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5 जुलाई, 2020|3:31|IST

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सूर्यसेन के पराक्रम की कहानी है चटगांव विद्रोह

सूर्यसेन के पराक्रम की कहानी है चटगांव विद्रोह

चटगांव विद्रोह पर आशुतोष गोवारीकर की तीन दिसंबर को रिलीज हो रही फिल्म बंगाली क्रांतिकारी सूर्यसेन और दो लड़कियों के पराक्रम की कहानी है। गोवारीकर ने फिल्म 'खेलें हम जी जान से' में जिस घटना को अपना विषय बनाया है, दरअसल वह इतिहास में एक उपेक्षित सी घटना रही है।

फिल्म समीक्षकों और इतिहासकारों का मानना है कि गोवरीकर का प्रयास सराहनीय है जिससे देश के लोगों को एक शौर्यपूर्ण घटना के बारे में पता चलेगा। फिल्म समीक्षक केएच सिंह का कहना है कि गोवारीकर की फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कितना असर दिखाएगी, इसका पता तो इसके रिलीज होने के बाद ही चलेगा, लेकिन इसमें जिस विषय को चुना गया है, वह अपने आप में कमाल का है।
   
उन्होंने कहा कि गोवारीकर हर बार कुछ न कुछ विशेष करते हैं और यह फिल्म भी उनके इसी प्रयास का हिस्सा है। गोवारीकर का खुद अपनी फिल्म के बारे में कहना है कि यह सिर्फ भारतीय दर्शकों ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के दर्शकों के लिए भी खास होगी क्योंकि चटगांव इस समय बांग्लादेश में है।

महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से संबद्ध इतिहासवेत्ता एम मलिक के अनुसार घटना 18 अप्रैल 1930 से शुरू होती है जब बंगाल के चटगांव में आजादी के दीवानों ने अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (आईआरए) का गठन कर लिया।

आईआरए के गठन से पूरे बंगाल में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी और 18 अप्रैल 1930 को सूर्यसेन के नेतृत्व में दर्जनों क्रांतिकारियों ने चटगांव के शस्त्रागार को लूटकर अंग्रेज शासन के खात्मे की घोषणा कर दी। क्रांति की ज्वाला के चलते हुकूमत के नुमाइंदे दुम दबाकर भाग गए और चटगांव में कुछ दिन के लिए ब्रितानिया शासन का अंत हो गया।

इस घटना ने आग में घी का काम किया और बंगाल से बाहर देश के अन्य हिस्सों में भी स्वतंत्रता संग्राम उग्र हो उठा। इस घटना का असर कई महीनों तक रहा। पंजाब में हरिकिशन ने वहां के गवर्नर की हत्या की कोशिश की। दिसंबर 1930 में विनय बोस, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश किया और स्वाधीनता सेनानियों पर जुल्म ढ़हाने वाले पुलिस अधीक्षक को मौत के घाट उतार दिया।
   
मलिक के अनुसार आईआरए की इस जंग में दो लड़कियों प्रीतिलता वाडेदार और कल्पना दत्त ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सत्ता डगमगाते देख अंग्रेज बर्बरता पर उतर आए। महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। आईआरए के अधिकतर योद्धा गिरफ्तार कर लिए गए और तारकेश्वर दत्तीदार को फांसी पर लटका दिया गया।
   
अंग्रेजों से घिरने पर प्रीतिलता ने जहर खाकर मातृभमि के लिए जान दे दी, जबकि कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सूर्यसेन को फरवरी 1933 में गिरफ्तार कर लिया गया और 12 जनवरी 1934 को वह हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए।

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