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राइबोसोम पर अभी बहुत कुछ जानना बाकी

कल तक भले ही हमारे लिए अनजाने रहे हों, लेकिन नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद वेंकटरमन रामकृष्णन अब एक जाना-पहचाना नाम हो गए हैं। उनका नाम भारतीय मूल के उन लोगों में शुमार हो गया है, जिन्होंने अपना लोहा सारी दुनिया में मनवा लिया। कई दशक से गहन शोध कर रहे रामकृष्णन इस पुरस्कार को नहीं अपने काम को ही ज्यादा बड़ी उपलब्धि मानते हैं। नोबेल पुरस्कार की घोषणा के तुरंत बाद टेलीफोन पर उनसे रू-ब-रू हुए www. nobelprize. org के संपादक एडम स्मिथ।

आपने शुरुआत तो एक भौतिक वैज्ञानिक के रूप में की, लेकिन ऐसा क्या था कि आपको जीव विज्ञान ने आकर्षित किया?
मैं आपको ईमानदारी से बताता हूं। मैं सैद्धांतिक भौतिकशास्त्र पढ़ रहा था लेकिन मेरी पीएचडी जिस समस्या पर थी, उसमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस समय में नियमित रूप से ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ पढ़ा करता था, और मैंने यह पाया कि जीव विज्ञान में कई अद्भुत खोज चल रही हैं। मैं कई ऐसे भौतिकशास्त्रियों को जानता था, जो जीव विज्ञान में गए और कामयाब रहे। तो मैंने जीव विज्ञान में जाने का फैसला किया।

जैसे कि फ्रांसिस क्रिक जो मालिक्यूलर बॉयोलॉजी में चले गए?
हां ठीक वैसे ही। सच तो यह है कि आज मैं जिस प्रयोगशाला में हूं, उसमें भी कई लोग ऐसे ही हैं।

हां आप कैंब्रिज के एलएमबी में काम करते हैं, जहां कई महान आइडियाज़ पर काम चलता रहता है। ऐसी क्या खासियत है इस जगह की?
मुझे लगता है कि अगर आप कठिन चुनौतियों को हल करने में दिलचस्पी लेते हैं तो यहां उसके लिए बहुत अच्छा माहौल है। यही खास बात हैं यहां।

तो कोई जितनी भी मुश्किल चुनौती के बारे में सोच सकता है, उसके लिए यहां माहौल है?
ठीक ऐसा ही है। यही इस जगह का इतिहास है। यहां  रूटीन काम करने में समय बर्बाद नहीं करना पड़ता।

आपने राइबोसोम पर काम किया, जिसकी संरचना काफी ज्यादा जटिल होती है। क्या आपको इसी जटिलता ने आकर्षित किया?
मैं 1978 में जब पोस्ट डॉक्टरेट कर रहा था तो उस समय इसकी पहेली को हल करना लगभग असंभव सा था। यह जीव विज्ञान की एक मूलभूत समस्या थी। हमें लगा कि इस बारे में हम जितनी थोड़ी बहुत जानकारी भी हासिल कर पांएगे, वह एक उपलब्धि ही होगी। मैं इसकी ओर आकर्षित हुआ यह उससे ज्यादा बड़ी बात है। यह एक बहुत बड़ी समस्या थी, जिसे समझ पाना किसी भी तरह से आसान नहीं था। इसमें आकर्षित करने वाली बात यही थी कि यह जीव विज्ञान की एक मूलभूत समस्या थी।

आपके वेबसाइट पर एक वीडियो है, जिसमें राइबोसोम को काम करते हुए दिखाया गया है, उसे देखकर लगता है कि हमने इसके काम को अच्छी तरह समझ लिया है?
हां, लेकिन तभी तक, जब तक आप इसके रसायन विज्ञान के बारे में नहीं सोचते। हम बस एक मोटी समझ बना पाए हैं कि क्या हो सकता है या क्या कैसे होना चाहिए। लेकिन अगर आप इसकी आणविक प्रक्रियाओं को समझना चाहें या जानना चाहें कि किस दिशा में क्या हो रहा है तो आपको ज्यादा विस्तृत तस्वीर की जरूरत होगी। लेकिन इतना ही काफी नहीं है। इसे पूरी तरह समझने के लिए अभी कई बायोकैमिस्ट प्रयासों और कंप्यूटर गणनाओं की जरूरत पड़ेगी।

आपको नोबेल पुरस्कार बैक्टीरिया के राइबोसोम पर काम के लिए मिला है। क्या बैक्टीरिया का राइबोसोम हमारे राइबोसोम की तरह ही होता है?
कई मामलों में होता है और कई मामलों में नहीं होता है। इस समय इस पर काफी काम चल रहा है। लेकिन मुझे लगता है कि इस उलझन को सुलझाने में अभी काफी वक्त लगेगा।

आपका बहुत सारा काम एंटीबॉयोटिक के राइबोसोम पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर है। क्या आपको उम्मीद है कि स्ट्रक्चरल बायोलॉजी के इस तरह के अध्ययन से भविष्य में हम ऐसे नए एंटीबॉयोटिक बना लेंगे, जो प्रतिरोधक बैक्टीरिया पर भी कारगर साबित हों?
हां। हमने पता लगा लिया है कि प्रतिरोधक क्षमता कैसे बनती है और बेहतर एंटीबॉयोटिक कैसे डिजाइन किए जाएं। टॉम स्टेट्ज़ जिन्हें मेरे साथ ही नोबेल पुरस्कार मिला है, उन्होंने नए एंटीबॉयोटिक डिजाइन करने के लिए एक कंपनी भी बनायी है। यह एक बहुत बड़ी संतोषजनक चीज होगी।

पुरस्कार की घोषणा के बाद क्या-क्या हुआ?
फोन लगातार बज रहा है, इसलिए लगता है कि अब आज और कुछ नहीं हो सकेगा। लेकिन अभी मैं अपनी पत्नी को पुरस्कार की बात नहीं बता पाया हूं। यह उनके टहलने का समय है और उनके पास मोबाइल फोन नहीं है। मेरे पिताजी सिएटल में है, वहां इस समय रात के तीन बज रहे होंगे और मैं उन्हें जगाना नहीं चाहता।

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