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किसानों के भी हमदर्द थे अंबेडकर

किसानों के भी हमदर्द थे अंबेडकर

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का जिक्र आते ही भारतीय संविधान के निर्माण में उनके योगदान या अस्पृश्यों के उद्धार की उनकी कोशिशों को याद किया जाता है। मगर बाबा साहब को अर्थव्यवस्था की कितनी बारीक समझ थी, यह कम ही लोग जानते हैं।

एक गरीब और अस्पृश्य परिवार में जन्म लेने वाले बाबा साहब को अच्छी तालीम मिली। चूंकि उनके पिता ब्रिटिश आर्मी में थे, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश पर खासा ध्यान दिया। वह बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में व्यक्तिगत रुचि लिया करते थे। अच्छी तालीम का ही नतीजा था कि बाबा साहब ने छोटी-सी उम्र में एक किताब लिखी, जिसका शीर्षक था- स्मॉल होल्डिंग्स इन इंडिया। उनकी इस किताब को लोग ज्यादा याद नहीं करते, जबकि किसानों की जिन-जिन समस्याओं से हम आज रूबरू हैं, उसकी झलक बाबा साहब ने सौ साल पहले ही इस किताब में दे दी थी। यह पुस्तक बताती है कि यदि परिवर्तन नहीं हुआ, तो किसानों की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती चली जाएगी। सच भी यही है कि आज हमारे अन्नदाता बदहाल हालत में पहुंच गए हैं और बदलाव की बाट जोह रहे हैं।

बाबा साहब ने इस किताब में कुछ सुझाव भी पेश किए थे। उनका मानना था कि अगर सरकार अपनी योजनाओं में उनके मशविरों को शामिल कर ले, तो किसानों की दशा काफी सुधर सकती है। आज हम किसानों की कर्ज-माफी की रट लगा रहे हैं, मगर बाबा साहब की नजरों में यह एक छोटा-सा घटक है, दूसरी चीजें कहीं ज्यादा जरूरी हैं। उन्होंने जोर देकर कहा था कि अगर हम संजीदा हों, तो स्मॉल होल्डिंग यानी छोटा रकबा भी फायदेमंद बन सकता है। उन्होंने उपायों में कर्ज का जिक्र तो किया ही था, खेती-किसानी को आधुनिक बनाने और किसानों को इसके लिए प्रशिक्षित करने की बात भी कही थी। उन्होंने समय के साथ-साथ आने वाले तमाम बदलावों को किसानों से साझा करने की वकालत की थी। 

उनका कहना था कि हमारा अंतिम उद्देश्य होना चाहिए- किसान की क्षमता बढ़ाना। उनकी नजर में किसान कभी भी पूंजीपति नहीं हो सकता। वह एक के बाद दूसरी और फिर तीसरी फसल उपजाता है, और चूंकि उसके पास पर्याप्त पूंजी नहीं होती, इसलिए एक फसल को बेचकर  दूसरी फसल की तैयारी करता है। ऐसे में, यदि किसानों ने एक साल अच्छी कमाई कर भी ली, तो अगले साल सूखा पड़ने की स्थिति में उनकी दशा फिर से वही हो जाएगी। लिहाजा जरूरी यह है कि सरकार अपनी उचित भूमिका निभाते हुए किसानों के लिए ऐसी स्थिति बनाए कि वे उचित दाम पर अपनी फसल बेच सकें। इसके साथ-साथ बाबा साहब ने किसानों को बिचौलिए से बचाने की बात भी कही थी। मगर दुर्भाग्य यह है कि सौ साल पहले भविष्य का खाका खींच दिए जाने के बाद भी हम इस दिशा में सक्रिय नहीं हो सके। 

