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कम बारिश में भी फलता-फूलता अभयारण्य

दिल्ली में इस बरसात में एक अजीब बात हुई है। लगभग पूरी दिल्ली में इस बार सामान्य बारिश हुई है, कुछेक जगहों पर सामान्य से ज्यादा बारिश हुई है, पर पूर्वी दिल्ली और उससे जुडे़ गाजियाबाद व नोएडा जैसे उपनगरों में बहुत कम बारिश हुई है।

दो दिन पहले खबर आई थी कि पूर्वी दिल्ली में     -98 प्रतिशत यानी सामान्य की कुल दो प्रतिशत हुई है। और हम इन्हीं इलाकों के वासी हैं। लेकिन यहां यह सब लिखने का उद्देश्य अज्ञानी लोगों को यह बताना है कि अगर बढ़िया जल प्रबंधन हो, तो कम बारिश से कोई फर्क नहीं पड़ता।

हमारे इलाके में बारिश होने का एक उद्देश्य यह है कि उससे पर्याप्त मात्रा में कीचड़ हो जाए और जो गड्ढे हैं, उनमें पानी भर जाए। यहां पानी को जमा करने के लिए असंख्य गड्ढे हैं, सड़कों पर गड्ढे हैं और जहां सड़कें नहीं हैं, वहां भी हैं। इसी तरह, जहां सड़कें हैं, वहां और जहां नहीं हैं, वहां भी, कीचड़ होने का इंतजाम है। दूसरी अच्छी बात यह है कि पानी की निकासी का कोई इंतजाम नहीं है, जिससे पानी गड्ढों में बना रहता है। सुना है, कुछ जगहों पर सीवर में पानी चला जाता है, यहां पानी सीवर से निकलकर सब जगह भर जाता है। इससे फायदा यह होता है कि अगर थोड़ी भी बारिश हो जाए, तो जो कीचड़ बनता है और गड्ढों में जो पानी इकट्ठा होता है, वह महीनों बना रहता है।

यहां तरह-तरह के गड्ढे हैं। कुछ में अपेक्षाकृत साफ पानी रहता है, कुछ में ज्यादा गंदला, कुछ में भयानक बदबूदार। इससे तमाम प्रजातियों के मच्छर और कीड़े-मकोडे़ अपनी-अपनी दिलचस्पी के मुताबिक पानी में अंडे दे सकते हैं। यानी यह क्षेत्र मच्छर मक्खियों और कीड़े-मकोड़ों का अभयारण्य है। जैसे पक्षी अभयारण में दूर-दूर से पक्षी आकर अंडे देते हैं, वैसे ही सुना है कि साइबेरिया, पश्चिमी यूरोप, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया हर जगह से मच्छर, मक्खियां यहां अंडे देने आती हैं। इस कीट अभयारण्य की ऐसी छटा है कि यहां आने-जाने-रहने वाले इंसान भी कीड़े-मकोड़ों जैसे दिखने लगते हैं। यहां ऐसा बहुत कुछ है, जिसके लिए कम बारिश अभिशाप नहीं, वरदान है।
राजेन्द्र धोड़पकर

 

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