DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

यदि मैं बाईस का होता!

दीपक चोपड़ा, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भारतीय मूल के अमेरिकी लेखक, मॉडर्न मोटिवेशनल गुरु व फिजीशियन। इनकी 75 से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।

अपने मेडिकल करियर की शुरुआत में, मैं स्पष्ट रूप से यह जानता था कि क्या कर रहा हूं। किस दिशा में आगे बढ़ रहा हूं। मुझे दवाओं से प्यार था। मेरा भविष्य संभावनाओं से भरा हुआ था। मुझे पता था कि जिस महिला से मैं प्यार करता हूं, उससे शादी करके अमेरिका चला जाऊंगा। तब तक यह सोचा ही नहीं था कि जीवन की अनिश्चितता क्या होती है और किस तरह यह एक व्यक्ति के जीवन पर असर डाल सकती है। विशेष तौर पर मैं यह सोचता था कि सुरक्षा मेरी मित्र है और अनिश्चितता दुश्मन। काश, आज की तरह उस समय भी मैं यह जानता कि अनिश्चितता में ज्ञान होता है, जो अदृष्ट दरवाजों को खोलता है और यही अज्ञात तत्व जीवन को निरंतर नयापन दे सकता है।

अधिकतर सभी की तरह मैं भी अप्रत्याशित घटनाओं और बदलावों से बेचैन हो जाता था। मैं इस बात के लिए कतई तैयार नहीं था कि मेरी फैलोशिप रोक दी जाएगी। या मेरी इच्छित चिकित्सकीय विशेषज्ञता को अस्वीकार कर दिया जाएगा। या फिर मुझे मेरे जीवन के संबल पत्नी और बच्चे से अलग होना पड़ेगा। या मुझे एक भारतीय होने के कारण अलग नजर से देखा जाएगा। बहुत वर्षों के बाद जब तन और मन के संबंध को समझा, तब जाना कि मैं खुद को उन मूर्खतापूर्ण और तीखे हमलों से कैसे बचा सकता था।

यह समझा जा सकता है कि मैं उन बुरी स्थितियों से निकलना चाहता था और मैंने स्थिरता की जगह अस्थिरता को चुना। हालांकि आज समझ सकता हूं कि यह कितना घातक हो सकता था। अनिश्चितता के ज्ञान का पहला सिद्धांत है कि हर चीज व घटना के पीछे एक मकसद होता है। हालांकि अब यह एक मुहावरा सा बन गया है, पर भारतीय वैदिक परंपरा में इसका गहराई से विश्लेषण किया गया है।

कल्पना करें कि आपके हाथ में एक अदृश्य धागा है,  जिसे आपको आजीवन पकड़े रखना है। यह धागा आपकी जीवन रेखा है, जो आपको वहीं ले जाएगा, जहां आपको संपूर्ण संतुष्टि हासिल करने के लिए जाने की जरूरत है। वहां नहीं, जहां आपका मन, आपके डर, आपकी अपेक्षाएं और आपकी असुरक्षा लेना जाना चाहते हैं। भारत में इस धागे को धर्म कहते हैं, जिसका अर्थ है, धारण करना। दूसरे शब्दों में, यह अदृश्य धागा भले ही नाजुक प्रतीत हो, यह आपको सर्वश्रेष्ठ दिशा की ओर ले जाने में मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगा। अदृश्य होने के कारण इसके रास्ते अप्रत्याशित व आशातीत प्रतीत होते हैं, लेकिन जहां अनिश्चितता है, वहां ज्ञान भी छिपा होता है।

जीवन जीने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है कि अनिश्चितताओं में छिपे ज्ञान को गले लगाएं। पर यह बात तब नहीं पता थी जब मैं 22वर्ष का था। प्रश्न होगा कि यह कैसे किया जा सकता है? इसके लिए आप खुद को इन बातों से जोड़ें...
- अपने दिल के जज्बात
- जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य
-  व्यापक दृष्टिकोण की समझ
- दूसरों के साथ समानुभूति
- सेवा कार्यों की इच्छा
- खुद को ब्रह्मांड में अद्वितीय देख पाने की समझ
- स्वयं को खुशहाल और संतुष्टि हासिल करने का अधिकारी मानना।

इन बातों से खुद को जोड़ना शुरू करें। ये गुण प्रत्येक में हैं। इन्हें अपनाकर आप अपने उन तनाव, दबाव, असुरक्षा और संदेहों से मुक्त हो सकते हैं, जो आपको बढ़ने नहीं देते। यह उलझाव कितने ही तरीकों से हो सकता है। कभी-कभी यह जानते हुए भी कि कोई चीज आपके लिए आदर्श नहीं है या फिर आप क्या चाहते हैं, आप कम से समझौता करते हैं। उदासीन स्वीकृति देते हैं या उन राय व मूल्यों को अपनाते हैं, जो आपके नहीं, दूसरों के बनाए हुए हैं। और कई बार यह बात बड़ी देर में समझ आती है कि हम पीडि़त हैं और स्थितियों की कठपुतली बनकर रह गए हैं।

यदि मैं 22 का होता, इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन में ये समस्याएं खत्म हो जाएंगी। युवावस्था में स्वतंत्र होने की प्रबल इच्छा होती है। असंतुष्टि की भावना आदर्शवाद के ईंधन से पोषित हो रही होती है। लेकिन यदि आप जागरूक रहते हुए खुद को अपने स्वभाव की सर्वश्रेष्ठता से जोड़कर रखते हैं, तो उस अदृश्य धागे को मजबूती से पकड़े रहते हैं। दुनियाभर की ज्ञान परंपराओं ने यह माना है कि धर्म वास्तविक है और इस पर विश्वास किया जा सकता है। अनिश्चितताओं से भयभीत होने की जरूरत नहीं। यह एक मुकम्मल अनिवार्यता है, यदि आप सदियों से चली आ रही प्रक्रिया को जानना समझना चाहते हैं, जिसे हम ज्ञान की शुरुआत कहते हैं।

तीन नियम
1- मन:
60 में पहुंचकर मन 20 का होने के लिए मचलने लगता है। ये नहीं कर सके, वो नहीं किया जैसे कई मलाल जिंदगी को उदास बनाने लगते हैं। प्रसिद्ध और लोकप्रिय अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन कहते हैं, 'जीवन अनंत खुशियों भरा होता, यदि हम 80 की उम्र में पैदा होते और धीरे-धीरे 18 की उम्र में पहुंचते।'

2- वचन:  नहीं अच्छा लगता कि कोई हमें मूर्ख या पागल कहे। विषय की जानकारी न हो तो भी चार जनों के सामने बोलने में शान महसूस होती है। लेकिन किसी ने खूब कहा है कि बेहतर है कि चुप रहें और लोगों को सोचने दें कि आप मूर्ख हैं, बजाय इसके कि आप मुंह खोलकर दूसरों के संदेह को पक्का कर दें।

3- काया:  तन और मन एक-दूसरे के साथी हैं तो दुश्मन भी। अमेरिका के प्रथम राष्ट्रीय कवि हेनरी वर्ड्सवर्थ लॉन्गफेलो के अनुसार, 'मन शरीर पर शासन करता है। यदि वह लगातार अपने दास को रौंदता है, तो दास कभी इतना उदार नहीं होगा कि वह घावों को भूल जाए। एक दिन वह उठ खड़ा होता है और अपने शासक को हरा देता है।'

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:यदि मैं बाईस का होता!