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FILM REVIEW: 'मिस टनकपुर हाजिर हों' हास्य, जो करेगा हैरान

FILM REVIEW: 'मिस टनकपुर हाजिर हों' हास्य, जो करेगा हैरान

अगर फिल्म ठीक ढंग से बनी हो तो सच्ची घटनाओं पर बनी फिल्मों को भी अच्छा-खासा रिस्पांस मिल जाता है। बीते कुछ सालों में सच्ची घटनाओं पर आधारित या कहिए उनसे प्रभावित फिल्मों को काफी सराहा गया है। फिर चाहे ‘नो वन किल्ड जेसिका’, ‘स्पेशल 26’ जैसी सच्ची घटना से प्रेरित फिल्में हों या फिर असल जिंदगी से जुड़ी व्यक्ति आधारित फिल्में- इनमें ‘भाग मिल्खा भाग’, ‘मैरी कॉम’ और ‘पान सिंह तोमर’ सरीखी फिल्मों को शामिल किया जा सकता है।

निर्देशक विनोद कापड़ी की फिल्म ‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ किसी व्यक्ति विशेष पर आधारित न होकर एक सच्ची घटना पर आधारित है, जिसके घटनाक्रम को नाट्य रूपांतर के साथ पेश किया गया है। एक ऐसी घटना, जिसे सुन पहले हंसी आएगी और जब विस्तार में जाएंगे तो ताज्जुब होगा तथाअंत पता लगेगा तो दुख भी होगा। और हो सकता है कि सारा मामला निपट जाने के बाद आप कहें, ‘इट्स हैपन ओनली इन इंडिया’।

ये कहानी है टनकपुर नामक एक गांव की, जहां मेले में गांव के प्रधान सुआ लाल (अनु कपूर) की भैंस को मिस टनकपुर खिताब से नवाजा गया है। भैंस की खासियत है कि वो रोजाना बीस लीटर दूध देती है। गांव के एक लड़के अर्जुन (राहुल बग्गा) को प्रधान की जवान बीवी माया (ऋषिता भट्ट) से प्यार है। दोनों छुप-छुप कर मिलते हैं। पचास पास कर चुका सुआ लाल माया को वैवाहिक सुख देने में असफल है। वह देसी जड़ी-बूटियों का सहारा लेता है, लेकिन ये सब नाकाफी है। प्रधान को शक है कि माया का किसी से चक्कर है। एक दिन वह माया और अर्जुन को रंगे हाथों पकड़ लेता है। गांव में अपने एक साथी भीमा (रवि किशन) और गांव के पंडित (संजय मिश्रा) की मदद से वह अर्जुन को मिस टनकपुर के बलात्कार के इल्जाम में जेल भिजवा देता है।

इस झूठे मुकदमे में प्रधान की मदद करता है एक भ्रष्ट थानेदार मतंग (ओम पुरी), जो पैसों की खातिर कुछ भी कर सकता है, पर मामले में ट्विस्ट तब आता है, जब एक हादसे में मिस टनकपुर की टांग टूट जाती है और प्रधान उसे बेच देता है। उधर जज साहब आदेश दे चुके होते हैं कि मिस टनकपुर को अदालत में पेश किया जाए। इससे प्रधान और मतंग की बहुत किरकिरी होती है।

अभी तक की कहानी से शायद आप अंदाजा लगा रहे होंगे कि ये कॉमेडी फिल्म है। इसमें कोई दो राय नहीं कि फिल्म के कई हिस्सों में रोजमर्रा के जीवन से उपजा हास्य है। ये हास्य तुरत-फुरत जोक्स जैसा नहीं है। ये देसी हास्य है, जो अकसर कभी चुटकुलों के रूप में, तो कभी सहज मजाक में हम सबके सामने आता रहता है, लेकिन यह फिल्म हमारी न्याय व्यवस्था, पुलिस प्रशासन आदि पर तगड़ा कटाक्ष भी करती है। फिल्म दिखाती है कि कैसे पुलिस प्रशासन से मिल कर एक व्यक्ति अदालत तक को भ्रमित कर एक निर्दोष को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा सकता है। हालांकि ये सब रुटीन मसाला फिल्मों में बरसों से दिखाया जाता रहा है, लेकिन एक भैंस के बलात्कार के इल्जाम में सजा पाने का यह एक अनूठा मामला पहली नजर में तो उत्सुकता जगाता ही है।

एक गांव की फिल्म को असल गांव में शूट करने का निर्देशक का आइडिया जंचता है। ऋषिता भट्ट को छोड़ बाकी कलाकारों पर देसी रंग फबता भी है, खासतौर से अन्नू कपूर, संजय मिश्रा, रवि किशन और ओम पुरी पर। कुछ बातें फिल्म से मैच करती हैं, जैसे गांव के कच्चे-पक्के मकान, कच्ची सड़कें-गलियां, बस स्टैंड, सायरन वाली प्रधान की जीप, मेला, टूटी-फूटी ही सही, लेकिन अंग्रेजी बोलने का शौक, गांव की प्रथाएं, मान्यताएं, अंधविश्वास आदि। लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म लक्ष्य से भटकी दिखती है। फिल्म को कई जगहों पर अच्छे से एडिट किया जा सकता था। मेले के आइटम गीत से लेकर पुजारी के तंत्र-मंत्र पक्ष वाले सीन्स और भैंस को ढूंढ़ने को लेकर मचे बवाल के साथ थानों के अंदरूनी चित्रण तक में संपादन की गुंजाइश उभरती है।

फिल्म थोड़ी छोटी होती तो शायद ‘पीपली लाइव’ जैसा असर छोड़ पाती। फिर भी निर्देशक ने इसे कई हिस्सों में काफी रोचक बना डाला है। गांव की दीवारों पर लिखी बातें मुस्कान पैदा करती हैं। ये वो बातें-हिदायते हैं, जिनसे प्रभावित होकर लोग इन्हें सोशल मीडिया पर भी शेयर करते हैं। फिल्म में अर्जुन के पिता का कुएं में कूद जाने वाला पूरा सीन सन्न कर देने वाला है। ये सीन जितना प्रभावी है, फिल्म का अंत उतना ही दुविधापूर्ण है।

कलाकार : अन्नू कपूर, रवि किशन, राहुल बग्गा, ओम पुरी, ऋषिता भट्ट, संजय मिश्रा, कमलेश गिल, भूपेश पांड्या
निर्देशन-कहानी: विनोद कापड़ी
निर्माता: विनय तिवारी
संगीत: सुष्मित सेन, पलक मुच्छल
गीत: संजीव शर्मा, विनोद कापड़ी, साक्षी जोशी

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