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दो बीघा जमीन की एक तलाश

विख्यात अभिनेता-लेखक बलराज साहनी का यह जन्मशती वर्ष है। यहां प्रस्तुत है उनकी आत्मकथा से उनके संघर्ष भरे दिनों का एक प्रसंग-

सुबह का समय था। मैं समुद्र-तट पर बच्चों के साथ रेत के घरौंदे बना रहा था। तभी मैंने देखा, एक गोल-मटोल बंगाली बाबू अपनी धोती का सिरा पकड़े मेरी ओर आ रहा है। मैं उसे जानता नहीं था। (उस व्यक्ति का नाम असित सेन था, जो उन दिनों बिमल राय के सहायक निर्देशक थे और बाद में हिन्दुस्तानी फिल्मों के प्रसिद्ध हास्य-अभिनेता बने।)

असित सेन ने मेरे बिलकुल निकट पहुंच कर उदास और नाकसुरी आवाज में कहा, ‘बिमल राय दादा आपको याद कर रहे हैं। उन्हें फिल्म के बारे में बात करनी है।’ बिमल राय मुझे याद कर रहे हैं! और वह भी फिल्म के बारे में बात करने के लिए! मैं विश्वास न कर सका। हां, एक बार वे ‘हम लोग’ के सैट पर आए थे, जब श्यामा के साथ मेरा ‘लव-सीन’ चल रहा था। उस दृश्य में श्यामा बिना किसी शर्म-संकोच के मुझ पर झुकी जा रही थी और मैं काठ की तरह अकड़ा हुआ था। मेरे उस घटिया अभिनय को देखने के बाद बिमल राय जैसे निर्देशक मुझे कभी अपनी फिल्म में लेना चाहेंगे, यह अनहोनी-सी बात थी।
फिर भी मैं जल्दी से तैयार होकर मोहन स्टूडियो पहुंचा। अपने चेहरे पर मैंने हलका-सा पाउडर लगा लिया था और इंग्लैंड का सिला सूट प्रेस करवा कर पहन लिया था, जो उस मौसम को देखते हुए काफी भारी था।

जब मैं बिमल राय के कमरे में दाखिल हुआ तो वे मेज पर बैठे कुछ लिख रहे थे। उन्होंने आंखें उठा कर मेरी ओर देखा तो देखते ही रह गए। मुझे लगा, जैसे मैंने कोई कसूर कर दिया हो।

कुछ देर बाद उन्होंने मुड़ कर अपने पीछे कुर्सियों पर बैठे कुछ लोगों से बांग्ला में कहा, ‘एईजे की चमत्कार मानुष! आमार शोंगे ढाढा कोरे छो की?’ (क्या अजीबो-गरीब आदमी पकड़ लाए हो! मेरे साथ मजाक कर रहे हो क्या?)
उन्हें शायद पता नहीं था कि मैं बांग्ला जानता हूं। उन्होंने मुझे बैठने को भी नहीं कहा। आखिर वे बोले, ‘मिस्टर साहनी, मेरे आदमियों से गलती हुई है। जिस किस्म का पात्र मैं फिल्म में पेश करना चाहता हूं, आप उसके बिलकुल उपयुक्त नहीं हैं।’

इतना रूखा व्यवहार! गैरत की मांग थी कि मैं उसी समय वहां से चला जाता, लेकिन मैं वहां जैसे गड़ा रहा। आसमान को पहुंची हुई आशाएं इतनी जल्दी मिट्टी में मिल जाएंगी, इसके लिए मैं तैयार नहीं था।
‘क्या पात्र है?’ मैंने गला साफ करते हुए पूछा।
‘एक अनपढ़, गरीब देहाती का!’ बिमल राय के लहजे में व्यंग्य था।
मैंने फिर चाहा कि उलटे पांव वापस चला जाऊं, लेकिन पैरों ने हिलने से जवाब दे दिया, और कोई अदृश्य शक्ति मुझे रोके हुए कह रही थी कि यह मौका दुबारा नहीं आएगा।
और उसी अदृश्य शक्ति ने मेरे मुंह से कहलवाया, ‘ऐसा रोल मैं पहले कर चुका हूं।’
‘कहां?’
‘पीपल्स थियेटर की फिल्म ‘धरती के लाल’ में।’
बिमल राय के चेहरे का भाव बदला। उनके पीछे बैठे लोगों ने भी जैसे सुख की सांस ली। तब उनमें बैठे सलिल चौधरी को मैंने पहचाना, जो खुद ‘इप्टा’ (इंडियन पीपल्स थियेटर) के सदस्य थे और जिनसे मैं एक-दो बार मिल चुका था। क्या पता, उन्होंने ही बिमल राय को मेरा नाम सुझाया हो।
‘धरती के लाल में किस पात्र का रोल किया था?’ बिमल राय ने पूछा।
‘प्रधान के बेटे निरंजन का। शंभु मित्र उस फिल्म के सहयोगी निर्देशक थे। उन्होंने मेरी बहुत मदद की थी।’
‘बोशो।’ बिमल राय ने कुर्सी की ओर संकेत करते हुए कहा।
‘धरती के लाल’ से भी ज्यादा काम किया शंभु मित्र के नाम के जादू ने। जैसे मैंने बिमल राय की निर्देशकीय योग्यता को चुनौती दी हो। मुझे रोल मिल गया।
स्टूडियो के बगीचे में सीमेंट की एक बैंच पर बैठ कर ऋषिकेश मुकर्जी ने मुझे फिल्म की कहानी सुनाई। सुनाते समय उन्होंने मुझे भी रुलाया और खुद
भी रोए।

