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एक थी स्वेतलाना

भारत की युवा पीढ़ी के लिए स्वेतलाना एलिल्युयेवा का नाम जाना-पहचाना नहीं होगा, लेकिन साठ के दशक के सबसे चर्चित प्रकरणों में स्वेतलाना का प्रकरण है। स्वेतलाना रूसी तानाशाह जोसेफ स्तालिन की सबसे छोटी बेटी थी और शायद स्तालिन की सबसे प्रिय संतान भी। हालांकि प्रिय होने का अर्थ यह नहीं था कि पिता की क्रूरता का साया उन पर नहीं पड़ा। स्वेतलाना के पहले प्रेमी को दस वर्ष के लिए साइबेरिया के यातना शिविरों में भेज दिया गया। उनकी पहली शादी बहुत दिन नहीं चली। साठ के दशक में उनका परिचय बृजेश सिंह से हुआ। बृजेश सिंह भारतीय कम्युनिस्ट नेता थे और इलाज करवाने रूस गए थे।

बृजेश सिंह कालाकांकर के राजघराने से थे और उनके भतीजे दिनेश सिंह केंद्र सरकार में मंत्री रहे थे। बृजेश सिंह काफी पढ़े-लिखे, नफीस और सौम्य व्यक्ति थे और उनसे स्वेतलाना का प्रेम संबंध हो गया। लेकिन सोवियत सरकार ने उन्हें शादी की अनुमति नहीं दी। बृजेश सिंह की मृत्यु 1967 में मास्को में हो गई और उनका शव लेकर स्वेतलाना भारत आईं। नई दिल्ली में वह सोवियत अधिकारियों और जासूसों को चकमा देकर अमेरिकी दूतावास पहुंच गईं। उन्होंने अमेरिका में राजनीतिक शरण मांगी और बाद में अमेरिका और इंग्लैंड में रहीं। यह शीत युद्ध के चरम का वह दौर था और तब स्तालिन की बेटी का अमेरिका से शरण मांगना और सोवियत व्यवस्था को नकार देना बहुत बड़ी खबर थी।

भारत में यह संवेदनशील मुद्दा इसलिए था कि स्वेतलाना ने भारत आकर यह किया था और तब भारत के सोवियत संघ और अमेरिका दोनों से अच्छे रिश्ते थे। भारत पूरी तरह सोवियत कैंप में नहीं गया था, लेकिन भारतीय विदेश नीति का झुकाव सोवियत संघ की ओर था। अमेरिका भी इसे तूल नहीं देना चाहता था, क्योंकि तब अमेरिका-रूस संबंधों में थोड़ी बेहतरी आने लगी थी। ऐसे में स्वेतलाना को पहले स्विट्जरलैंड भेजा गया और वहां से कुछ समय बाद वह अमेरिका गईं।

यह कहानी इस बात का भी प्रमाण है कि राजनीति और विचारधारा के झगड़े किसी की व्यक्तिगत जिंदगी को कितना प्रभावित करते हैं। स्वेतलाना के मामले में यह इसलिए भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि वह 20वीं शताब्दी के सबसे विवादास्पद व्यक्तित्वों में से एक की संतान थी। स्तालिन के परिवार के अन्य सदस्यों का भाग्य भी बहुत अच्छा नहीं था। स्वेतलाना ने एक बार कहा था कि काश! वह किसी बढ़ई की बेटी होतीं।

हालांकि स्तालिन के सोवियत संघ में संदेह और आतंक का ऐसा राज था कि किसी मामूली बढ़ई को भी देश का दुश्मन होने के आरोप में मृत्युदंड मिलना मुमकिन था। उन्हें अपनी दो संतानों को रूस में ही छोड़ना पड़ा था, जिनसे मिलने के लिए वह अस्सी के दशक में फिर सोवियत संघ गईं और उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था की लानत-मलामत की। फिर वह पश्चिम में लौट आईं और लगभग गुमनामी की जिंदगी बिताती रहीं। उनके सामने ही सोवियत साम्राज्य का पतन हुआ, लेकिन दुनिया में राजनीति और व्यक्ति के बीच के रिश्ते नहीं बदले।

अब भी विचारधाराओं के नाम पर लोगों पर जुल्म करने और हत्याएं करने को जायज मानने वाले लोग हैं, सिर्फ विचारधाराओं के नाम बदल गए हैं। जिन्होंने शीत युद्ध का दौर देखा है, वे समझ सकते हैं कि कितनी व्यर्थ लड़ाइयों के लिए करोड़ों लोगों ने जानें गवांई या अत्याचार सहे। स्वेतलाना हमारे लिए उस दौर की एक त्रसद स्मृति हैं। एक व्यवस्था ने उन्हें आजादी नहीं दी, दूसरी व्यवस्था ने अपने पक्ष में प्रचार के लिए उनका इस्तेमाल किया। वह दौर गुजर गया है, लेकिन क्या हम ज्यादा विवेकशील, संवेदनशील और उदार समाज बना पाए हैं?

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