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जहां सब कुछ परफेक्ट हो, ऐसा परिवार नहीं देखा

जहां सब कुछ परफेक्ट हो,  ऐसा परिवार नहीं देखा

मशहूर गीतकार व पटकथा लेखक जावेद अख्तर की बेटी और फरहान अख्तर की बहन जोया अख्तर 'लक बाई चांस' और 'जिंदगी ना मिलेगी दोबारा' से निर्देशक के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान बना चुकी हैं। अब वह अपनी तीसरी फिल्म 'दिल धड़कने दो' को लेकर चर्चा में हैं।


- ' फिल्म का नाम 'दिल धड़कने दो' क्यों रखा?
मैं चाहती थी कि फिल्म का नाम ऐसा हो, जिसके साथ हर कोई खुद को जोड़ सके। इसके अलावा वह नाम लोगों के जेहन में भी बैठ जाए।

- ' बतौर निर्देशक आपकी पहली फिल्म 'लक बाई चांस' 2009 में आई थी। उसके बाद 2011 में 'जिंदगी ना मिलेगी दोबारा'। दूसरी और तीसरी फिल्म के बीच चार साल का लंबा गैप क्यों?

किसी भी विषय पर काम करने में मुझे वक्त लगता है।एक फिल्म पूरी होने के बाद मैं थोड़ा ब्रेक लेकर घूमती हूं, किताबें पढ़ती हूं। कुकिंग करती हूं। यानी खुद को पूरी तरह से एक अलग दुनिया में ले जाती हूं। उसके बाद नई कहानी पर काम शुरू करती हूं। नई कहानी पर काम शुरू करने से पहले तीन चार माह तक रीमा कागती के साथ कहानी पर विचार-विमर्श करती हूं। उसके बाद उस पर पटकथा लिखना शुरू करती हूं। पूरी हो जाने के बाद घर के सदस्यों को स्क्रीप्ट पढ़ने को देती हूं। फिर उनसे मिली प्रतिक्रियाओं के आधार पर पटकथा में बदलाव करती हूं। इसके बाद कलाकारों का चयन कर शूटिंग की तैयारी में लग जाती हूं। इतना सब करने में  वक्त तो लग ही जाता है। वैसे मैं मानती हूं कि एक रचनात्मक इंसान को लगातार काम करते रहना चाहिए, लेकिन यह भी देखिए कि इस बीच मैंने रीमा कागती की फिल्म 'तलाश'  के लेखन में उसकी मदद की। भाई फरहान की एक फिल्म में भी थोड़ा-बहुत योगदान दिया। इसके अलावा 'बॉम्बे टॉकीज' के लिए लघु फिल्म बनाई। उस पर 'दिल धड़कने दो' में कलाकारों की लंबी फेहरिस्त है, इन सब को एक साथ लाकर काम करना भी इतना आसान नहीं था। एक-दो नहीं, इसमें 25 कलाकार हैं।

- ' फिल्म की शूटिंग यूरोप में क्रूज पर की गई है। इसकी कोई खास वजह?

मैं चाहती थी कि फिल्म में एक ऐसा समारोह हो,  जिसकी वजह से पूरा परिवार व रिश्तेदार एक जगह इकट्ठा हो सकें। अब मुंबई के वर्सोवा बीच पर एक बड़ा जहाज तो बना नहीं सकते थे,  इसलिए यूरोप के एक क्रूज को चुना।

- ' परिवार का मुखिया बनने के लिए अनिल कपूर को कैसे राजी किया?
हमने आमिर खान को अनिल कपूर के घर उनको मनाने के लिए भेजा। आमिर ने अनिल से कहा, 'आपको यह किरदार निभाना ही होगा।' जब अनिल ने हामी भरी, तब जाकर आमिर उनके घर से निकले। मैंने, मेरे भाई फरहान ने और मेरे पिता जावेद अख्तर ने भी अनिल कपूर से कई बार बातचीत की।

- ' इस फिल्म के पात्र व इनके रिश्ते काफी उलझे हुए हैं। क्या इस ढंग की चीजें निजी जिंदगी में भी आपने देखी हैं?
मैंने आज तक एक भी ऐसा परिवार नहीं देखा,  जहां सब कुछ परफेक्ट हो। मेरी राय में यदि ऐसा कोई परिवार होगा तो वह सबसे बोरिंग परिवार होगा। हर परिवार की अपनी कुछ कमियां, कुछ उलझनें होती हैं तो कुछ सुलझे रिश्ते भी होते हैं।

- 'उलझे रिश्तों पर कहानी बुनना आसान काम नहीं होता। तो क्या यह माना जाए कि फिल्म की कहानी काल्पनिक है?
मैं हमेशा काल्पनिक कहानियां ही लिखती हूं, लेकिन कहानी के लिए प्रेरणा आस-पास की जिंदगी से ही मिलती है। कुछ चीजें तो मेरे व मेरे भाई के बीच के रिश्ते से भी उठाई हैं। कुछ दोस्तों के अपने परिवार से जिस तरह के रिश्ते हैं,  उनसे प्रेरणा ली। इसके अलावा जब हम किताबें पढ़ते हैं तो वहां से भी कुछ चीजें मिल जाती हैं। पटकथा लेखक के तौर पर मेरा काम होता है अलग-अलग जगहों से ली गई प्रेरणाओं को पटकथा में पिरोते हुए उसे मौलिक रूप देना।

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