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धरती से जुड़ा माटी का लाल

वेंकटरमन रामाकृष्णन को नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद एक बार फिर भारत की जय हो गई। इस सम्मान को पाने के बाद वेंकी नोबेल पाने वाले भारतीय मूल के सातवें वैज्ञानिक बन गये हैं। उनके शोध को स्वास्थ्य की दुनिया की महानतम उपलब्धि बताया गया है। उन्होंने राइबोसोम पर शोध किया है, जिससे बेहतर इलाज का रास्ता खुल गया है। उनके और उनके साथियों की खोज के बाद यह जानना आसान हो गया है कि एंटी बॉयोटिक दवा कैसे राइबोसोम के साथ जुड़कर प्रोटीन का बनना बंद कर सकती है। किसी वायरस को बेअसर बनाने के लिये उसके राइबोसोम का कामकाज बंद करना होता है।

तमिलनाडु के चिदम्बरम जिले में जन्मे 57 वर्षीय वेंकी कैंब्रिज इंग्लैंड में एमआरसी मॉलिक्यूलर बायोलॉजी लेबोरेटरी में स्ट्रक्चरल स्टडीज डिवीजन में ग्रुप लीडर तथा वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं। वेंकी ने शुरुआती शिक्षा तमिलनाडु में हासिल की। 1971 में बड़ोदरा के महाराजा सैयाजीराव विश्वविद्यालय से फिजिक्स में बीएससी की डिग्री हासिल की और उसके बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये अमेरिका चले गये। वहां उन्होंने 1976 में ओहियो विश्वविद्यालय से फिजिक्स में पीएचडी हासिल की। इसके बाद उनका मन फिजिक्स के जोड़-घटाव में नहीं लगा।

इस दौरान उनका झुकाव जीवविज्ञान की तरफ हो गया और उन्होंने सैनडियागो में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से जीव विज्ञान का एक वर्ष तक अध्ययन किया। इसके बाद वे एक मैम्ब्रेन बायोकेमिस्ट डॉ. मौरिसियो मोंटल के निर्देशन में शोध करने लगे। इसी समय विज्ञान पत्रिका नेचर में उन्होंने सूक्ष्म राइबोसोम इकाइयों का मानचित्र प्रकाशित करवाया और इसके बाद 21 सितम्बर 2000 के इसी पत्रिका में वेंकी ने दो शोध पत्र प्रकाशित करवाये।

डॉ.पीटर मूर के साथ उक्त शोध के बाद उन्होंने ब्रुक हेवन नेशनल लेबोरेटरी की नौकरी कर ली। फिर उन्होंने डॉ.स्टीफन व्हाइट के साथ कई राइबोसोमल प्रोटीन्स से जीन के क्लोन बनाने तथा उसके थ्री-डी चित्र तैयार करने का शोध किया। वेंकी 1995 में उटाह विश्वविद्यालय के बायोकेमिस्ट्री विभाग के प्रोफेसर नियुक्त हुए और कई शोध किए। बीते साल इंग्लैंड कैम्ब्रिज में एमआरसी लेबोरेटरी ऑफ मॉलिक्युलर बायोलॉजी में वरिष्ठ वैज्ञानिक के तौर पर गए और तब से वहीं काम कर रहे हैं। इस लेबोरेटरी में नोबेल हासिल करने वाले वह तेरहवें वैज्ञानिक हैं।

वेंकी बचपन से ही मेधावी थे। उन्हें शंका के समाधान तक प्रश्न पूछने की आदत थी। बड़ोदरा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अशोक रेडे उनके अध्ययनकाल को याद करते हुये बताते हैं कि वे एक अच्छे विद्यार्थी तो थे ही, वे दूसरी गतिविधियों में भी रुचि लेते थे। वे जीवन में बड़े वैज्ञानिक बनेंगे, इस बात का तो हमें अहसास था, लेकिन नोबेल मिलना हमारी कल्पना से परे था।

वेंकी का पूरा परिवार ही ज्ञान और हुनर की खान है। वेंकी के पिता सी. वी रामाकृष्णन बड़ोदरा विश्वविद्यालय में विभाग प्रमुख रहे हैं और उनकी पहचान एक बड़े विद्वान और शोधकर्ता की रही है। उनकी पत्नी बेरा रोजनबरी बच्चों की जानी-मानी कहानीकार हैं। बेटा रमन और बहू मेलिसा रिअरडॉन संगीत के क्षेत्र में नाम रोशन कर रहे हैं। रमन को सोलो वायलिन बजाने में महारथ हासिल है। रमन के बैंड डीडालस क्वाटेंट ने 2001 बॉफ इंटरनेशनल स्ट्रिंग क्वाटेंट प्रतियोगिता में जीत हासिल की थी। वेंकी बेशक विदेशी नागरिक हो गये हों। भारत को अभी भी वे अपना सब कुछ समझते हैं। वे बड़ोदरा विश्वविद्यालय से जुड़े हुये हैं। 2005 में वे बड़ोदरा में एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता शिरकत करने आये थे। बधाई वेंकी!

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