बम्बई शहर से बाहर जोगेश्वरी के इलाके में उत्तर प्रदेश और बिहार के भैंसे पालने वाले भैया लोगों की बहुत बड़ी बस्ती है। मैं अगले दिन से वहां के चक्कर लगाने लगा। मैं भैया लोगों के साथ बैठता, उनकी बातें सुनता, उन्हें काम करते हुए देखता। वे कैसे चलते हैं, क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं, कैसे उठते-बैठते हैं- यह सब मैं बड़े गौर से देखता और अपने मन में बैठाता। भैया लोगों को सिर पर गमछा लपेटने का बहुत शौक होता है और हर कोई उसे अपने ही ढंग से लपेटता है। मैंने भी एक गमछा खरीद लिया और घर में उसे सिर पर लपेटने का अभ्यास करने लगा। लेकिन वह खूबसूरती पैदा न होती। मेरे सामने यह एक बहुत बड़ी समस्या थी, जिसे हल करने की मैंने पूरी कोशिश की। ‘दो बीघा जमीन’ में मेरी सफलता ज्यादातर इसी अध्ययन का नतीजा है।

शूटिंग का दिन आ पहुंचा। इस बार मैं मन में डर लेकर नहीं, बल्कि उमंग से स्टूडियो जा रहा था। मुझे अपनी पसंद के मुताबिक काम मिल रहा था। मैंने बिमल दा से प्रार्थना की कि मुझे खुद अपना मेकअप करने और कपड़े पहनने की इजाजत दी जाए। वे मान गए। आखिर मैं ‘शंभु महतो’ बन कर किसानों के से अंदाज में चलता हुआ उनके सामने गया तो मुझ में पहले दिन वाले सूटेड-बूटेड आदमी की कोई बात बाकी नहीं थी। देख कर बिमल दा बहुत खुश हुए। वे अपनी खुशी कभी शब्दों द्वारा प्रकट नहीं करते थे। ऐसे मौकों पर उनका गोरा, गोल-सा चेहरा जरा-सा सुर्ख हो उठता था।

बिमल राय का निर्देशन बड़ा ही सूक्ष्म और कलात्मक था, यद्यपि उसमें बरुआ वाली शिद्दत नहीं थी। पहला शॉट था, जिसमें मैं जमींदार के दीवानखाने में दाखिल होता हूं। रिहर्सल के समय बिमल राय ने मुझे हिदायत दी कि मैं पायदान पर पांव पोंछ कर अंदर जाऊं। इस यथार्थवादी स्पर्श ने मेरी कल्पना में पता नहीं और कितनी बातें जागृत कर दीं। मैंने सिर्फ पांव ही नहीं पोंछे, उस हरकत द्वारा यह भी दिखाया, जैसे किसान डर के मारे जमींदार के सामने पेश होने के मौके को टाल रहा हो। और मैंने देखा कि बिमल राय ने इस बात को भांप लिया था। हमारे बीच एक नई पहचान का रिश्ता पैदा होने लगा।

जमींदार का रोल मुराद कर रहे थे। उस दृश्य में कई शॉट्स के दौरान, मुझे फिर अपनी खामियों का अहसास हुआ- खासकर जब कैमरा मेरे बिलकुल नजदीक आ जाता था। मैं अपना चेहरा जकड़ा हुआ महसूस करता। मैं वह चीज अभिव्यक्त न कर पाता, जो मैं अपने दिल में महसूस करता था। लेकिन स्टूडियो का वातावरण शांत और सुखद था, जो मुझे सहलाता प्रतीत होता था। इसके पूर्व मैंने शूटिंग के समय शोर-शराबा ही देखा था, जो मेरे होश गायब कर देता था।

दृश्य के अंतिम शॉट में मैं जमींदार के पांव पकड़ कर गिड़गिड़ाता हूं कि वे मेरी जमीन न छीनें। ‘टेक’ से पहले बिमल राय ने मुराद के कान में कह दिया था कि जब मैं उनके पांव पकड़ं तो वे उसे जोर से झटक कर छुड़ा लें ओर कैमरे के दायरे से बाहर निकल जाएं। मुझे यह बात पता नहीं थी। सो जब ‘टेक’ में मुराद ने झटक कर अपना पांव छुड़ाया और वह मेरे मुंह पर आकर लगा तो मैं गुस्से और अपमान से बुरी तरह रो पड़ा। ‘कट’ होने के बाद भी मैं देर तक कालीन पर उसी तरह पड़ा सिसकियां भरता रहा। शॉट बहुत बढ़िया हुआ था। मुराद ने मुझे बाहों में लेकर माफी मांगी और असली बात बताई। मैं बिमल राय का और भी कायल हो गया।

उसी दिन मेकअपमैन जगत बाबू से पता चला कि मेरे रोल के लिए अशोक कुमार, जयराज, भारत भूषण और अन्य कई प्रसिद्ध अभिनेताओं ने काफी कोशिश की थी। यह भी पता चला कि कांट्रैक्ट होने के बाद भी मुझे हटाया जा सकता है। उस दिन की शूटिंग एक तरह से मेरी परीक्षा थी। मुझे लगा कि मैं पास हो गया हूं।

 

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