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अभिनय सम्राट है दिलीप कुमार

अभिनय सम्राट है दिलीप कुमार

रात के दो बजने वाले थे। अचानक फोन की घंटी घनघना उठी। फोन का रिसीवर उठाने पर दूसरी तरफ से आवाज आई... 'आपकी फिल्म शक्ति देखी और पाया कि फिल्म इंडस्ट्री में एक ही अभिनेता है। वो हैं आप।' फोन करने वाले व्यक्ति और कोई नही स्वयं राजकपूर थे। और जिस शख्स ने फोन उठाया वो थे फिल्म इंडस्ट्री के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार। हिंदी फिल्म जगत में दिलीप कुमार एक ऐसे अभिनेता हैं जिन्होंने अपनी बोलती आंखों और लरजते होंठों से संवाद अदायगी को जिंदगी बख्शी।

1955 में प्रदर्शित फिल्म देवदास के उस दृश्य को कौन भूल सकता है जिसमें पारो के गम में देवदास यह कहता है- कौन कमबख्त पीता है जीने के लिए। उस समय उनका चेहरा स्क्रीन पर नहीं था, लेकिन उनकी गमजदा आवाज दिल की गहराई को छू जाती है। शायद यही वजह रही है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कहते थे, 'देश में केवल दो ही आवाजे सुनी जाती है एक मेरी दूसरी दिलीप कुमार की।'

दिलीप कुमार ने फिल्मों में विविधितापूर्ण अभिनय करके कई किरदारों को जीवंत कर दिया। यही वजह है कि फिल्म आदमी में दिलीप कुमार के अभिनय को देखकर हास्य अभिनेता ओम प्रकाश ने कहा था- यकीन नही होता फन इतनी बुंलदियों तक भी जा सकता है। वहीं विदेशी पर्यटक उनकी अभिनीत फिल्मों में उनके अभिनय को देखकर कहते है- हिंदुस्तान में दो ही चीज देखने लायक है एक ताजमहल दूसरा दिलीप कुमार।

दिलीप कुमार को जब दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने कहा, 'उत्तम नही सर्वोत्तम हैं दिलीप कुमार।' वह कहते हैं, यदि कोई अभिनेता यह कहता है वह दिलीप कुमार की नकल नहीं करता है तो वह झूठ नहीं सफेद झूठ बोल रहा है। इतिहास गवाह है मनोज कुमार, राजेन्द्र कुमार, शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन और धर्मेद्र सरीखे कई महानतम कलाकारों ने दिलीप कुमार के पदचिन्हों पर चलकर ही फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाई।

11 दिसंबर 1922 को पेशावर [अब पाकिस्तान] में जन्में युसूफ खान उर्फ दिलीप कुमार अपनी माता-पिता की 13 संतानों में तीसरी संतान थे। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा पुणे और देवलाली से हासिल की। इसके बाद वह अपने पिता गुलाम सरवर खान के फल के व्यापार में हाथ बंटाने लगे। कुछ दिनों के बाद इस काम में मन नहीं लगने के कारण दिलीप कुमार ने यह काम छोड़ दिया और पुणे में कैंटीन चलाने लगे।

1943 में उनकी मुलाकात बांबे टॉकीज की व्यवस्थापिका देविका रानी से हुई, जिन्होंने उनकी प्रतिभा को पहचान मुंबई आने का न्योता दिया। पहले तो दिलीप कुमार ने इस बात को हल्के से लिया। लेकिन बाद में कैंटीन व्यापार में भी मन उचट जाने से उन्होंने देविका रानी से मिलने का निश्चय किया। देविका रानी ने युसूफ खान को सुझाव दिया कि यदि वह अपना नाम बदल दे तो वह उन्हें अपनी नई फिल्म ज्वार भाटा में बतौर अभिनेता काम दे सकती है।

देविका रानी ने युसूफ खान को वासुदेव जहांगीर और दिलीप कुमार में से एक नाम चुनने को कहा। 1944 में प्रदर्शित फिल्म ज्वार भाटा से बतौर अभिनेता दिलीप कुमार ने अपने सिने करियर की शुरुआत की। फिल्म ज्वार भाटा की असफलता के बाद दिलीप कुमार ने प्रतिमा, जुगनू, नदिया के पार, अनोखा प्यार, नौका डूबी जैसी बी और सी ग्रेड वाली फिल्मों में बतौर अभिनेता काम किया। लेकिन इन फिल्मों से उन्हें कोई खास फायदा नहीं पहुंचा। चार वर्ष तक मायानगरी मुंबई में संघर्ष करने के बाद 1948 में फिल्म मेला की सफलता के बाद दिलीप कुमार बतौर अभिनेता फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए।

दिलीप कुमार के सिने कैरियर में उनकी जोडी़ अभिनेत्री मधुबाला के साथ काफी पसंद की गई। फिल्म तराना के निर्माण के दौरान मधुबाला दिलीप कुमार से मोहब्बत करने लगी। उन्होंने अपने ड्रेस डिजाइनर को गुलाब का फूल और एक खत देकर दिलीप कुमार के पास इस संदेश के साथ भेजा कि यदि वह भी उससे प्यार करते है तो इसे अपने पास रख लें और दिलीप कुमार ने फूल और खत को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

