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हमारी उपलब्धियां, और गलतियां भी

विदेश नीति के लिहाज से यह साल हमारे लिए कई मामलों में खास रहा, तो कुछ में सामान्य। इस साल न सिर्फ भारत की विदेश नीति में नए आयाम जुड़े, बल्कि दोस्ती को भी एक नया रूप दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इसके अगुवा रहे और उन्होंने कई देशों की यात्राएं कीं, खासकर उन देशों की, जो चीन के करीब हैं। मंगोलिया, जापान, मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और हिंद महासगार के कई देशों की यात्रा करके उन्होंने अपनी मंशा साफ कर दी। इन देशों में भारत सरकार ने अपनी विदेश नीति को तेजी से बढ़ाने का काम किया।

इस साल ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर कनेक्टिविटी’ को तवज्जो देते हुए भारत ने ईरान के साथ चाबहार पोर्ट विकसित करने को लेकर समझौता किया और दक्षिण एशिया व मध्य एशिया को जोड़ने का प्रयास किया। अफगानिस्तान भी इसमें एक साझेदार है। इसी तरह, भारत-म्यांमार और थाईलैंड के बीच त्रिपक्षीय राजमार्ग की तरफ तेज कदम बढ़ाए गए। ‘मेक इन इंडिया’ पर भी खासा ध्यान दिया गया और यह कोशिश की गई कि रक्षा सहयोग बढ़ाने के साथ ही विनिर्माण-तकनीक भी भारत लाई जाए, ताकि देश में ही रक्षा उत्पादों को बनाने का मौका मिले। इसके माध्यम से रोजगार-सृजन का सपना भी देखा गया।
मगर इन सबसे बड़ी उपलब्धि विदेश नीति को आम जनता से जोड़ने की कोशिश रही। पश्चिम एशिया के उथल-पुथल भरे हालात से सुरक्षित निकालने की जिसने भी गुहार लगाई, उसे तत्काल निकाला गया। इसमें भारतीय ही नहीं, बल्कि वहां फंसे दूसरे देशों को नागरिक भी रहे। सभी को सुरक्षित निकाल लाया गया। यह एक नई पहल है। सुषमा स्वराज और वीके सिंह को इसके लिए तारीफ भी मिली। कुछ ऐसी ही प्रशंसा भारत सरकार को सर्जिकल स्ट्राइक के लिए भी मिली, जिसके माध्यम से पाकिस्तान को यह संदेश दिया गया कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ संभव नहीं। यह भारत के रवैये में आई बड़ी तब्दीली दिखाती है। सार्क सम्मेलन को लेकर ही हमारे रुख को जिस तरह कुछ पड़ोसी देशों ने सराहा और उन्होंने इस सम्मेलन से अपनी दूरी बनाई, वह बताती है कि आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने को लेकर ये तमाम देश भारत के साथ हैं।

ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी हम तेजी से आगे बढ़े हैं। हमारा आर्थिक विकास इसी सुरक्षा पर निर्भर है। गैस व तेल का बड़ा भंडार होने के कारण म्यांमार से, तो परमाणु ऊर्जा के लिहाज से ईरान से संबंध प्रगाढ़ बनाए गए। इससे उम्मीद बंधती है कि कुडनकुलम परमाणु संयंत्र में काम तेजी से आगे बढ़ेगा। वैसे, कुछ बदले अंतरराष्ट्रीय हालात के कारण आने वाले दिनों को लेकर कुछ संदेह भी उभर रहे हैं, जिनमें अमेरिका में सत्ता परिवर्तन की चर्चा स्वाभाविक है। भले ही, अमेरिका में नए राष्ट्रपति जनवरी में अपना कार्यभार संभालेंगे, पर अपने चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने जिस तरह के ट्वीट किए या भाषण में जो बातें रखीं, उनसे यही संकेत मिलता है कि अब अमेरिका की नीति में बड़ा बदलाव आने वाला है। चूंकि नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ‘अमेरिका फस्र्ट’ नीति की वकालत करते हैं, इसलिए हमारी समय-पूर्व तैयारी जरूरी है। कयास यही है कि पहले जिस तरह के क्षेत्रीय या अंतर-क्षेत्रीय समझौते होते रहे हैं, शायद वे अब बीते दिनों की बात हो जाएं और जोर द्विपक्षीय समझौतों या रिश्तों पर हो। इससे जाहिर तौर पर कारोबारी संबंधों पर भी असर पड़ सकता है। हमें अमेरिका-चीन रिश्ते पर भी नजर रखनी होगी, क्योंकि इस वर्ष दक्षिण चीन सागर में चीन ने जिस तरह अपनी ताकत दिखाने का प्रयास किया, संभव है कि अमेरिका नए साल में चीन पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाए।

