DA Image
31 अक्तूबर, 2020|9:43|IST

अगली स्टोरी

गुसलखाने में भजन और वीराने में कोयलिया कूक

भले ही एक चर्चित फिल्म में अपराधी के मोबाइल पर यकायक बज उठी रिंगटोन से दबंग पुलिस अफसर झूमने लगा था, उस दिन रियल लाइफ में मल्टीप्लेक्स के वाशरूम में (लघु) शंका के निवारण के समय निकट खड़े साथी के मोबाइल से जब लताजी के कंठ से एक पवित्र मंत्र सुनाई पड़ा, तो शांत हो गई नाड़ी। असमय ध्वनित रिंगटोन से पड़ोसी भी असहज दिखे। कान से जनेऊ  उतारने के बाद भाईजान के सॉरी कहने पर अपने सफेद बालों की आड़ लेते हुए हमने कहा- भइये, जिस हालत में आप खुद मौन साध लेते हो, उसमें इस 'बेजुबान' को भी सायलेंट मोड में डाल दिया होता। पसंदीदा गीत के मुखड़े, मंत्रोच्चार और शास्त्रीय आवाजों को रिंगटोन में कैद करना सांगीतिक अनुराग नहीं, बल्कि एक सनक है। नित नई कॉलर ट्यून, अक्सर बदलती रिंगटोन। वैसे, पहली बार रिंगटोन की विविधता से अपना परिचय श्मशान में ही हुआ। हरियाली विहीन स्थान पर अचानक कोयल की कूक सुन मैं इधर-उधर निहारने लगा था कि निकट बैठे 'गमगीन' भाई साहब ने जेब से मोबाइल फोन निकालकर मुस्कराते हुए सूचित किया यह 'रिंगटोन' थी।

ग्राहम बेल ने जब फोन का ईजाद किया होगा, तब उसने यह कल्पना भी न की होगी कि कालांतर में इसकी नस्लें स्लिम-ट्रिम होने के साथ-साथ कैमरा, कंप्यूटर, संगीत, चिट्ठी-पत्री सब कुछ ठूंस लेंगी अपने अंदर। बेस फोन तो बेचारा अब घर बैठे बुजुर्गों की तरह एक ही सुर में ट्रिन-ट्रिनाता (भुनभुनाता) रहता है। रिंगटोन्स का संगीत बस उतनी देर के लिए परोसा जाता है, जब तक कि हरा बटन दबाना है या माचिस की तीली माफिक उंगली को स्क्रीन पर रगड़ना है। बाकी सब तो ठीक है, मगर दुख की खबर साझा करने पर नगाड़ा-नगाड़ा बजा की कॉलर ट्यून उस दुख का उपहास ही उड़ाती है। संगीत की इस सनक ने जिस दिन 'डोरबेल' पर दस्तक दे दी, तब दरवाजे पर अलाप लगेगी तेरे द्वार खड़ा भाईजान... क्या पता, कविता के शौकीन हाई पिच पर गुहार लगाते मिलें, अबे सुन बे नवाब...आगे-आगे देखिए होता है क्या?

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:गुसलखाने में भजन और वीराने में कोयलिया कूक