अंबेडकर की खासियत यह भी थी कि उन्होंने बरसों तक एक अपमानजनक जीवन बिताने के बावजूद अपने शब्दों या आचार-व्यवहार में कहीं बदले की भावना नहीं दिखाई। वह एक सिद्धांत को जीते थे। उनका मानना था कि समस्या ब्राह्मणों में नहीं, ब्राह्मणवाद में है। इसीलिए वह जाति-व्यवस्था के खिलाफ थे। उनका साफ मानना था कि ब्राह्मणवाद एक विचारधारा है; सोचने का तरीका। चूंकि आज ब्राह्मण शीर्ष पर हैं, इसलिए हम उन्हें दोष देंगे। लेकिन यदि कल ब्राह्मणों की जगह जाटव शीर्ष पर आएंगे, तो वे भी इसी तरह का व्यवहार करेंगे। इसलिए किसी एक जाति की नहीं, बल्कि जाति-व्यवस्था की मुखालफत करो। उनकी नजर में ब्राह्मणवाद एक सिस्टम है, जो असमानता सिखाता है, ऊंच-नीच को तवज्जो देता है और कुछ लोगों को अधिकार देने व कुछ लोगों को उससे वंचित रखने की बात करता है। यही वजह है कि बाबा साहब ने सिस्टम बदलने की मांग की। वह काफी हद तक उस सोच को तोड़ने में कामयाब भी हुए, मगर उसे पूरी तरह से खत्म न कर सके। मैं भी यही मानता हूं कि जब तक देश में जाति-व्यवस्था कायम रहेगी, ब्राह्मणवाद जैसी सोच बनी रहेगी। जात-पांत के खत्म होते ही ब्राह्मणवाद का स्वत: अंत हो जाएगा।

इसमें कोई दोराय नहीं कि आज समाज तेजी से बदल रहा है। नई पीढ़ी काफी आगे निकल चुकी है। बस समस्या वह कड़ी प्रतिस्पद्र्धा वाली व्यवस्था है, जिसके कारण कहीं न कहीं नौजवानों में मन में फिर से जाति के बीज पलने लगे हैं। ऐसे में, जरूरत समान अवसर की है, और वह सभी को मिलना चाहिए। बाबा साहब भी कहा करते थे कि आदिवासी या अनुसूचित जाति के लोगों पर विशेष ध्यान दें और सभी को समान अवसर मुहैया कराएं। मगर दुखद है कि अब तक हम समान अवसर का माहौल नहीं बना सके हैं। दिक्कत यह भी है कि जितनी तेजी से देश की आबादी बढ़ रही है, उतनी तेजी से मौके नहीं बढ़ रहे। हर हाथ को काम मिलना जरूरी है। मगर हमारी हुकूमत ले-देकर सिर्फ निजी क्षेत्र की ओर देख रही है, जबकि निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने से समान अवसर की बाबा साहब की संकल्पना साकार नहीं होने वाली। बाबा साहब का नाम जपने मात्र से सरकारें अंबेडकर के करीब नहीं हो जाएंगी। उन्हें बाबा साहब के सपनों का भारत बनाने की ईमानदार कोशिश करनी होगी।

अंबेडकर ने अपनी किताब स्टेट्स ऐंड माइनोरिटीज  में लिखा है कि वह देश की कैसी अर्थव्यवस्था चाहते हैं। वह किसी मंत्री पद के इच्छुक नहीं थे। उन्होंने तो पंडित जवाहरलाल नेहरू से कहा भी था कि योजना आयोग की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी जाए। मगर नेहरूजी ने मना कर दिया। यहां इसकी वजह के विश्लेषण की जररूत नहीं, मगर नेहरूजी के उस फैसले से देश का नुकसान हुआ। बाबा साहब सरकारी क्षेत्रों में समान अवसर के हिमायती थे। अब भी आबादी के अनुपात में कामगारों को अगर हम समान अवसर मुहैया कराने में सफल हो सके, तो जात-पांत को लेकर नई पीढ़ी में पनप रही द्वेष भावना खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगी, और फिर समाज बदलाव की अपनी गति बढ़ता रहेगा।
      (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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