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विमर्शचीन के बाजार का उतरता जादू

लाइव हिन्दुस्तान टीम
Thu, 09 Jul 2015 08:48 PM
चीन के बाजार का उतरता जादू

इस साल 12 जून से चीन के शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव का क्रम जारी है। शंघाई कंपोजिट व शेनजेन स्टॉक बाजार को लेकर जिस तरह की गिरावट की आशंका जताई जा रही थी, वह बीते कुछ वक्त में सही साबित हुई है। शंघाई कंपोजिट संसार का तीसरा सबसे बड़ा शेयर बाजार है। मई के आखिर तक इसका घरेलू बाजार पूंजीकरण मूल्य 5.9 खरब डॉलर बताया जाता रहा, जो न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज (19.7 खरब डॉलर) व नैसडैक ओएमएक्स (7.4 खरब डॉलर) से ही पीछे था। वैसे, बीते छह महीने में शंघाई शेयर बाजार में 149 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। दरअसल, चीन सरकार ने साल 2014 में लोगों को प्रोत्साहित किया था कि वे बाजार को बढ़ावा देने के लिए ज्यादा से ज्यादा शेयर खरीदें। इस बढ़त में सरकार के उस प्रयास ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाजार में काफी तादाद में नए निवेशक आए, अप्रैल-मई में काफी सारे नए खाते खुले।

रिपोर्टें बताती हैं कि बाजार में 80 प्रतिशत छोटे निवेशक आए, जो इस उम्मीद में थे कि उन्हें शेयर बाजार के उछाल से जल्द फायदा मिलेगा। लेकिन मई-जून से शंघाई स्टॉक एक्सचेंज के अधीन कंपनियों के शेयर-मू्ल्यों में 30 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई। वहीं शेनजेन मार्केट में भी यह गिरावट 40 प्रतिशत के आसपास रही। इससे लाखों निवेशकों के बीच खलबली मच गई और अब वे अपने निवेश को लेकर चिंतित हैं। जानकार बताते हैं कि छोटे समय के निवेशक भेड़चाल की मानसिकता के आधार पर फैसला लेते हैं और इसका दूरगामी असर पड़ता है। इससे शेयर बाजार से बड़ा पलायन होता है।

चीन के लिए चिंता की इससे भी बड़ी बात यह है कि 2,776 कंपनियों में से करीब आधी कंपनियों ने अपने हाथ शेयर बाजार से खींच लिए हैं। और ऐसी कंपनियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। जब से यह गिरावट आई है, तब से तीन खरब डॉलर से अधिक का नुकसान हो चुका है। यह नुकसान इतना बड़ा है, जितना पूरे फ्रेंच शेयर बाजार का आकार है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि जैसे जापान के शेयर बाजार का 60 प्रतिशत ध्वस्त हो गया हो या साल 2013 में 2.7 खरब डॉलर की इंग्लैंड की जीडीपी से ज्यादा रकम स्वाहा हो गई।

इसे एशिया में इस दशक के सबसे बड़े आर्थिक संकट के तौर पर देखा जा रहा है। चीन की धीमी विकास दर के मुकाबले इसके शेयर बाजार की तेजी को इसका जिम्मेदार ठहराया जाता है। गौरतलब है कि मौजूदा विकास दर साल 2009 से आज तक की चीन की सबसे धीमी दर है व साल 2014 से कंपनियों का मुनाफा घट रहा है। चीन के सरकारी संगठनों ने बचाव के कई कदम उठाए। बाजार में मुद्रा-प्रवाह को बनाए रखने के लिए पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने अपनी ब्याज दरों में बड़ी कटौती की। स्टॉक बाजार को सहारा देने के लिए 12 करोड़ युआन का फंड बनाने का भी प्रस्ताव था।

शेयर बाजार के अंदर के लोगों ने भी कई कदम उठाए। जैसे, दलालों और फंड मैनेजरों ने महंगे शेयर खरीदने का भरोसा दिलाया, चाइना सिक्युरिटीज रेगुलेटरी कमीशन ने नए आईपीओ पर रोक लगा दी और मार्जिन ट्रेडिंग में भी ढील दी गई। बाजार को लेकर मीडिया और कुछ विशेषज्ञ जिस तरह के आलोचनात्मक और संशयात्मक विचार रख रहे थे, उसे कोसने का काम स्टॉक रेगुलेटरों ने किया। सारा जोर इस पर था कि बाजार में निवेशकों के भरोसे को बनाए रखा जाए, ताकि शेयर की अंधाधुंध बिक्री थमे।

