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देशद्रोह के आरोप की गिरफ्त में फिर आया लेखक

एक लेखक ने फेसबुक पर अपनी कृति का एक अंश पोस्ट किया, कुछ लोगों को यह राष्ट्रगान का अपमान लगा, उन्होंने पुलिस में शिकायत कर दी। हरकत में आई पुलिस ने आनन-फानन में लेखक को राष्ट्रद्रोह के केस में आरोपी बनाते हुए गिरफ्तार कर लिया। यह सब भी तब हुआ, जब लेखक अग्रिम जमानत के लिए अदालत जाने की तैयारी में था। यह वाकया है केरल का, जहां मलयालम लेखक और रंगकर्मी कमल चवारा को पुलिस ने राष्ट्रद्रोह यानी आईपीसी की धारा-124ए के अंतर्गत गिरफ्तार किया। उन पर आरोप है कि उन्होंने फेसबुक पर अपने ताजा उपन्यास का एक अंश पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने लिखा- हर दिन चार बजे स्कूल में राष्ट्रगान के लिए खड़ा होना पड़ता था, लेकिन लघुशंका उनके लिए जन-गण-मन से ज्यादा अहम थी, लिहाजा वह स्कूल के सबसे अनुशासनहीन छात्र थे।

संभव है कि कुछ लोगों को इसमें राष्ट्रगान का अपमान दिखता हो, मगर उस किताब और प्रसंग को समग्रता में देखा जाना चाहिए। दंड संहिता की धारा-124ए साफ तौर पर कहती है कि कोई भी व्यक्ति, जो अपने लेखन से या भाषण से या अपने क्रिया-कलापों से विधि द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ घृणा या विद्रोह की चिनगारी को हवा देता हो, इसमें आरोपित हो सकता है। लेकिन इस कानून में ही यह व्याख्या भी की गई है कि किन परिस्थितियों में लेखन, भाषण आदि राष्ट्रद्रोह नहीं होते हैं। सवाल यह उठता है कि इस तरह का लेखन राष्ट्रद्रोह कैसे हो गया? ज्यादा से ज्यादा पुलिस इस मामले में भावनाओं को आहत करने के लिए धारा-295ए लगा सकती थी।

इस पूरे मसले पर सबसे दिलचस्प बयान केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री विजयन का आया है, जिन्होंने इसके लिए राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की सांप्रदायिक राजनीति को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि संघ परिवार से जुड़े लोग लेखक को मुस्लिम राष्ट्रद्रोही करार दे रहे थे और सांप्रदायकिता का जहर फैला रहे थे। अगर ऐसा था, तो क्या सरकार शिकायतकर्ताओं के दबाव में काम करती है? क्या कानून की धारा का उपयोग पुलिस किसी की मंशा को ध्यान में रखकर लगाती है या फिर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर? सच तो यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ध्वजवाहक होने का दावा करने वाली वामपंथी विचारधारा की सरकार ने भी वही किया, जिसका आरोप उनके नेता दिल्ली पुलिस पर लगाती रही है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर जब राष्ट्रद्रोह की धारा लगाकर उसको गिरफ्तार किया गया, तो वामपंथियों का इल्जाम था कि दिल्ली पुलिस मोदी सरकार के इशारे पर अभिव्यक्ति की आजादी को दबाना चाहती है।

यही चरित्र उस वक्त पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिला था, जब वामपंथियों की सरकार ने कोलकाता में निर्वासित जीवन बिता रही तस्लीमा नसरीन को सूबे से निकाल दिया था। दरअसल सत्ता का चरित्र एक जैसा होता है। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उसका व्यवहार करीब-करीब एक जैसा होता है। तमिल लेखक मुरुगन के मामले में भी ऐसा ही हुआ था। स्थानीय विरोध और पुलिस और प्रशासन के जबरन माफीनामे के बाद उन्होंने एक लेखक की मौत का एलान कर दिया था। मामला जब मद्रास हाईकोर्ट में पहुंचा, तो विद्वान न्यायाधीश संजय किशन कौल ने करीब एक सौ साठ पन्नों का ऐतिहासिक फैसला दिया। फैसले में लेखकीय स्वतंत्रता को कायम रखने पर जोर देते हुए कहा गया है कि अगर कोई किसी किताब से इत्तिफाक नहीं रखता है या उसमें लिखे हुए शब्दों से उसकी भावनाएं आहत होती हैं, तो वह उसको अलग रख दे। फैसले में साफ कहा गया है कि कोई भी चीज, जो पहले स्वीकार्य न हो, वह बाद में स्वीकार की जा सकती है। न्यायाधीश ने इस संबंध में लेडी चौटर्लीज लवर का उदाहरण भी दिया।

अब वक्त आ गया है कि राष्ट्रद्रोह की इस धारा पर देशव्यापी बहस होनी चाहिए। जब संविधान बना था, तब देश की स्थितियां कुछ और थीं और 70 साल बाद देश काफी बदल चुका है और बदल चुकी है देश के नेताओं की मानसिकता। पुलिस इस धारा का बेजा इस्तेमाल न कर सके, इसके लिए जरूरी है कि या तो संसद या फिर देश की शीर्ष अदालत इस कानून की उन स्थितियों को साफ करे, जिनमें देशद्रोह की धारा लग सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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  • Web Title:author arrested in charge of treason