रीगण भी ऐसा कर रहे हैं।

सरकार के इस कदम का उद्देश्य मोबाइल फोन से सभी लेन-देन को सुनिश्चित करना भी है। देश में अभी 103 करोड़ मोबाइल फोन हैं, जिनमें से 25-30 करोड़ स्मार्टफोन हैं। मगर यह तभी होगा, जब सभी वर्गों के लोगों का नजरिया बदले, उनकी सोच बदले। उम्मीद है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए तमाम लोग इस बदलाव में सरकार का साथ देंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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