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फिल्म रिव्यूः जय हो डेमोक्रेसी

फिल्म रिव्यूः जय हो डेमोक्रेसी

कुछ दिनों पहले अभिनेता आदिल हुसैन से बातचीत  में पता चला कि रंजीत कपूर की ये फिल्म 1986 में आई बासु चटर्जी की फिल्म ‘एक रुका हुआ फैसला’ से प्रभावित है। खासतौर से फिल्म का मीटिंग वाला सीन, जिसमें देश के कुछ शीर्ष नेता और प्रभावशाली लोग एक मसले पर एक कमरे में मंथन कर रहे हैं। फिल्म देख कर एहसास हुआ कि ‘एक रुका हुआ फैसला’ में उम्दा अदाकारी के साथ बड़ी सूक्ष्मता से एक अलग मुद्दा उठाया गया था, जबकि ‘जय हो डेमोक्रेसी’ मौजूदा राजनीतिक और खबरिया चैनलों के काम-काज पर कटाक्ष है। बस समानता इतनी है कि इन दोनों फिल्मों के कथानक-संवाद रंजीत कपूर की ही देन हैं, पर जुदा प्रभाव के साथ।

फिल्म की कहानी लाइन ऑफ कंट्रोल पर स्थित एक भारतीय चौकी पर हुए अजीबो-गरीब घटनाक्रम से शुरू होती है। चौकी पर तैनात सेना के एक रसोइए की मुर्गी विवादित क्षेत्र में घुस जाती है। रसोइये को उसके अफसर से हुक्म मिलता है कि किसी भी हालत में वह मुर्गी लेकर आए। इस चक्कर में मुर्गी और रसोइया दोनों उस विवादित क्षेत्र में फंस जाते हैं।सीमा पर तनाव बढ़ने लगता है और साथ ही सियासी पारा भी। खबरिया चैनल पूरे लाव-लश्कर के साथ सीमा से स्पेशल इफेक्ट्स के साथ लाइव रिपोर्टिंग प्रसारित करने लगते हैं।

अब पूरे मसले पर फैसला एक कमेटी को लेना है, जिसमें पांडेजी (ओम पुरी), रामलिंगम (अन्नू कपूर),  मोहिनी देवी (सीमा बिस्वास), मेजर बरुआ (आदिल हुसैन), चौधरी (सतीश कौशिक), बशीर बेग (आमिर बशीर) और मिसेज कौर (रजनी गुजराल) जैसे नेता-प्रभावशाली लोग शामिल हैं। रक्षा मंत्री दुलारी देवी (ग्रूशा कपूर) देश से दूर कनाडा में हैं। उस जवान और मुर्गी को बचाने के लिए क्या किया जाए, पाक पर हमला कर दिया जाए या कुछ और, इन सवालों के साथ मीटिंग शुरू होती है और संसद तथा सत्र के नियम-कायदों के साथ किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले वाक्-युद्ध और फिर द्वंद्व-युद्ध में तब्दील हो जाती है। उधर सीमा पर फंसा जवान और मुर्गी, दोनों मुसीबत में हैं। जवान को प्यास लगी है और मुर्गी परेशान है कि वो अंडा कैसे दे। ऐसे में रास्ता निकालता है पाक सेना का एक बुजुर्ग सिपाही, जो खुद एक रसोइया है।

एक रंगकर्मी, लेखक और निर्देशक होने के नाते रंजीत कपूर अपनी बात ठीक से कहने के लिए जाने जाते हैं। कम ही लोग जानते होंगे कि 1983 में आई फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ के लेखकों की धमा-चौकड़ी टीम में इनकी अहम भूमिका थी। उनके बारे में बहुतेरी बातें-संदर्भ हैं। अमूमन वो किसी फक्कड़ रंगकर्मी की तरह दिखते हैं, बेबाक हैं और सख्त भी। बावजूद इसके ‘जय हो डेमोक्रेसी’ उनके मिजाज और लेखनी से मेल नहीं खाती। शुरुआत अच्छी है।

लगता है कि मसले के लिए होने वाली मीटिंग में मौजूदा व्यवस्था को आईना दिखाया जाएगा, लेकिन कुछ ही देर में सीन दर सीन दोहराव लगने लगता है। किसी चर्चित मामले पर अधिकतर खबरिया चैनलों की सर्कस से आज आमजन अच्छी तरह से वाकिफ है। ‘पीपली लाइव’ में इसे पांच साल पहले बेहद प्रभावी ढंग से दिखाया जा चुका है। फिल्म में दिखाए गये तमाम राजनीतिक किरदारों को आप आसानी से पहचान जाएंगे, इस उम्मीद के साथ कि कटाक्ष, शायद आगे जाकर कॉमेडी में तब्दील हो जाए, लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं।

हां, कुछेक सीन जरूर अच्छे हैं, जैसे दुलारी देवी (ग्रूशा कपूर) के सीन्स, अन्नू कपूर का अंग्रेजी में बिना रुके प्रस्ताव पढ़ना, सतीश कौशिक का चौधरी वाला स्टाइल आदि। पर ये सब नाकाफी-सा लगता है। खासतौर पर जब ऐसी किसी फिल्म के साथ एक चर्चित नाम जुड़ा हुआ हो।

कलाकार: अन्नू कपूर, सतीश कौशिक, ओम पुरी, आदिल हुसैन, सीमा बिस्वास, आमिर बशीर, रजनी गुजराल, ग्रूशा कपूर, विजय कश्यप, बेंजामिन गिलानी, मुकेश तिवारी निर्देशन: रंजीत कपूर और बिक्रमजीत सिंह भुल्लर निर्माता: बिक्रमजीत सिंह भुल्लर लेखक: बिक्रमजीत सिंह भुल्लर, रंजीत कपूर, श्रीकांत अग्निस्वर्ण संगीत: रे एन ब्रदरहुड गीत: यश भारद्वाज, श्रीकांत अग्निस्वर्ण

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