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चार्वाक के अनुयायी

चार्वाक भारतीय दर्शन में जितना प्रसिद्ध, उतना ही निंदित नाम है। मगर इसके बावजूद सभी पुराने दर्शन- चाहे वह सांख्य हो या वेदांत, चार्वाक के वचनों का खंडन करके ही आगे बढ़ते हैं। यह चार्वाक कौन हैं और उनके कौन से ग्रंथ हैं, इसका नामोनिशान नहीं मिलता। सिर्फ एक साखी उपलब्ध है- जब तक जीना है, सुखपूर्वक जीओ, कर्ज लेकर घी पीओ, एक बार देह जल जाए, तो वापिस आना कैसा?  इस दुखवादी दुनिया में सुख की हिमायत करना जिगर का काम रहा होगा। चार्वाक बहुत लोकप्रिय थे, इसलिए उनके विचार का एक नाम लोकायत है। चार्वाक शब्द का अर्थ ही है ‘चारू वाक’। 

जैसे भारत में चार्वाक थे, वैसे ही ग्रीस में थे एपीकुरस। एपीकुरस की कम से कम एक मूर्ति उपलब्ध है, चार्वाक की तो कोई छवि ही नहीं है। हो सकता है कि वह एक मिथक हों। ओशो के दर्शन में फिर से एक बार चार्वाक और एपीकुरस जिंदा हो गए हैं। चार्वाक इंद्रियों का सम्मान करते थे, ओशो ने फिर से इंद्रियों की गरिमा स्थापित की है। ओशो कहते हैं, ‘यह दुनिया आज तक दुखवादी रही है, मानो दुख में कोई बहुत आध्यात्मिकता है।

आज इस धरती पर अगर अधिकांश लोग दुखी हैं, तो इसके लिए दार्शनिक और धार्मिक लोग जिम्मेदार हैं। उन्होंने सुख पर या संसार का मजा लेने पर पाबंदी लगा रखी है। पूरी दुनिया की संस्कृति ने सुख को स्वीकार नहीं किया है।’ मगर अब पूरी धरती पर सुखवाद का आलम है। पृथ्वी पर जितनी संपन्नता बढ़ती जाती है, लोग स्वभावत: विलासिता की जिंदगी जीना चाहते हैं। नई पीढ़ी दुख को कोई आध्यात्मिक मूल्य नहीं मानती। अब पूरी दुनिया मानो चार्वाक की अनुयायी बन गई है।
    अमृत साधना

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