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दिल को भाती साफ-सच्ची कहानियां

दिल को भाती साफ-सच्ची कहानियां

साल का छठा महीना चल रहा है और बॉक्स ऑफिस कोई बहुत बड़े फायदे में नहीं दिख रहा। इसकी वजह है कि इन छह महीनों में हिट-सुपरहिट फिल्मों की संख्या फ्लॉप या औसत फिल्मों के मुकाबले काफी कम है। मौजूदा रपट ये है कि ताजा सुपरहिट फिल्म 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' को मिला कर अभी तक छह फिल्में (पीकू, हंटर, एनएच 10, दम लगाके हईशा और बदलापुर) हिट हुई हैं। इसके अलावा लगभग दो-तीन दर्जन फिल्मों के माथे औसत, कम फायदे में और फ्लॉप का ठप्पा लगा है। इन फ्लॉप फिल्मों में छोटे-मोटे सितारों से लेकर बड़े-बड़े तुर्रमखां की बड़े बजट की फिल्में भी शामिल हैं।

आप सोच रहे होंगे कि आज यहां बॉक्स ऑफिस की बात क्यों की जा रही है? दरअसल, यहां बात बॉक्स ऑफिस के नफे-नुकसान की नहीं, बल्कि उन फिल्मों की हो रही है, जिनकी कहानी, किरदार और विषय-वस्तु आदि हमारी रूटीन बॉलीवुड फिल्मों से काफी अलग है। अब रोचक तथ्य ये है कि इन्हीं लीक से हट कर मानी जा रही फिल्मों की वजह से साल का अब तक का बॉक्स ऑफिस फायदे में रहा है। यह एक कमाल का संयोग है कि साल की पहली हिट फिल्म 'बदलापुर' को उन्हीं दर्शकों ने हिट कराया, जिन्होंने कामुक-उत्तेजक फिल्म 'हंटर' को पसंद किया। 'बदलापुर' एक हीरो से ज्यादा विलेन की कहानी है, जिसे नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अपने बेहतरीन अभिनय से बुलंदियों पर पहुंचाया।

इसी तरह 'हंटर' ऐसे इंसान की कहानी है, जिसके बारे में अगर मोहल्ले में पता चल जाए तो उसे जूते मारने वालों की कमी न हो। एक अलग कहानी, अच्छे अभिनय और सहज भाव की वजह से लोगों ने एक ही समय में 'एनएच 10' और 'दम लगाके हईशा' जैसी फिल्मों को पसंद किया। हम समाज की कुरीतियों को सहज ढंग से भी कह सकते हैं, 'एनएच 10' यही दिखाती है और अपने बेहद जमीनी ट्रीटमेंट की वजह से दिल को कहीं-कहीं दहलाती भी है। 'दम लगा के हईशा' फील गुड फैक्टर जगाती है और दर्शाती है कि पारिवारिक कहानियां कहने का कॉपीराइट केवल धर्मा और राजश्री प्रोडक्शन के पास नहीं है।

ये कॉपीराइट वाली बात 'पीकू' और 'तनु मनु...' जैसी फिल्मों पर भी फिट बैठती है। 'पीकू' में कहानी न के बराबर है। ऐसा लगता है कि ये फिल्म किसी घर में खुफिया कैमरे से कैद किए गए पलों का ब्यौरा है, लेकिन यह सब इस तरह से दर्शाया गया है मानो यह अपनी ही कहानी है। इसी तरह 'तनु मनु...' में दो अलग-अलग महिलाओं के चरित्र की तस्वीर है। एक घमंडी, बदतमीज तो दूसरी अपने दम पर फूलने वाली गांव की छोरी। दोनों का जब टकराव होता है तो मनोरंजन-हास्य फूट पड़ता है और एक सोच को जन्म दे जाता है। 'पीकू' और 'तनु मनु...' सरीखी कहानियां हमारे समाज से ही निकली हैं और शायद इसके लिए लेखक को ज्यादा माथापच्ची भी न करनी पड़ी हो। तो क्या अब साफ और सच्ची कहानियों का दौर लौट रहा है? क्या दर्शकों को अच्छे कंटेंट वाली फिल्में भा रही हैं। आगे पता नहीं क्या होगा, लेकिन फिलहाल तो इनकी ही तूती बोल रही है।      

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