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26 अक्तूबर, 2020|6:41|IST

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साहित्य के संसार में मेरा योगदान

'योगदान' हिंदी का वह महादान है, जिसे लेखक द्वारा या तो किया जा चुका है अथवा वह कर रहा होता है या करने वाला होता है। साहित्य और योगदान का अंतरंग संबंध है। साहित्यकार जो करता है, वह उसका 'योगदान' कहलाता है। वह जो कुछ कर चुका है, कर रहा है या करेगा, वह उसका योगदान ही होगा और जिसे उसका या तो 'अभूतपूर्व योगदान' कहा जाएगा या फिर 'अतुलनीय योगदान' अथवा 'अप्रतिम योगदान।' योगदान जब भी, जिसके द्वारा भी किया जाता है, हमेशा 'विनम्रतापूर्वक' ही किया जाता है। 'विनम्रता' हिंदी साहित्यकार की वह मुद्रा है, जिसमें वह हमेशा हाथ जोड़े यानी करबद्ध होकर चेहरे पर 'अनुनय-विनय' के भाव के साथ 'सविनय निवेदन' करता हुआ 'नैवेद्य' अर्पित करता हुआ पाया जाता है। कहा भी जाता है कि 'त्वदीयंवस्तु गोविंदम् तुभ्यमेव समर्पये' यानी 'हे गोविंद! (यानी जनता) ये तेरा माल तुझी को मुबारक!' यानी 'जो कुछ मुझे दिया है, वो लौटा रहा हूं मैं (मय ब्याज के)।' कहने की जरूरत नहीं कि साहित्यकार वह योगी है, जो अपने लिए कुछ नहीं करता और न अपने पास कुछ रखता है, बल्कि सब कुछ दान कर देता है और वह भी विनम्र भाव से। ऐसा विनम्र योगदान हिंदी के अखिल भारतीय शोध छात्रों के लिए पीएचडी का पॉपुलर विषय यानी 'टॉपिक' कहलाता है। योगदान हमेशा विपुल होता है और इसीलिए पीएचडी भी विपुलाकार होती है। 50 साल के योगदान को समेटना कोई हंसी-ठट्ठा नहीं।

जो पीएचडी वीर इसे पांच-सात सौ पेजों में समेटने की कला दिखा देता है, वह आचार्य पद को प्राप्त करता है। जैसे ही किसी ने ऐसे योगदान पर एक भी पीएचडी की या कराई, देखते-देखते देश भर में उस पर सौ-पचास पीएचडी हुई समझिए। यही हिंदी का 'एकोहं बहुस्याम:' यानी बहुलतावादी भाव है। योगदान और पीएचडी के बीच 'अन्योन्याश्रय' संबंध कहा जाता है। जो पीएचडी लायक न हुआ, उसका योगदान क्या? पीएचडियां उसी पर हुई हैं, जिसने साहित्य को विनम्र-फिनम्र स्टाइल में कुछ दिया होता है। जिस दानी पर पीएचडी हुई, वह जीते जी स्वर्ग में कलोनी काटता है और जिस पर न हो सकी, वह सीधे प्रेतयोनि को प्राप्त होता है। उसकी अभिशप्त आत्मा एक ठो पीएचडी के लिए तरसती है और जिस-तिस पर मुकदमे करती रहती है। आप उसके योगदान पर एक पीएचडी करवा दीजिए- कोटि-कोटि योनियों में अटकती-भटकती- लटकती आत्मा अपना केस वापस ले लेगी। ऐसा हुआ है और ऐसा ही होता है। यह सवाल शुद्ध साहित्येतर कोटि का घटिया सवाल ही कहा जा सकता है कि कोई पूछे कि किसने कितना योगदान किया है और किस तरह से किया? आप यह तो पूछ सकते हैं कि योगदान किस युग वाला है? लेकिन यह पूछना कि 'क्यों और किस तरह किया है?' शुद्ध बदतमीजी मानी जाएगी। यह दानी का अपमान है। योगदान करने वाला योगदान करता है। पीएचडी करने वाला पीएचडी। आपको क्या? आज के कंजूस युग में जब प्यासे को फ्री में दो चुल्लू पानी तक कोई नहीं पिलाता, तब एक बंदा विनम्रतापूर्ण योगदान किए जा रहा है और दूसरा उसके दुर्लभ योगदान को ढूंढ़ निकाल रहा है और उतनी ही विनम्रतापूर्वक पीएचडी कर डाल रहा है, तब 'क्यों' टाइप सवाल कोई अति कमीना दिमाग ही कर सकता है। हे ईश्वर! उसे क्षमा कर, वह नहीं जानता कि क्या पूछ रहा है? हे पाठक! दूसरों के योगदान को योगदान बताना ही अपना योगदान है।

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