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आशा भोसले की सफलता के मंत्र

सुगम संगीत के क्षेत्र में जाना-माना नाम है आशा भोसले का। गत छह दशकों में उन्होंने संगीत प्रेमियों को कई यादगार गीत दिए हैं और यह सिलसिला आज भी जारी है। उनकी सफलता के मंत्र जानिए यहां।

बॉलीवुड में अपने चंचल और शोख गीतों के लिए यदि किसी महिला का नाम जेहन में आता है तो वह हैं आशा भोसले। स्वर कोकिला लता मंगेशकर की छोटी बहन आशा ने 1948 में फिल्म ‘चुनरिया’ के ‘सावन आया’ गीत से अपना करियर शुरू किया था। उस समय उनकी उम्र मात्र पंद्रह वर्ष थी और आज वह बहुत से गीत गाकर, पद्मश्री के साथ साथ ढेरों सम्मान भी प्राप्त कर चुकी हैं।

सोलह वर्ष की उम्र में परिवार के विरुद्ध अपने से काफी बड़ी उम्र के व्यक्ति गणपत राव भोसले से विवाह करने वाली आशा का जन्म महाराष्ट्र के सांगली गांव में 8 सितम्बर 1933 को हुआ था। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर मराठी रंगमंच से जुड़े हुए थे, लेकिन मात्र नौ वर्ष की छोटी सी उम्र में ही आशा के सिर से पिता का साया उठ गया। वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नया दौर’ आशा भोसले के करियर की पहली सुपर हिट फिल्म साबित हुई तो वर्ष 2000 में आशा दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित हुईं।

आरडी बर्मन के साथ 1966 में फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ में आशा भोसले ने जो गीत गाए, उनसे उन्हें एक नया मुकाम मिला। उन्होंने आरडी बर्मन के साथ 1980 में विवाह रचा लिया था। ‘उमराव जान’ फिल्म के लिए ही उन्हें अपने करियर का पहला नेशनल अवॉर्ड भी मिला था। आशा भोसले आज तक आठ बार फिल्म फेयर अवॉर्ड जीत चुकी हैं। यह पुरस्कार सबसे पहले उन्हें 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘दस लाख’ के ‘गरीबों की सुनो’ के लिए दिया गया था। आज आशा भोसले 18 से ज्यादा भाषाओं में बारह हजार से भी अधिक गीत गा चुकी हैं। वह कई विदेशी गायकों के साथ कई एलबम भी कर चुकी हैं और उन्हें अभी तक दो बार ग्रैमी अवार्डस के लिए भी नामित किया जा चुका है। आशा भोसले की कामयाबी का यह सफर शब्दों की लिखावट जितना आसान नहीं था, तो आइये एक नजर डालते हैं आशा भोसले के सफलता सूत्रों पर-

01. कायम रखें अनुशासन
आशा भोसले जीवन में सफलता के लिए अनुशासन को केन्द्र बिंदु मानती हैं। वह कहती हैं अनुशासन बिना जीवन बेसुरा है, जिसमें कोई राग-रंग नहीं होगा। अनुशासन ही सफलता की पहली सीढ़ी होता है। यदि जीवन अनुशासित न रहे तो वह एक बिखरे हुए घर की तरह हो जाएगा, जहां से कुछ भी खोज कर निकालना संभव नहीं होगा। ऐसे ही हमारा जीवन है, जिसमें अपार संभावनाओं के बीज बिखरे हैं, जिन्हें बस खोज कर बाहर लाना होता है और यह अनुशासन के बिना संभव नहीं होता। अनुशासन ही हमें सही-सटीक जीवन की ओर ले जाता है, जिसके बगैर जीवन में सिर्फ भटकाव है। अनुशासन हमें समय का पाबंद बनाता है, जिससे हम जीवन के प्रति एक जागरूक रवैया अपना पाते हैं।

