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पुराने समीकरणों में नई उम्मीद

दो दशकों में पहली बार कोई पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष अपने तय समय पर रिटायर हुआ। यह खबर भारतीय पाठकों के लिए हैरानकुन हो सकती है, मगर पाकिस्तानी समाज पर करीबी नजर रखने वालों के लिए कतई अस्वाभाविक नहीं। पहले गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना और प्रधानमंत्री लियाकत अली के बाद सत्तर साल पुराने पाकिस्तानी राष्ट्र में अमूमन सेनाध्यक्ष ही सबसे ताकतवर शख्सियत माना जाता है। ऐसे में, जनरल राहील शरीफ का नियत समय पर रिटायर होना एक बड़ी घटना है, खास तौर से तब, जब इस तथ्य को सभी स्वीकारते हैं कि इस समय वह अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे और जनता के बीच उनकी स्वीकृति का ग्राफ प्रधानमंत्री शरीफ से बहुत ऊंचा था। स्वाभाविक है कि भारत में भी जनरल राहील शरीफ के अवकाश ग्रहण को लेकर पर्याप्त उत्सुकता दिखाई पड़ी। यह इसलिए भी अपेक्षित था कि वह भारत को लेकर अतिवादी थे और पिछले कुछ समय से भारत-पाक सीमा लगातार सुर्खियों में थी और इसके लिए उनकी नीतियां भी कुछ हद तक जिम्मेदार थीं।

अधिकतर भारतीय विश्लेषकों ने राहील शरीफ की विदाई को पाकिस्तानी सेना की भारत विषयक नीतियों में होने वाले संभावित परिवर्तनों की पड़ताल पर केंद्रित किया और स्वाभाविक रूप से कुछ का मानना है कि नेतृत्व परिवर्तन से पाक सेना की वार डॉक्ट्रिन पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि एक संस्था के रूप में उसकी वैधता ही भारत द्रोह पर टिकी है। दूसरी ओर, कुछ ऐसे विश्लेषक भी हैं, जिनकी सोच है कि नए सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा सैनिक अधिकारियों की उस धारा से जुड़े हैं, जो मानती है कि भारत से भी बड़ा खतरा पाकिस्तान के अंदर सक्रिय आतंकी संगठन हैं। इसलिए उनके नेतृत्व मे सीमा पर तनाव कम होंगे। मुझे लगता है कि दोनों प्रकार के विश्लेषणों में इस परिवर्तन के बाद नागरिक व सैनिक नेतृत्व के संबंधों में आने वाले बदलाव को जरूरी महत्व नहीं दिया गया है। जनरल राहील शरीफ का कार्यकाल बिना तख्ता पलट किए धीरे-धीरे सेना द्वारा विदेश, गृह व रक्षा मामलों में अंतिम निर्णय का अधिकार अपने हाथों मे ले लिए जाने के लिए याद किया जाएगा। ऐसा सिर्फ सेना के प्रयासों से ही संभव नहीं हुआ, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व और मीडिया के एक बड़े तबके द्वारा इसका स्वागत, प्रोत्साहन और कई बार इसकी मांग भी की गई। इमरान खान ने तो सेना को तीसरा अंपायर तक घोषित कर दिया, जिसकी उंगली उठते ही नवाज शरीफ आउट हो जाएंगे। दैनिक डॉन  का कहना है कि विचारधारा और हैसियत में फर्क के बावजूद हर राजनीतिक दल ने लोकतंत्र में सेना की दखलंदाजी को बढ़ावा दिया है। खुद सेना की निर्मिति होने के बावजूद नवाज ने अपने पिछले कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय की सर्वोच्चता बनाए रखने की कोशिश की थी, लेकिन लगता है कि पिछली बार जनरल परवेज मुशर्रफ द्वारा तख्ता पलट के बाद उनका आत्म-विश्वास समाप्त हो गया और इस बार वह बिना चूं-चपड़ हर मौके पर फौज के सामने समर्पण करते रहे हैं। कई बार तो बड़ी अपमानजनक परिस्थितियों में भी।

