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दोस्ती का हाथ

भारत में अमेरिकी राजदूत नैंसी पॉवेल की गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात एक व्यावहारिक कदम है। मोदी भाजपा की ओर से अगले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। अगर वह प्रधानमंत्री बन गए और अमेरिका द्वारा उनका बहिष्कार जारी रहा, तो गंभीर राजनयिक संकट खड़ा हो सकता है। भारत के प्रधानमंत्री को अगर अमेरिका में घुसने की इजाजत नहीं होगी, तो दोनों देशों के संबंधों को निभाना असंभव हो जाएगा। हालांकि अमेरिकी सरकार ने कहा है कि मोदी को लेकर उसकी वीजा नीति नहीं बदली है, पर अब यह सिर्फ औपचारिकता है। अमेरिका ने यदि मोदी का बहिष्कार खत्म कर दिया है, तो इसका अर्थ यह है कि वीजा अब कोई समस्या नहीं होगी। मोदी प्रधानमंत्री न भी चुने गए, तब भी वह देश की दूसरी बड़ी पार्टी के सबसे बड़े नेता तो बने ही रह सकते हैं। उस सूरत में भी उनसे किसी प्रकार का रिश्ता न रखना अमेरिका के लिए असुविधाजनक होगा। नरेंद्र मोदी का बहिष्कार खत्म करने की शुरुआत ब्रिटेन ने की थी। उसके बाद यूरोपीय संघ के राजदूतों से मोदी की मुलाकात हुई थी। पश्चिमी दुनिया में सिर्फ अमेरिका ही बचा था, सो उसने भी मोदी से हाथ मिला लिया है।

मोदी का बहिष्कार खत्म होना इसलिए भी अच्छा है कि सन 2002 के जिन दंगों की वजह से यह बहिष्कार किया जा रहा था, वह हमारे देश का आंतरिक मामला है, और उसे हमारे लोकतंत्र की संस्थाओं द्वारा ही तय किया जाना चाहिए। यह एक अलग विषय है कि हमारे देश में कानून-व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करने वाले संस्थान इस मामले में कितने विफल या सफल रहे, फिर भी इसका फैसला भारतीय जमीन पर ही होना चाहिए। जहां तक दूसरे देशों का सवाल है, तो मोदी भारत में एक सांविधानिक पद पर आसीन हैं और इसलिए उनके साथ उसी तरह का व्यवहार किया जाना चाहिए। इसलिए संप्रग की इस बारे में जो भी राय हो, भारत सरकार ने कभी अमेरिकी या यूरोपीय देशों की बहिष्कार नीति का समर्थन नहीं किया। इस मायने में जिन भारतीयों ने अमेरिकी सरकार से मोदी का बहिष्कार करने का आग्रह किया, वह भी ठीक नहीं था। गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर तरह-तरह के सवाल हैं, लेकिन उन सवालों के हल भारतीय समाज और सरकार को ढूंढ़ने होंगे। भारत जैसे एक सार्वभौम देश के नागरिकों के लिए यह ठीक नहीं है कि वह दूसरे देशों की सरकार को हमारे देश में हुए किसी कांड पर कार्रवाई के लिए कहे।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैतिक सिद्धांत सुविधा और समय के हिसाब से ही तय होते हैं। अमेरिकी इस खेल के पुराने खिलाड़ी हैं। वे पूरी दुनिया में लोकतंत्र को स्थापित करने का दावा करते हैं, लेकिन लातिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के तमाम कुख्यात तानाशाहों को अमेरिका का समर्थन मिला है। ईरान की परमाणु मुद्दे पर अमेरिका ने घेराबंदी की हुई है, लेकिन परमाणु हथियार रखने वाला और दुनिया भर में परमाणु टेक्नोलॉजी बेचने वाला पाकिस्तान उसका हमेशा दोस्त रहा है। इसके बरक्स मोदी एक लोकतांत्रिक देश में चुने हुए मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में, नरेंद्र मोदी का बहिष्कार भी एक पैंतरा था, जिसे असुविधाजनक होने पर बदल दिया गया है। अब भारत में विदेश व्यापार के लिए राज्यों के स्तर पर व्यवहार किया जाता है और व्यापार-उद्योग में गुजरात जैसे विकसित राज्य का बहिष्कार पश्चिमी देशों के लिए फायदेमंद नहीं है। गुजराती व्यापारी अमेरिका और यूरोप में भी हैं और वे भी इस बहिष्कार से खुश नहीं थे। नैंसी पॉवेल का मोदी से मिलना यही बताता है कि राजनय में कोई स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होता और अमेरिकी जमीनी हकीकत को स्वीकार कर रहे हैं।

 

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