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VIDEO: गोरखपुर के डाक्टर ने मासूमों के लिए सीएम से मांगी ये संजीवनी

वीडियो: गोरखपुर के डाक्टर ने मासूमों के लिए सीएम से मांगी ये संजीवनी

गोरखपुर में बच्चों के डाक्टर और इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कैम्पेनर डा.आर.एन.सिंह ने सीएम योगी आदित्यनाथ से मासूमों की जान बचाने के लिए पानी वाली संजीवनी मांगी है। इस संजीवनी के लिए न कहीं जाना है न एक भी रुपया खर्च करना है। बस प्लास्टिक की एक बोतल, उसमें भरा पानी, सूरज की रोशनी और कुछ घंटे चाहिए।

डॉ. आरएन सिंह बताते हैं कि बोतलों में भरा पानी काले रंग से पेंट टिनशेड या छत पर सूरज की किरणों के सामने रख दिया जाए तो छह से आठ घंटे में पानी विसंक्रमित हो जाता है। यह पद्धति तीन तरीके से पानी को साफ करती है। एक सूरज की पराबैंगनी किरणें पानी को साफ करती हैं। दूसरे, काले रंग से पेंट टिनशेड 56 डिग्री सेंटिग्रेड पर पानी को गर्म करता है। तीसरे सूरज की पराबैंगनी किरणों के साथ क्रिय करके (एचटूओ) हाइड्रोजन पैराक्साइड में बदल जाता है। यह पानी पूरी तरह विसंक्रमित होता है।

डॉ. सिंह बिना खर्च के पानी शुद्धिकरण के इस तरीके को सरकारी स्तर पर प्रचारित किए जाने की जरूरत बता रहे हैं। 29 अप्रैल को मुख्यमंत्री के गोरखपुर आगमन पर उन्होंने इस फार्मूले का पूरा विवरण उन्हें सौंपा था। बाद में एक पत्र भेजकर भी उन्होंने यह मांग की है। एक जनवरी 2010 से 31 दिसम्बर 2010 के बीच कुशीनगर के होलिया गांव में वह इस फार्मूले का सफलतापूर्वक प्रयोग कर चुके हैं। उनके प्रयोग के पहले होलिया में इंसेफेलाइटिस से चार मौतें हो चुकी थीं। दो बच्चे आज भी विकलांगता का द्वंश झेल रहे हैं। उनके प्रयोग के बाद से वहां इंसेफेलाइटिस का कोई केस नहीं आया है। होलिया गांव के किसान रामप्रताप गिरी, मनोज सिंह, शिक्षक ओंकार सिंह और पूर्व प्रधान वीरेन्द सिंह आज भी पानी शुद्धिकरण के इस तरीके का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।

क्या कहते हैं जानकार
इस तरीके की संस्तुति डब्लूएचओ ने भी की है। बंग्लादेश और अफीका के कई देशों में इसे सफलतापूर्वक आजमाया गया। सरकारी तंत्र की सक्रियता के अलावा समाज के जागरूक लोग भी अन्य लोगों को इस बारे में शिक्षित करें तो बड़ा बदलाव आ सकता है।- डॉ केपी कुशवाहा, पूर्व प्राचार्य, बीआरडी मेडिकल कालेज

पराबैंगनी किरणें प्रबल कीटाणुनाशक होती हैं। सूरज की किरणों से पांच से छह घंटे में पानी शुद्ध किया जा सकता है इसमें कोई शक नहीं है। बस शर्त यह है कि किरणें पानी की गहराई तक पहुंचे।- डॉ. गोविन्द पांडेय, पर्यावरणविद् एवं वरिष्ठ शिक्षक, एमएमएमयूटी, पर्यावरण अभियांत्रिकी

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