हालांकि इस साल हमने कुछ कूटनीतिक गलतियां भी कीं, जिन्हें बाद में सुधारने की कोशिश हुई। रूस का हमसे दूर जाना, ऐसी ही हमारी कूटनीतिक चूक का नतीजा है। हमने अमेरिका, जापान या अन्य देशों से संबंध मजबूत बनाए, उससे मास्को को शायद ऐसा लगा कि हमारी प्राथमिकता में वह नहीं है। लिहाजा वह चीन और पाकिस्तान के हक की बातें करने लगा। इसकी एक वजह यह भी रही कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस को अलग-थलग करने की कोशिशें होती रहीं, जिस कारण चीन पर उसकी निर्भरता बढ़ी है। हालांकि हमने अपनी तरफ से दोस्ती का हाथ फिर से बढ़ाया है, पर मास्को का पुराना भरोसा अब तक नहीं बन सका है।

इसी तरह, कुछ मामलों में यह साल हमारी ‘कथनी’ का साल रहा। हमने अच्छी-अच्छी बातें तो खूब कीं, मगर उन्हें जमीन पर उतारने में पूरी तरह सफल नहीं हो सके। इस साल कई ऐसे समझौते हुए, जो सिर्फ फाइलों में ही दबकर रह गए। उनका क्रियान्वयन काफी कमजोर रहा। ‘एक्ट-ईस्ट’ पॉलिसी एक ऐसी ही नीति रही। चीन के सहयोग से पाकिस्तान के बलूचिस्तान में विकसित हो रहे ग्वादर बंदरगाह की तुलना में हमारे चाबहार की प्रगति थोड़ी कमजोर रही। इसी तरह, नेपाल और श्रीलंका के हक में भी हमने काफी बातें कहीं, पर जब भी उन्हें इन्फ्रास्ट्रक्चर या अन्य माली जरूरतों की दरकार रही, तो उन्होंने चीन का रुख किया। हमने हिंद महासागर को भी दक्षिण चीन सागर के विपरीत ‘शांति का क्षेत्र’ बनाने का प्रयास किया, पर उम्मीद के मुताबिक हमारे कदम आगे नहीं बढ़े।

अब 2017 दस्तक दे रहा है, जहां कई चुनौतियां हमारा इंतजार कर रही हैं। तमाम अधूरे कामों को पूरा करने के साथ ही अमेरिका में सत्ता-परिवर्तन से पड़ने वाले प्रभाव से भी हमें चुस्ती से निपटना होगा। चुनौती यूरोप और अमेरिकी देशों में बढ़ रहा रिफ्यूजी संकट भी है, जिसके विरोध में आवाज उठने लगी है। चूंकि इन देशों में शरणार्थियों के आने के बाद आतंकी घटनाएं बढ़ी हैं, लिहाजा कयास यही है कि इनके खिलाफ वहां कार्रवाई हो सकती है। इन कार्रवाइयों से स्वाभाविक तौर पर अश्वेत प्रभावित होंगे, जो इन देशों की नजर में हम भारतीय भी हैं। देखना होगा कि केंद्र सरकार इन तमाम मसलों से किस तरह से निपटती है? अगर हम इनसे सफलतापूर्वक पार पा लेते हैं, तो यकीन मानिए कि नए साल में हमारे हिस्से कई उल्लेखनीय उपलब्धियां भी आएंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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