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31 मई, 2020|12:07|IST

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तुम तो फिर भी एक बैल हो

ऐसा कम ही होता है कि हमारे हिंदुत्ववादी भाइयों से कुछ उम्मीद की जाए और वे पूरा न करें। बल्कि जितनी उम्मीद होती है, उससे कुछ ज्यादा ही वे प्रदर्शन करते हैं। लेकिन इस बार वे उम्मीद पर खरे नहीं उतरे। सोचा यह था कि कहीं भी गोवंश पर अत्याचार होगा, तो हमारे भाई लोग लाठी वगैरह लेकर वहां गोवंश की रक्षा के लिए पहुंच जाएंगे।

पिछले दिनों वे गोहत्या और गोमांस के शक की वजह से न जाने कितने लोगों को पीट चुके हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पांच इंसानों की वे जान ले चुके हैं। यह बात और है कि कहीं भी गोहत्या या गोमांस का कोई सुबूत नहीं मिला। लेकिन इसमें उनकी कोई गलती नहीं।

यह उम्मीद थी कि तमिलनाडु में जल्लीकट्टू के दौरान बैलों पर जो अत्याचार होते हैं, उन्हें रोकने के लिए अपने भक्त सक्रिय हो जाएंगे। जल्लीकट्टू में बैल और इंसान बुरी तरह जख्मी होते हैं। उसमें बैलों को उकसाने के लिए उन्हें शराब पिलाई जाती है, उनके गुप्तांगों में मिर्च लगाई जाती है, उन्हें तीखे हथियारों से जख्मी किया जाता है।

पिछले दिनों जब सरकार ने इस खेल से पाबंदी हटा ली, तो सुना है कि तमिलनाडु के बैलों का एक प्रतिनिधि भक्त परिवार के पास आया था। भक्तों ने कहा- 'नो तमिल, तमिल नहीं आती।' बैल ने टूटी-फूटी हिंदी में अपनी व्यथा कही, तो भक्तों ने कहा- 'देखिए, गोवंश की हमारी परिभाषा में सिर्फ हिंदीभाषी गाय-बैल आते हैं। तमिल गाय-बैल हमारे लिए पूज्य नहीं हैं। यू नो, यू आर नॉट अ आर्यन बुल, यू आर अ द्रविडि़यन बुल, और द्रविड़ बैलों का मसला हमने जयललिता जी पर छोड़ दिया है।' बैल ने कहा- लेकिन वे तो हमें पिटवाने के पक्ष में हैं।

भक्त ने कहा- सच्ची बात यह है कि हम भी गोवंश के नहीं, पीटने के समर्थक हैं। जैसे भी हो, मारपीट होनी चाहिए। यहां गाय के बहाने हम इंसानों को पीट देते हैं, तमिलनाडु में इंसानों के बहाने बैलों की धुनाई हो जाती है। मामला वोटों का है, वोट के लिए हम अपने पिताश्री को नहीं मानते, तुम तो बैल हो। अब बैल के पास सुप्रीम कोर्ट जाने के अलावा चारा भी क्या था?
राजेन्द्र धोड़पकर