बड़ी गिरावट के बावजूद शंघाई स्टॉक एक्सचेंज जनवरी, 2015 के स्तर से 20 प्रतिशत ज्यादा पर टिका हुआ है। इसके अलावा, सिर्फ 10 फीसदी चीनी परिवारों ने चीन के शेयर बाजार में निवेश किया हुआ है, जबकि विकसित देशों में यह अनुपात 20 प्रतिशत तक होता है। इससे किसी अन्य विकसित देश की तुलना में चीन में बाजार संबंधी खतरे काफी कम हो जाते हैं।
इससे निपटने के लिए जो उपाय किए गए हैं, उनके नतीजे दिखने बाकी हैं। फिर भी चीन की अर्थव्यवस्था को लेकर ढेर सारे सवाल उठते हैं। पहला, बाजार को बचाने की सरकारी क्षमताओं के मामले में क्या यह अर्थव्यवस्था लोगों का भरोसा जीत पा रही है? यह तो साफ है कि जल्द अच्छे नतीजे नहीं मिले, तो जनता पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और संभवत: सामाजिक स्थिरता पर भी बुरा असर दिखेगा।

दूसरा, क्या इससे यह संकेत मिलता है कि निकट भविष्य में चीन की अर्थव्यवस्था में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी का असर कम होगा? ऐसा होता नहीं दिख रहा। शेयर बाजार में लोगों के काफी पैसे दांव पर लगे हैं। लोग अब भी शेयर बाजार को कम समय में फायदा कमाने का रास्ता मानते हैं। ऐसे में, यह संकट अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका को घटाने की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है। तीसरा, क्या इस संकट से हमें परेशान होने की जरूरत है? जवाब है- ज्यादा नहीं। हालांकि, यह एशिया में एक बड़ा आर्थिक संकट है, फिर भी चीन का शेयर बाजार अपेक्षाकृत रूप से अलग-थलग है और ऐसा नहीं लगता कि इसका असर चीन की सीमाओं से बाहर दिखेगा।

वैसे, कुछ विदेशी निवेशकों ने चीन के शेयर बाजार में पैसे लगा रखे हैं, लेकिन यह कुल चीनी शेयर के दो प्रतिशत से भी कम है। शंघाई स्टॉक एक्सचेंज कंपोजिट और लुढ़कते शेयर बाजार में असली चिंता नहीं छिपी है, बल्कि चीन की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या परिणाम होगा, इसे लेकर चिंता है, जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था है। यह देश दुनिया के हर देश के साथ कारोबारी संबंध रखता है। चौथा, अगर शेयर बाजार गिरता रहा, तो सबसे बुरी तस्वीर क्या बनेगी? हो सकता है कि इसकी सूचीबद्ध कंपनियों के बाजार मूल्यों में भयानक गिरावट आ जाए। संकट यह है कि इसमें मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां ही नहीं, चीन के कई सारे बैंक भी शामिल हैं। इस गिरावट से निकट भविष्य में दिवालिएपन जैसी स्थिति भी बन सकती है।

मैन्युफैक्चरिंग बाजार और निर्यात के मामले में इससे चीन की कुल अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा। वैसे, मौजूदा स्थिति विदेशी बाजार और कारोबारी देश के लिए इतनी बुरी नहीं है, लेकिन आगे भी शेयर बाजार में बड़ी गिरावट जारी रही, तो चीन से आयात पर निर्भर कई अर्थव्यवस्थाओं पर स्वाभाविक रूप से असर दिखने लगेगा। हालांकि, चीन सरकार शायद ही ऐसा होने दे।
वैसे, कई उपायों के बाद भी चीन का शेयर बाजार अस्थिर और बेहद अप्रत्याशित बना हुआ है। हो सकता है कि अपने सर्वोच्च सूचकांक को फिर से छूने में इस बाजार को समय लग जाए।

फिलहाल जो उपाय किए गए हैं, उनके असर को लेकर सवाल उठते हैं। ऐसे में, दीर्घकालिक सुधार की मांग तेज हो जाती है। दुनिया की नजर चीन सरकार की उन कोशिशों की तरफ होगी, जिनसे इस समस्या का हल हो, और जो न केवल घरेलू निवेशकों का भरोसा जीते, बल्कि विदेशी निवेशकों व चीन के कारोबारी साझेदारों का भी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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