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छोड़ो कल की बातें

नया साल तो आ गया। उसके स्वागत में दिल खोलकर जश्न भी मनाया गया, लेकिन क्या हमारा मन भी नया हुआ है? क्या आज में जीने के लिए हम अपने कल को विदा कर पाए? नए साल के आने में हमारा कोई हाथ नहीं है, उसके लिए हमने कोई प्रयास नहीं किया। वह तो अस्तित्व के नियमानुसार स्वत: आ गया। वह अपने आप में न नया है, और न पुराना। वह तो पृथ्वी के घूमने से    पैदा हुई एक भौगोलिक स्थिति है। यदि मानें, तो रोज ही नया होता है। सवाल यह है कि हमारा चित्त नया कैसे हो सके? वह इतना आसान नहीं है। नए चित्त के लिए सबसे पहले हमारे मन में, मस्तिष्क में जहां-जहां पुराना हावी है, उसे जागरूकता से छोड़ने का प्रयास करें।

यह प्रयास साल में एक दिन नहीं करना है, प्रति दिन और प्रति पल करना होता है, क्योंकि मन लगातार धूल इकट्ठा करता रहता है। हर रोज जीया हुआ जीवन, अनुभव, स्मृतियां बनकर दिमाग में खुद जाती हैं। उन्हें निकाल बाहर करने का कोई तरीका हम नहीं जानते। जिस तरह हम हर रोज शरीर का स्नान करते हैं, वैसे ही हर दिन मन का स्नान करें। आप रोज ही नयापन महसूस करेंगे। ओशो कहते हैं कि सिर्फ दुखी आदमी ने उत्सव ईजाद किए हैं। और सिर्फ पुराने पड़ गया चित्त, जिसमें धूल ही धूल जम गई है, नया साल मनाने को उत्सुक होता है। यह धोखा पैदा करता है थोड़ी देर। कितनी देर नया दिन  टिकता है? एक दिन के लिए हम अपने को झटका देकर जैसे सारी धूल को झाड़ लेना चाहते हैं। उससे कुछ होने वाला नहीं है। जीवन एक धारा है, एक बहाव है, जो रोज नई होती है। 

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  • Web Title:chodo kal ki batey