अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

चुनाव सुधार का सबसे माकूल वक्त

राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले नकद चंदे की सीमा 20,000 रुपये से घटाकर 2,000 रुपये करने की सिफारिश करके चुनाव आयोग ने बहुत सारे लोगों की पेशानी पर बल डाल दिया है। इसने लंबे समय से टाले जा रहे चुनाव सुधार को भी हवा दी है, जो हाल के कई नाटकीय घटनाक्रम के कारण बहस के केंद्र में है। इन सबकी शुरुआत तब हुई, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा, विधानसभा और पंचायती राज- तीनों स्तर के चुनाव को एक साथ कराने की बात कही, ताकि चुनावी खर्च कम हो। फिर, एक बहस चल पड़ी। इसके पक्ष और विपक्ष में तमाम तर्क परोसे जाने लगे। इसका कोई सार्थक नतीजा निकल पाता, इससे पहले ही प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की अपनी क्रांतिकारी योजना लागू कर दी। बेशक जिस उद्देश्य के साथ नोटबंदी की घोषणा की गई, वह थी, काले धन की बीमारी को जड़ से खत्म कर देना।

मगर कई लोगों की नजर में केंद्र सरकार का यह प्रयास विपक्षी पार्टियों के खिलाफ चालाकी से उठाया गया एक कदम था, ताकि अगले कुछ महीनों में पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में इस्तेमाल के लिए रखा गया उनका धन रद्दी कागज में बदल जाए। मेरी नजर में नोटबंदी एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसके बहाने इन चुनावों में काले धन की भूमिका की पड़ताल हो सकती है। इसी बीच प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के तमाम सांसदों-विधायकों को यह निर्देश दिया कि वे नोटबंदी के बाद किए गए अपने सभी वित्तीय लेन-देन से पार्टी अध्यक्ष को अवगत कराएं। यह पारदर्शिता लाने की तरफ बढ़ाया गया एक कदम था।

हालांकि कई ने यह सवाल भी उठाए कि इस बैंकिंग लेन-देन का खुलासा सिर्फ पार्टी अध्यक्ष के सामने ही क्यों हो, आम जनता के सामने क्यों न हो? मगर मेरी नजर में यह पॉलिटिकल फंडिंग में पारदर्शिता लाने की दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है, जिसकी मांग पिछले दो दशकों से निर्वाचन आयोग करता रहा है। बेशक अब तक संसद के अंदर व बाहर कई कमेटियों और विधि आयोग ने चुनावों में स्टेट फंडिंग की जरूरत पर समय-समय पर चर्चा की है, जो उनकी नजर में चुनावों में काले धन के इस्तेमाल को रोकने का मुफीद रास्ता है। मगर नतीजा सिफर रहा। चुनाव आयोग भी इस मसले को उठाता रहा, पर बात कहीं पहुंची नहीं। हालांकि चुनाव आयोग खुद स्टेट फंडिंग का हिमायती नहीं है।

साल 2010 में चुनाव आयोग ने चुनावों में काले धन के खिलाफ जंग की घोषणा करते हुए एक पहल शुरू की और तमाम चुनावी खर्चों पर नजर रखने वाले एक निगरानी विभाग की स्थापना कर दी। इसका नेतृत्व केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के आयुक्त स्तर के अधिकारी के हाथ में था। व्यापक दिशा-निर्देश तय किए गए और इनकम टैक्स अधिकारियों के साथ मिलकर चुनाव व काले धन के गठजोड़ को तोड़ने का काम शुरू किया गया। तब अरबों रुपये जब्त किए गए। शुरुआती दौर में, इसका बेहतर नतीजा निकला, पर बदलते वक्त के साथ दलों ने वोटरों के बीच रुपये बांटने के नए रास्ते खोज लिए। आचार संहिता लागू होने से कुछ हफ्ते पहले ही तिकड़म भिड़ाए जाने लगे। लिहाजा मैं मानता हूं कि नोटबंदी ने उचित समय पर रुपयों की इस बंदरबांट को चोट पहुंचाई होगी।
वैसे, चुनाव आयोग के दो कदमों ने चुनाव सुधार की बहस को गरम किया है।