जनरल राहील शरीफ का उत्तराधिकारी चुनने के लिए उन्होंने बहुत सारी अतिरिक्त सावधानियां बरतीं और हर बार की तरह वफादारी सबसे महत्वपूर्ण पैमाना रहा। कई जनरलों की वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए जब उन्होंने कमर जावेद बाजवा को सेनाध्यक्ष नियुक्त किया, तो पाकिस्तानी मीडिया ने इसका सबसे बड़ा कारण प्रधानमंत्री शरीफ से जनरल बाजवा की निकटता और नागरिक प्रशासन में सेना की दखलंदाजी के विरुद्ध उनकी कथित राय को बताया। यह जुल्फिकार अली भुट्टो द्वारा जनरल जियाउल हक और नवाज शरीफ द्वारा जनरल परवेज मुशर्रफ की पूर्व नियुक्तियों से मिलता-जुलता मामला लगता है। तब भी वरिष्ठता के उल्लंघन के पीछे यही कारण बताए गए थे और दोनों मामलों में फैसला गलत साबित हुआ था। अपनी बारी से पहले चार सितारा जनरल बने जियाउल हक और परवेज मुशर्रफ ने नागरिक प्रशासन का तख्ता पलट दिया था।

पूरा पाकिस्तानी मीडिया महीनों से कयास लगा रहा था और नवाज ने पत्ते नहीं खोले। वह अपना विदेशी दौरा बीच में छोड़कर आए, सीधे राष्ट्रपति भवन गए और खुद फाइल पर उनके दस्तखत कराकर नियत तिथि से महज दो दिन पहले जनरल बाजवा के नाम की घोषणा कर दी। इस सारी कवायद का क्या नतीजा निकलेगा और सिविल-मिलिट्री रिश्ते आगे कैसे होंगे, यह तो भविष्य बतायेगा, लेकिन इसी नतीजे पर भारत और पाकिस्तान के संबंध निर्भर करेंगे।
पाकिस्तान में दिलचस्पी रखने वाले जानते हैं कि एक नहीं, दो पाकिस्तान हैं और दोनों कई बार स्वतंत्र रूप से और कभी-कभी तो एक-दूसरे के विपरीत कार्यरत दिखते हैं। पहले की धुरी इस्लामाबाद में है, जहां प्रधानमंत्री कार्यालय और नेशनल असेंबली है और दूसरे का दिल वहां से कुछ किलोमीटर दूर रावलपिंडी का सैन्य मुख्यालय या जीएचक्यू में धड़कता है। अपने को लोकतंत्र कहने वाले किसी राष्ट्र में यह पूछना बेमानी होगा कि विदेश, गृह या रक्षा संबंधी मामलों मे अंतिम फैसले कहां लिए जाते हैं, मगर पाकिस्तान में यह सवाल अप्रासंगिक नहीं होगा, क्योंकि वहां पर आमतौर से आखिरी फैसला जीएचक्यू करता है।

पाकिस्तान की दो बड़े राजनीतिक दल- पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और मुस्लिम लीग (नून) ने पिछले दो चुनाव भारत से संबंध सुधारने के नाम पर लड़े और जीते थे। दोनों ने सरकार बनाने के बाद भारत से संबंध सुधारने की कोशिश भी की थी, मगर शुरुआती हल्ले-गुल्ले के बाद दोनों असफल हो गए। दोनों ने भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देने का प्रयास किया और नहीं दे पाए। दोनों ने घोषित प्रयास किए कि काश्मीर समस्या का हल निकलने का इंतजार किए बिना भारत से व्यापारिक रिश्ते मजबूत किए जाएं, पर दोनों ही असफल रहे, ऐसा सिर्फ फौज की हठधर्मिता से हुआ।

जनरल बाजवा की नियुक्ति का भारत के लिए तभी सकारात्मक अर्थ होगा, जब वह नीतिगत मामलों में नागरिक प्रशासन की सर्वोच्चता स्वीकार करें। पाकिस्तानी जनता का विशाल बहुमत भारत से दोस्ती चाहता है और इसीलिए वह ऐसे दलों को जिताता रहा है, जो चुनावी घोषणापत्रों में संबंध सुधारने की बात करते हैं। दिक्कत फौज और कठमुल्लों के प्रभाव क्षेत्र वाले अल्पसंख्यक समूहों की है, जो युद्ध की भाषा बोलते हैं। नवाज ने नया सेनाध्यक्ष नियुक्त तो इसी आशा से किया है। हमें कामना करनी चाहिए कि वह इसमें सफल हों।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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