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नोटबंदी में छिपी अपनी-अपनी उम्मीदें

नोटबंदी ने आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक प्याले में भी हलचल पैदा कर दी है। अभी दो तरह की तस्वीरें हम देख रहे हैं। एक में लोग इस फैसले को हाथोंहाथ लेते दिख रहे हैं। वे प्रधानमंत्री मोदी की इस सोच के साथ जुड़ रहे हैं कि काले धन के खिलाफ अब निर्णायक जंग छेड़नी है। उन्हें उम्मीद है कि सिस्टम जिस तरह से सड़ गया था, उसमें सुधार होगा। 

उनमें यह भावना पनप रही है कि चूंकि देश में कुछ लोगों के पास अकूत धन रहा है, इसलिए नोटबंदी के बाद अब आम और खास, सब एक धरातल पर आ गए हैं। मगर दूसरी तस्वीर बताती है कि देश में करेंसी की कमी हो गई है। एटीएम काम नहीं कर रहे हैं। नए नोट देने लायक उनमें अब तक तकनीकी सुधार नहीं हो सका है। देश में दो लाख से ज्यादा एटीएम में से सिर्फ 10-15 हजार काम कर रहे हैं, और देश कतार में खड़ा है।

ये दोनों पहलू बताते हैं कि अब भी लोगों की लंबी-लंबी कतारें बनी रहीं, उनकी मुश्किलें कम नहीं हुईं, आम जन को खाने के लाले हुए और किसानों की समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो लोग बिफर सकते हैं। फिर जिस फायदे की उम्मीद भाजपा पाल रही है, वह निश्चित तौर पर विपक्ष को मिलेगा। मगर हां, यदि इन तमाम मुश्किलों के बाद भी आम लोगों की रोजी-रोटी चलती रही, तो गेंद सरकार के पाले में ही रहेगा।

बहरहाल, विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार की घेराबंदी में जुट गया है। ममता बनर्जी की बात सीताराम येचुरी से हो रही है, जिसकी कल्पना एक महीना पहले तक कोई नहीं कर सकता था। यह नई दोस्ती किस दिशा में आगे बढ़ेगी, यह तो अगले कुछ दिनों में स्पष्ट होगी। मगर अभी सच यह भी है कि विपक्ष एकजुट नहीं है। उसमें दो-तीन मसलों को लेकर मतभेद हैं, जिनमें सरकार को घेरने की रणनीति प्रमुख मुद्दा है। 

ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, उमर अब्दुल्ला जैसे मुखर नेताओं की मांग है कि सरकार तत्काल इस कदम को वापस ले। मगर बाकी विपक्षी दलों की राय इससे अलग है। उन्हें लगता है कि इससे आम जनता में गलत संदेश जाएगा। साफ है कि विपक्ष फिलहाल एक द्वंद्व में है। एक तरफ, वह चाहता है कि जनता में यह संदेश न चला जाए कि काला धन का हिमायती होने के कारण वह नोटबंदी का विरोध कर रहा है, जबकि दूसरी तरफ वह यह साबित करने में जुटा है कि सरकार की पर्याप्त तैयारी न होने की वजह से आम जनता त्रस्त है, लिहाजा नोटबंदी गलत है। कहा यह भी जा रहा है कि मोदी सरकार के इस कदम से 87 फीसदी करेंसी, जो हजार और पांच सौ रुपये के नोटों की शक्ल में थी, चलन से बाहर हो गई है और देश 13 फीसदी करेंसी के लिए जूझ रहा है। 

इस संदर्भ में जब मोरारजी देसाई की सरकार के समय हुई नोटबंदी को लेकर सवाल उछाला जाता है, तो उसका जवाब यह आता है कि तब तकरीबन दो फीसदी लोग ही उससे प्रभावित हुए थे।

इन सबसे इतर कुछ सवाल और भी हैं। मसलन, देश में नोट पर्याप्त संख्या में हैं कि नहीं? अभी जरूरत के मुताबिक करेंसी छापने की हमारी क्षमता कितनी है? पर्याप्त मात्रा में नए नोट के आने में कितना वक्त लगेगा? और इसका आम लोगों पर कितना असर पडे़गा? अगर इन तमाम सवालों से निपटते हुए केंद्र सरकार मौजूदा अराजक व्यवस्था को दुरुस्त कर लेती है, तो अगले विधानसभा चुनावों में भाजपा अपने लिए बड़ी उम्मीद देख सकती है। मगर यदि ऐसा नहीं हो सका, तो उसका यह दांव उल्टा पड़ सकता है। 

