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फिल्म रिव्यू: भाग मिल्खा भाग

फिल्म रिव्यू: भाग मिल्खा भाग

हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान अभिनेता अक्षय कुमार ने स्वीकार किया कि उन्होंने फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ में मिल्खा सिंह की भूमिका के लिए फिल्म के निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा को मना कर दिया था। अक्षय का कहना था कि इस रोल के लिए वह मुफीद नहीं हैं, फिट नहीं हैं। ऐसा उन्होंने इसलिए भी कहा, क्योंकि उनका मानना था कि जितना वक्त और जैसी ट्रेनिंग इस फिल्म के लिए जरूरी थी, उसे वह मैनेज नहीं कर सकते थे। आखिर मिल्खा सिंह के रोल के लिए राकेश ओमप्रकाश मेहरा को ऐसी किन चीजों, ट्रेनिंग आदि की जरूरत थी, जिसके लिए अक्षय के पास समय और साहस दोनों की कमी दिखी।

ये बात फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ देख कर ही समझी जा सकती है। इस फिल्म के अधिकतर दृश्यों में फरहान अख्तर ने बनियान में ट्रेनिंग की है। कई दृश्य बिना बनियान के भी हैं, जिसमें उनके सिक्स पैक्स एब्स चमकते, फड़कते दिखते हैं। लेकिन मिल्खा सिंह के बदन की इस नुमाइश के साथ पसीना भी है, जो एक मग से एक बाल्टी में तब्दील हो जाता है। देशभक्ति और कुछ कर जाने का वो जूनून भी है, जिसके लिए एक धावक तीन बार अपने प्रेम (तीन अलग-अलग युवतियों संग) को खो बैठता है। क्यों कोई एक गिलास दूध और दो अंडों के लिए भूत बनकर भागेगा? और वो इंसान तो भागेगा क्या, जिसकी टांगों को प्रतिद्धंदियों द्वारा रेस से एक दिन पहले लहूलुहान कर दिया गया हो।

ये कुछ चंद वजह ही नहीं हैं, जो ‘भाग मिल्खा भाग’ देखने के लिए उकसाती हैं। इस फिल्म के निर्माण में जो एक किस्म का टीमवर्क देखने को मिलता है, वह काबिले तारीफ है। निर्देशन, फिल्मांकन, लेखन, संगीत आदि से ‘भाग मिल्खा भाग’ बांधे तो रखती है, पर कहीं-कहीं उखड़ती भी दिखती है। फिल्म की कहानी मिल्खा सिंह (फरहान अख्तर) के आर्मी कैंप के दिनों से शुरू होती है, जो उसके बचपन और जवानी के दिनों में फ्लैशबैक के सहारे आती-जाती रहती है। पाकिस्तान के मुल्तान का रहने वाला मिल्खा बंटवारे के बाद भारत आ गया था। तब उसकी उम्र करीब सात-आठ साल रही होगी। दंगों में उसका पूरा परिवार खत्म हो गया था। बची थी तो केवल एक बड़ी बहन (दिव्या दत्ता) और जीजा। वक्त और हालात ने मिल्खा सिंह को उठाईगिरा बना दिया था। वह कुछ लफंगे दोस्तों संग ट्रेन से कोयला चुराने लगा था। जवान हुआ तो मोहल्ले की एक लड़की (सोनम कपूर) को दिल दे बैठा। उसी के कहने पर वह आर्मी में भर्ती हो गया।

आर्मी में एक गिलास दूध और दो अंडों के मोह ने उसे रेसिंग ट्रैक का रास्ता दिखाया। और बस यहीं से उसे दूध और अंडों से आगे कुछ और अच्छी चीजों को पाने की ललक लगी, जिसमें से एक इंडिया का वो कोट भी था, जिसे सफल एथलीट पहना करते थे। इस कोट के लिए मिल्खा ने जी-तोड़ मेहनत करने के साथ-साथ पिटाई भी खाई और अपमान भी सहा। फिल्म में ये तमाम बातें काफी प्रभावशाली ढंग से दिखाई गयी हैं। लेकिन कई बातें अखरती भी हैं, जिसमें से एक है फिल्म की लंबाई, जो तीन घंटे आठ मिनट है। आर्मी कैंप, प्रेम प्रसंग, बंटवारे आदि के कुछ दृश्य काटे जा सकते थे। इससे मिल्खा की कहानी से और सही ढंग से जुड़ा जा सकता था।

इतनी लंबी फिल्म में एक सूत्रधार की कमी भी दिखती है। ‘गैग्स ऑफ वासेपुर’ और ‘जोधा अकबर’ या ‘लगान’ की तरह इस फिल्म में भी एक सूत्रधार होना चाहिये था, जो फ्लैशबैक में अचानक चले जाने वाली स्थिति में मदद करता। यह सब उन दर्शकों को थामे रखने में भी मदद करता है, जो ठुमकों और रसीले संवादों की वजह से सिनेमाहॉल में आते हैं। लेकिन ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसी फिल्मों में ये सब नहीं होता। फिल्म देखने से पहले दर्शक ये जान लें कि ये एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसके बारे में कुछ ज्यादा कहा-सुना नहीं गया। ये एक ऐसे इंसान की कहानी है, जिससे देश के प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू ने पूछा था कि बताओ तुम्हें क्या चाहिये, हम तुम्हारे लिए क्या कर सकते हैं? तो मिल्खा का जवाब था- आप बस पूरे देश में एक दिन की छुट्टी कर दीजिए।

एक जुझारु इनसान की जीवनगाथा को रोचक अंदाज में पेश करने के लिए राकेश मेहरा और फरहान अख्तर ने अपनी टीम संग बहुत मेहनत की है। ये जानना रोचक है कि आखिर मिल्खा सिंह रोम ओलंपिक में क्यों हारे! पाकिस्तान में उनकी जीत के क्या मायने थे। वो कौन-से नियम कायदे थे, जिससे उन्होंने जीत हासिल की। मस्ट वाच!

कलाकार: फरहान अख्तर, सोनम कपूर, रेबेका ब्रीड्स, पवन मल्होत्र, दिव्या दत्ता, दिलीप ताहिल, प्रकाश राज, केके रैना, जबजीत सिंह, नवाब शाह, मीशा शफी, देव गिल
निर्देशक: राकेश ओमप्रकाश मेहरा
निर्माता: राजीव टंडन, पी. एस. भारती
बैनर: वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स, राकेश ओमप्रकाश मेहरा पिक्चर्स
संगीत: शंकर-अहसान-लॉय
संगीत-लेखक-संवाद-पटकथा: प्रसून जोशी

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