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सबको बुला रहा है मेरा निंदा क्लब

मैंने अपना निंदा क्लब खोल लिया है। जब से खोला है, बडे़ चैन में हूं। नींद सॉलिड आती है और अक्खा दिन मूड मस्त रहता है। निंदा रस सबसे अनमोल रस है। जो इसमें डूबा, वही पार गया। जो न डूबा , वह डूब गया। बिहारीजी ने कहा भी है- तंत्री नाद कवित्त रस, सरस राग रति रंग/ अनबूड़े बूड़े तिरे जे बूडे़ सब अंग।  आप तंत्री की जगह निंदा कर लीजिए और निंदा रस में डूबने का आनंद लीजिए। यूं तो अपने क्लब का टाइम तय है, लेकिन जरूरत होने पर बे-टाइम भी खुलता है। सबसे अच्छा टाइम ब्रह्म वेला है। तब निंदा रस ‘ब्रह्मानंद सहोदर’ की अवस्था को प्राप्त होता है। नित्य दो घंटे सिर्फ साहित्य को समर्पित होते हैं। इन दो घंटों में न मुझे बैंकों के आगे लगी लाइनें दिखती हैं, न ई-बटुए की हैकिंग की फिक्र होती है, और न सब्जी-दाल की चिंता ही सताती है- चाह गई चिंता मिटी मनुआ बेपरवाह!

ध्यान में रहती है, तो सिर्फ साहित्यबाजी। नित्य पूजनीय, लूजनीय, सूजनीय, जूझनीय, चूजनीय, भूजनीय, फ्यूजनीय मित्रों की साहित्य लीलाएं याद आने लगती हैं। जब तक दस-पांच नहीं नप जाते, तब तक सुबह की चाय का स्वाद नहीं आता। हर लेखक की फाइल खुल जाती है और ‘यथागुण अलंकार’ जहां-तहां लगने लगता है। आगे-पीछे का हिसाब होने लगता है- यह करियरिस्ट है, वह अपॉच्र्यूनिस्ट है। वह साहित्य का जेबकतरा है। वह नक्काल है। यह उसका चमचा है। यह इसकी पूंछ है, वह उसका लठैत है। वह सबका है और किसी का नहीं। वह झूठा है। वह चापलूस है। वह उसे लेखक बनाने पर तुला है। वह लेखिका बनाता रहता है। एक दिन अंदर होगा देख लेना। उसे एक लाइन लिखना तक नहीं आता...।

ब्रह्म वेला में सरस्वती जाग जाती हैं। सबकी भूरि-भूरि प्रशंसा होने लगती है और साहित्य का सारा बोझ उतर जाता है। मन हल्का हो जाता है। शुक्लजी से लेकर द्विवेदीजी तक प्रेमचंद-प्रसाद से लेकर आज के खद्योतों तक, सबकी कलई खुल जाती है। महानता के गुंबद गिर जाते हैं। साहित्य के हमाम के सभी देवता नंगे नजर आते हैं। मेरा मन नए-नए निंदात्मक आइडियाज के आकाश में उड़ने लगता है। उत्साह का स्थायी भाव संचरित हो वीरमुद्रा में कहने लगता है: कंदुक इव ब्रह्मांड उठावों  या धरती में धंसों के अकासहिं चीरों।

नोटबंदी के इस घोर साहित्यावरोधी समय में अगर आपको साहित्य में जीना-मरना है, तो मेरे निंदा क्लब के साथ अपने को तुरंत रजिस्टर कर लीजिए। रजिस्ट्रेशन फ्री है। अपनी ब्रांच खोल लीजिए। नित्य ब्रह्म मुहूर्त में अपनी सरस्वती जागृत कीजिए और निंदा रस का निर्मल आनंद लीजिए। कुछ लोग संगठन बनाते हैं, समारोह-सम्मेलन करते-कराते हैं- प्रशस्तियां गाते-गवाते हैं- कुछ साठ साला, सत्तर-पिचहत्तर साला, अस्सी-नब्बे साला का धंधा करते-कराते रहते हैं। वे इस चक्कर में फंसे हैं, उनको फंसे रहने दीजिए।

ध्यान रखिए ,‘मूर्ख मकान बनाया करते हैं, अक्लमंद उनमें रहा करते हैं’। इसी तरह , मूर्ख संस्थाए बनाते हैं, आप उनकी निंदा करके मजा लेते हैं। आपकी निंदा पाने के लिए ही तो वे यह सब करते हैं। वे जानते हैं कि स्तुति झूठी होती है, सच्ची सिर्फ निंदा होती है। कायर स्तुति करते हैं, साहसी निंदा करते हैं। निंदा की ही कीमत है। स्तुति तो फ्री में मिलती है। इसीलिए मैं कहता हूं कि जब हृदय हो डांवाडोल, तब हे साहित्यकार तू मन से बोल: निंदा शरणम् गच्छामि। पचौरी निंदा क्लब विजिटयामि।
 

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  • Web Title:everyone calling by my ninda club