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'हमारी अधूरी कहानी' देखने से पहले फिल्म का रिव्यू तो पढ़ लीजिए

'हमारी अधूरी कहानी' देखने से पहले फिल्म का रिव्यू तो पढ़ लीजिए

नए दौर में भट्ट कैंप की खासियत रही है कि वह अपनी फिल्मों की मार्केटिंग-पैकेजिंग अच्छी कर लेता है। भट्ट कैंप की फिल्में संगीत, कहानी, निर्देशन और अलग नजरिये के कारण पसंद की जाती रही हैं, पर ये फिल्म कई वजह से चर्चा में है।

एक के बाद एक फ्लॉप फिल्में दे रहे विद्या बालन और इमरान हाशमी की वजह से, महेश भट्ट की निजी जिंदगी से प्रेरित कहानी के कारण व इससे भी कि काफी दिनों से कोई दर्द भरी प्रेम कहानी स्क्रीन पर नहीं आई है। पर असलियत क्या है, आइए बताते हैं।

दुनियाभर में 106 होटलों के मालिक आरव (इमरान हाशमी) को अपने होटल की फ्लोरिस्ट वसुधा (विद्या बालन) के काम में कोई दिलचस्पी नहीं है, पर जब एक दिन वसुधा अपनी सूझ-बूझ और बहादुरी से उसकी जान बचाती है तो वह उसे दुबई स्थित अपने होटल में नौकरी की ऑफर दे डालता है।

वसुधा चाह कर भी यह ऑफर ठुकरा नहीं पाती, क्योंकि उसे अपने पांच साल के बेटे सांझ की परवरिश करनी है। उसका पति हरि (राजकुमार राव) बीते पांच सालों से गायब है। पुलिस के मुताबिक अब वह खूंखार आतंकवादी बन चुका है।

दुबई में नौकरी के दौरान वसुधा को एहसास होता है कि उसके व आरव के बीच नजदीकियां बढ़ रही हैं, लेकिन ये और बढ़ें, इससे पहले वह उससे किनारा कर लेती है। आरव उसे अपने प्यार का एहसास करवाता है और शादी के लिए राजी भी कर लेता है। तभी अचानक हरि वापस आ जाता है।

पांच साल बाद पति को वापस आया देख वसुधा खुद को संभाल नहीं पाती और दुविधा में पड़ जाती है कि अब वह क्या करे। हरि बताता है कि वह किसी आतंकवादी संगठन से नहीं जुड़ा, बल्कि उसे फंसाया गया है। वसुधा उसकी बातें सच मान लेती है और उसे अपना सच भी बता देती है, पर हरि आरव से प्यार का सच बरदाश्त नहीं कर पाता और खुद को पुलिस के हवाले कर अपना जुर्म भी कबूल कर लेता है।

ऐसे में आरव के आ जाने से कहानी में नया मोड़ आता है। आरव किसी भी कीमत पर हरि को बचा कर वसुधा और उसका मिलन कराना चाहता है, लेकिन ये सब ऊपर वाले को मंजूर नहीं होता और एक दिन आरव...हो सकता है कि कहानी पढ़ कर अच्छी लग रही हो, पर सच ये है कि स्क्रीन पर ये सब काफी उलझा हुआ दिखता है।

कहानी में जुड़ने वाले तत्व भी गायब हैं। इंटरवल के बाद किन्हीं एक-दो हिस्सों से जब आप जुड़ना चाहेंगे, तभी हरि की एंट्री हो जाएगी। हरि का सच और वसुधा के वजूद को आप समझ पाएंगे कि तभी तमाम किरदारों के बीच आरव नए अवतार में  आ खड़ा होगा। इन सब से निकल गए तो क्लाइमैक्स में कहानी कोलकाता पहुंच जाएगी, जहां दुर्गा पूजा के एक सीन के साथ वसुधा का विद्रोह ड्रामे के ओवरडोज की तरफ इशारा करता दिखेगा। ये सब काफी नहीं रहा तो अंत में हरि पश्चाताप की आग में जलने वाला 'महात्मा' बन जाने से भी गुरेज नहीं करेगा।

दर्द, दवा और मौसिकी से भट्ट साहब का पुराना नाता रहा है। यही नाता है जो उन्हें दर्शकों के दिल में सीधे उतरने का हुनर और मौका देता है, लेकिन लगता है कि इस फिल्म में मोहित सूरी और महेश भट्ट दोनों भटक गए हैं। अब तक हम सब जान चुके हैं कि इमरान हाशमी कहां तक जा सकते हैं। उनके अभिनय की सीमा तय हो चुकी है। विद्या से ढेर सारी उम्मीदें हैं, लेकिन लगता है कि अब उनकी हालत भी इमरान जैसी ही होती जा रही है। वसुधा का किरदार ही उलझनों भरा है। उसके साथ दिक्कतें ही दिक्कतें हैं। दिक्कतों से उसे कोई गिला नहीं, लेकिन उसे इनसे लड़ते कम, घुटने टेकते ज्यादा दिखाया गया है।

तो क्या ये फिल्म बिल्कुल बकवास है! नहीं, ऐसा भी नहीं है। फिल्म की शुरुआत विश्वास जगाती है। मधुर पार्श्व संगीत के साथ वसुधा का चरित्र जिस आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ कर आरव के प्यार को पहले अस्वीकारता और बाद में स्वीकारता है, वो सब भाता है। इमरान-विद्या के बीच के कई सीन्स काफी अच्छे हैं। खासतौर से दुबई में फूलों के बाग वाला सीन, जिसमें विद्या कहती हैं- 'यहां हजारों फूलों के बीच केवल सूखे पत्तों की कमी है...' विद्या का वो धीरे से हिचकिचाहट के साथ बोलना, थोड़ा सकुचाना और आंखों से सब बयां कर देना मन मोहने जैसा है। अभिनय के लिहाज से इमरान हाशमी और विद्या बालन की पिछली तीन-चार फिल्मों के मुकाबले यह फिल्म काफी बेहतर है।
मौसिकी के अंदाज में रूमानी पलों का साथ भाता है, लेकिन ये सब नाकाफी-सा लगता है। लगता है कि ये कहानी अधूरी की बजाय काश पूरी  हो जाती। बेशक इसी तरह से सही...

कलाकार:  इमरान हाशमी, विद्या बालन, राजकुमार राव, सारा खान, अमला
निर्देशन: मोहित सूरी 
निर्माता: मुकेश भट्ट
संवाद: शगुफ्ता रफीक
संगीत: जीत गांगुली, मिथुन, अमी मिश्रा
कहानी: महेश भट्ट
गीत: सईद कादरी, कुणाल वर्मा, रश्मि विराग, रश्मि सिंह

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  • Web Title:hamari adhuri kahani review