पहला, चुनावी चंदे का मसला है, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। और दूसरा, चुनाव आयोग ने आयकर विभाग को ऐसे 250 राजनीतिक दलों के बैंक अकाउंट की जांच करने के लिए पत्र लिखा है, जिन्होंने साल 2005 के बाद से कोई चुनाव नहीं लड़ा है, जबकि लगातार वे धन उगाहते रहे और टैक्स का लाभ लेते रहे हैं। चुनाव आयोग के ये दोनों कदम लाजवाब हैं। राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का 75-80 फीसदी भाग नकदी में होता है, जिसका खुलासा नहीं किया जाता, लिहाजा शक बना रहता है। इसलिए नकद चंदे की सीमा 2,000 रुपये करने से पारदर्शिता आएगी। हालांकि बेहतर तो यह होगा कि सियासी दलों के तमाम लेन-देन कैशलेस होने चाहिए, जिसकी उम्मीद अब सब्जी वाले और ऑटो चालकों तक से की जा रही है। वहीं, 250 पार्टियों को ‘डीलिस्ट’ करने से काले धन को सफेद करने संबंधी इन पर लगे आरोपों की पड़ताल हो जाएगी।

अब जब प्रधानमंत्री ने चुनाव सुधार को अपनी प्राथमिकता में सबसे ऊपर रखने की घोषणा की है, तो मैं भी कुछ खास सलाह देने से खुद को नहीं रोक पा रहा। पहली, उम्मीदवारों की तरह सियासी दलों के लिए भी खर्च की सीमा तय की जाए। दूसरी, सियासी दलों को (चुनावों को नहीं) राज्य द्वारा फंड दिए जाने पर विचार हो और निजी चंदे पर पूरी तरह रोक लगे। तीसरी, एक स्वतंत्र राष्ट्रीय चुनाव कोष का गठन हो, जहां सभी कर-मुक्त चंदे जमा किए जाएं और जिसका संचालन चुनाव आयोग या कोई अन्य स्वतंत्र निकाय करे। चौथी, एक स्वतंत्र ऑडिटर सभी दलों का सालाना ऑडिट करे और उसकी रिपोर्ट वेबसाइट पर डाली जाए, ताकि आम लोग भी देख सकें। पांचवीं, दलों के कामकाज में आंतरिक लोकतंत्र व पारदर्शिता लागू हो। छठी, केंद्रीय सूचना आयोग यानी सीआईसी के फैसले के अनुसार सभी दल सूचना के अधिकार के दायरे में लाए जाएं।

सातवीं, चुनाव आयोग के इस प्रस्ताव को माना जाए कि जिस चुनाव में पैसे के दुरुपयोग के विश्वसनीय सबूत हों, उसे रद्द करने का कानूनी अधिकार उसके पास हो। आठवीं, उन उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर रोक लगे, जिनके खिलाफ अदालत में जघन्य आपराधिक मामले चल रहे हों। नौवीं, चुनाव आयोग को यह अधिकार मिले कि वह उन तमाम दलों की मान्यता रद्द कर सके, जिन्होंने दस वर्षों से कोई चुनाव नहीं लड़ा हो और अभी तक करों में छूट का फायदा उठा रहे हों। और दसवीं, पेड न्यूज (पैसे देकर मीडिया द्वारा मतदाताओं को प्रभावित करना) को चुनावी अपराध बनाया जाए और इसे जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 100 के तहत ‘भ्रष्ट आचरण’ और धारा 123 (2) के तहत ‘अनुचित प्रभाव’ मानते हुए ऐसा करने वालों के लिए दो साल की कैद का प्रावधान हो।

प्रधानमंत्री द्वारा खुद चुनाव सुधार के मसले को उठाने के कारण अब इसका वक्त आ गया है। उम्मीद है कि तमाम राजनीतिक दल इसे लेकर एकजुटता दिखाएंगे। यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया भर में भारत की इज्जत सिर्फ इसी वजह से नहीं है कि यह एक बड़ा लोकतंत्र है, बल्कि यह सबसे जीवंत भी है। चुनाव सुधार निश्चय ही इस लोकतंत्र को दुनिया में सबसे महान बना सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:best time for election reform