02. कठोर परिश्रम का कोई विकल्प नहीं
किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्ति के लिए कठोर परिश्रम का कोई विकल्प नहीं होता, इसलिए अपने परिश्रम के प्रति सदैव ईमानदारी बरतें। आशा बताती हैं, ‘जब मैं पार्श्चगायन में आई थी, तब बड़े-बड़े नाम थे, जो अपने दौर के सुनहरे काल में थे, जिसमें मेरे लिए थोड़ी भी जगह नहीं थी। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मेहनत करती रही और अंतत: मुझे ‘नया दौर’ फिल्म में सफलता मिली। मैंने किसी गीत को छोटा बड़ा नहीं माना, मैंने सब के लिए बराबर मेहनत की। अगर आपने सही दिशा में मेहनत की है तो आपकी मेहनत व्यर्थ नहीं जाएगी। जो लोग आज आपको सफल दिख रहे हैं, सबकी सफलता के पीछे कड़ी मेहनत छुपी है।’

03. काम में रम जाएं
अपने काम में मन लगाएं, क्योंकि बिना मन से किया गया काम कितना भी अच्छा हो, वह एक अच्छा एहसास नहीं देता। भावनाएं जीवन में सफलता के लिए बहुत आवश्यक हैं, क्योंकि भावनाएं ही हमें कार्य के प्रति जोश और उत्साह देती हैं। हम वह तक कर जाते हैं, जो हमें सामान्य परिस्थितियों में असामान्य और असंभव दिखता है। आशा भोसले कहती हैं, यदि व्यक्ति को कार्य करने का सकारात्मक एहसास नहीं होगा तो उसके द्वारा किया गया कार्य एक सुरताल से दूर गीत की तरह हो जायेगा, जिसमें सारे वाद्ययंत्र होंगे, स्वर भी होगा, लेकिन कर्णप्रियता समाप्त हो जायेगी। इसलिए सफलता के लिए आवश्यक है कि अपने कार्य में मन लगाएं।

04. अभ्यास जरूरी 
सदैव सीखने की कोशिश करें, क्योंकि कोई चाहे जितना भी सीख ले, वह ज्ञान का बहुत थोड़ा ही हिस्सा होता है। ज्ञान ब्रह्मंड की तरह अनंत हैं। अपने क्षेत्र में निपुणता हासिल करने के लिए अभ्यास अर्थात् नई चीजों को सीखना और पुरानी को प्रयोग में लाते रहना अति आवश्यक होता है।

यदि आप अभ्यास छोड़ देते हैं तो आप नई चीजों को तो नहीं ही सीखते, साथ ही अपनी पुरानी चीजों पर भी अपनी पकड़ खोते चले जाते हैं। मुझे आज भी जब समय मिलता है, मैं रियाज करती हूं। यही मेरे जीवन संगीत को मुझ में जिंदा रखे हुए है।

05. नव प्रयोगवादी बनें
अक्सर लोग प्रयोग से घबराते हैं। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं, जो नए प्रयोग करते हैं या उनको तरजीह देते हैं। नए प्रयोगों का अर्थ धारा के विपरीत चल देना नहीं होता, बल्कि नई सोच-समझ के आधार पर किये जाने वाले प्रयोग ही नव प्रयोग हैं, जिसमें उस क्षेत्र के पुराने सभी प्रयोगों का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा होता है। आशा भोसले कहती हैं, ‘मैंने शुरुआती दौर में ‘पिया तू अब तो आजा’ जैसे गाने गाए, फिर ‘दिल चीज क्या है’, ‘इन आंखों की मस्ती’ जैसी गजलें और ‘चुरा लिया है तुमने’, ‘मेरा कुछ सामान’ जैसे रोमांटिक गीत भी गाये हैं। मेरे लिए यह सब नए प्रयोग ही थे, जिन्हें मैं आजमाते जा रही थी। हां, अक्सर लोग नए प्रयोग पर अपनी सहमति नहीं दिखाते, लेकिन यदि आपको लगता है आप सही हैं और बेहतर परिणाम दे सकते हैं तो नव प्रयोगों से बिल्कुल न झिझकें।’

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