इसे इस रूप में भी समझ सकते हैं कि सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने पार्टी से रामगोपाल यादव के निष्कासन को रद्द कर दिया है। साफ है कि आपस में सुलह हो रही है। अगर उनमें अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री चेहरा बनाने पर आपसी सहमति बन गई और इधर, नोटबंदी के बाद पैदा हुई अराजकता से निपटने में केंद्र सरकार विफल रही, तो उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए उम्मीद कम हो सकती है। इसकी एक वजह अखिलेश यादव भी हैं, जिनके प्रति सूबे के युवाओं में वही आकर्षण है, जो 2014 के चुनावों में नरेंद्र मोदी के प्रति था। 

इन्हीं उम्मीदों को पाले हुए तमाम विपक्षी दल अपने-अपने मतदाता वर्ग को साधने में जुट गए हैं। ममता गरीब तबकों की नुमाइंदगी करती हैं, इसलिए वह नोटबंदी के बहाने उनकी मुश्किलों की बात कर रही हैं, तो अरविंद केजरीवाल अपने व्यापारी वर्ग की, जो भाजपा का भी परंपरागत वोटर रहा है और नोटबंदी के कारण उससे नाराज है। हालांकि कुछ चीजें स्पष्ट होनी अभी बाकी हैं। 

मसलन विपक्षी दल यदि एकजुट हुए, तो उनका नेतृत्व कौन करेगा- कांग्रेस, तृणमूल या फिर कोई और? वे किस राह पर आगे बढ़ेंगे? यानी सरकार से टकराने की तैयारी तो की जा रही है, मगर इसका स्वरूप अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है। मेरा मानना है कि यह काफी कुछ नोटबंदी के बाद पैदा हुई मुश्किलों से सरकार के लड़ने के तरीके से तय होगा। अगर इसमें मोदी सरकार सफल हुई, तो फिर उसके लिए कई दरवाजे खुल जाएंगे।

संभव है कि आने वाले दिनों में राजनीतिक व चुनावी सुधार की ओर भी हम बढ़ें, जिसकी ओर खुद प्रधानमंत्री मोदी ने इशारा किया है। और यदि ऐसा न हो सका, तो फिर यह केंद्र सरकार के लिए बड़ा झटका होगा। मुश्किलें सरकार के  सहयोगी भी पैदा कर सकते हैं। नोटबंदी के फैसले पर शिवसेना का सुर एनडीए सरकार के खिलाफ है। बेशक गृह मंत्री राजनाथ सिंह की शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से बात हो रही है, मगर यदि सदन में कार्य स्थगन प्रस्ताव लाया जाता है, तो वोटिंग में शिवसेना का अलग होना सरकार की फजीहत करा सकता है। 

ऐसे में, संभव है कि सरकार आम लोगों की मुश्किलों को और कम करने की कोशिश करेगी। नोटबंदी में छूट की सीमा भी बढ़ाई जा सकती है। हालांकि मोदी सरकार मौजूदा परिस्थिति से निपटने के लिए लगातार हाथ-पांव मार रही है, जिससे साफ है कि उसने आधी-अधूरी तैयारी के साथ यह फैसला लिया है। बेशक यह कदम झटके से उठाया जाना चाहिए था और ऐसा किया भी गया है, मगर पूर्व-तैयारी जैसे प्रमुख पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए था।

किसी विचार को जैसे-तैसे क्रियान्वित करना और उसे बेहतर तरीके से लागू करना, दोनों अलग चीजें हैं। फिर भी उम्मीद यही है कि बाजार में नए नोट पर्याप्त मात्रा में आएंगे और कतारों में खड़े लोगों की मुश्किलें खत्म होंगी। ऐसा अगर अगले कुछ दिनों में हो गया, तो नोटबंदी का कदम भाजपा का ‘मास्टर स्ट्रोक’ माना जाएगा। अगर नहीं, तो फिर विपक्ष की चांदी आने वाली है। जाहिर है, आने वाले दिन सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के लिए खास हैं।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title: expectations hidden in big noteban