वर्ष 1957 में प्रदर्शित बीआर चोपडा़ की फिल्म नया दौर में पहले दिलीप कुमार के साथ नायिका की भूमिका के लिए मधुबाला का चयन किया गया और मुंबई में ही इस फिल्म की शूटिंग की जानी थी। लेकिन बाद मे फिल्म के निर्माता को लगा कि इसकी शूटिंग भोपाल में भी करनी जरूरी है। मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान ने बेटी को मुंबई से बाहर जाने की इजाजत देने से इनकार कर दिया। उन्हें लगा कि मुंबई से बाहर जाने पर मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच का प्यार और परवान चढे़गा और वह इसके लिए राजी नहीं थे। बाद में बीआर चोपडा़ को मधुबाला की जगह वैजयंतीमाला को लेना पडा़। अताउल्लाह खान बाद में इस मामले को अदालत में ले गए और इसके बाद उन्होंने मधुबाला को दिलीप कुमार के साथ काम करने से मना कर दिया और यहीं से दिलीप कुमार और मधुबाला की जोडी़ अलग हो गई।

1960 में दिलीप कुमार के सिने करियर की एक और अहम फिल्म मुगले आजम प्रदर्शित हुई। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर के आसिफ के निर्देशन में सलीम अनारकली की प्रेमकथा पर बनी इस फिल्म में दिलीप कुमार ने शहजादे सलीम की भूमिका को रूपहले पर्दे पर जीवंत कर दिया।
 1961 में प्रदर्शित फिल्म गंगा जमुना के जरिए दिलीप कुमार ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। फिल्म की सफलता के बाद दिलीप कुमार ने इसके बाद भी फिल्म बनाने का निश्चय किया लेकिन इन्कमटैक्स वालों के बुरे बर्ताव के कारण उन्होंने फिर कभी फिल्म निर्माण करने से तौबा कर ली।

फिल्म गंगा जमुना में दिलीप कुमार ने हिंदी और भोजपुरी का मिश्रण किया और उनका यह प्रयोग काफी सफल रहा। इस फिल्म में दिलीप कुमार के साथ उनके भाई नासिर खान ने भी अभिनय किया। 1966 में दिलीप कुमार ने फिल्म अभिनेत्री सायरा बानो के साथ निकाह कर लिया। 1967 में प्रदर्शित फिल्म राम और श्याम दिलीप कुमार के सिने करियर की एक और सुपरहिट फिल्म साबित हुई। दो जुडवां भाइयों की कहानी पर आधारित इस फिल्म में दब्बू और निडर के रूप में दोहरी भूमिकाओं को दिलीप कुमार ने बेहद सधे अंदाज में निभाकर दर्शकों का दिल जीत लिया था। बाद मे फिल्म राम और श्याम से प्रेरणा लेकर फिल्मकारों ने कई दोहरी भूमिका वाली फिल्मों का निर्माण किया। 1976 में प्रदर्शित फिल्म बैराग की असफलता के बाद दिलीप कुमार ने लगभग पांच वर्षों तक फिल्म इंडस्ट्री से किनारा कर लिया।

1980 में फिल्म निर्माता निर्देशक मनोज कुमार के कहने पर दिलीप कुमार ने फिल्म क्रांति में बतौर चरित्र अभिनेता अपने सिने करियर की दूसरी पारी शुरू की। फिल्म में अपने दमदार चरित्र से दिलीप कुमार ने एक बार फिर से दर्शकों का मनमोह कर फिल्म को सुपरहिट बना दिया। 1982 में प्रदर्शित फिल्म शक्ति हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की महानतम क्लासिक फिल्मों में शुमार की जाती है। इस फिल्म में दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन ने पहली बार एक साथ काम करके दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

अमिताभ बच्चन के सामने किसी भी कलाकार को सहज ढंग से काम करने में दिक्कत हो सकती थी, लेकिन फिल्म शक्ति में दिलीप कुमार के साथ काम करने में अमिताभ बच्चन को भी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। फिल्म शक्ति के एक दृश्य को याद करते हुए अमिताभ बच्चन बताते है कि फिल्म के अंत में जब दिलीप कुमार उनका पीछा करते हैं तो उन्हें पीछे मुड़कर देखना होता है। जब वह ऐसा करते है तो वह दिलीप कुमार की आंखो में देख नहीं पाते और फिर इस दृश्य के कई रिटेक हुए।

1991 मे प्रदर्शित फिल्म सौदागर में दिलीप कुमार के अभिनय के नए आयाम देखने को मिले। सुभाष घई की निर्मित फिल्म सौदागर मे दिलीप कुमार और राज कुमार 1959 में प्रदर्शित फिल्म पैगाम के बाद दूसरी बार आमने सामने थे। फिल्म में दिलीप कुमार और राजकुमार जैसे अभिनय की दुनिया के दोनों महारथियों का टकराव देखने लायक था।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बतौर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता सर्वाधिक फिल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त करने का कीर्तिमान दिलीप कुमार के नाम दर्ज है। दिलीप कुमार अपने सिने कैरियर में आठ बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दिलीप कुमार को 1953 में प्रदर्शित फिल्म दाग के लिए सबसे पहले सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद 1954 में प्रदर्शित फिल्म आजाद, 1955 में देवदास, 1967 में नया दौर, 1960 में कोहेनूर, 1964 लीडर, 1968 राम और श्याम तथा शक्ति 1982 के लिए भी उन्हे सर्वश्रेष्ठ फिल्म अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

फिल्म जगत में दिलीप कुमार के महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें 1994 में फिल्म इंडस्ट्री के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावे पाकिस्तान सरकार ने उन्हें वहां के सर्वोच्च सम्मान निशान ए इम्तियाज से सम्मानित किया। 1980 में दिलीप कुमार मुंबई में शेरिफ के पद पर नियुक्त हुए। फिल्म इंडस्ट्री में दिलीप कुमार उन गिने चुने चंद अभिनेता में एक हैं जो फिल्म की संख्या से अधिक उसकी गुणवत्ता पर यकीन रखते हैं। इसलिए उन्होंनें अपने छह दशक लंबे सिने करियर में लगभग 60 फिल्मों में अभिनय किया।

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