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खुद स्कूल हैं गणेश नारायण देवी

पिछले महीने डॉ. गणेश नारायण देवी का जब न्योता आया तो तबियत ठीक नहीं होने के बावजूद न नहीं कह पाई। गणेश एक मशहूर साहित्यकार ही नहीं, लम्बे समय से मेरे सहयोद्धा भी रहे हैं। 21 दिसम्बर को बड़ौदा गई और 29 को लौटी। आदिवासियों के लिए गणेश द्वारा किए गए और किए जा रहे काम को देखकर मैं आंतरिक आनंद से भर उठी हूँ।

इस मामले में वे एक स्कूल की तरह हैं और उनसे काफी कुछ सीखने योग्य है। गणेश पहले बड़ौदा के एमएस विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। बड़ौदा के अलावा भारत और विदेशों के कई विश्वद्यालयों में उन्होंने 1973 से 1996 तक अंग्रेजी साहित्य पढ़ाया। बाद में अध्यापन छोड़कर उन्होंने बड़ौदा से 100 किलोमीटर दूर उदयपुर के तेजगढ़ में आदिवासियों के बीच तृणमूल स्तर पर काम शुरू किया। वहाँ उन्होंने आदिवासी अकादमी बनाई। पिछले साल ही भारत सरकार ने उसे सेन्टर ऑफ एक्सिलेन्स का खिताब दिया। आज की तारीख में गणेश देवी का सामुदायिक विकास कार्य पश्चिमी भारत के 1200 गाँवों में फैल चुका है। गणेश महज आदिवासियों का जीवन स्तर उपर उठाने के लिए ही कर्मरत नहीं है, उन्होंने आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के लिए भी अत्यंत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है। आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के मकसद से ही उन्होंने बड़ौदा में भाषा अनुसंधान और प्रकाशन केन्द्र की स्थापना की थी। आदिवासी भाषाओं और उनके मौखिक साहित्य संबंधी साहित्य अकादमी की परियोजना के वे श्रृंखला संपादक रहे।

देश भर की घुमन्तू जनजातियों के कल्याणार्थ जब हमने डिनोटिफाइड एंड नोमेडिक ट्राइब्स राइट एक्शन ग्रुप (डीएनटी रैग) बनाया तो मैं अध्यक्ष और गणेश उसके कार्यकारी अध्यक्ष बने थे। हमने डीएनटी रैग का मुख्य पत्र ‘बुधन’ निकाला था और यथाशक्ति घुमन्तू जनजातियों के पक्ष में लड़ाई लड़ी थी। बुधन आज भी एक प्रतीक है। पुरुलिया के बुधन को बंगाल पुलिस ने मार डाला था। हमने कलकत्ता हाईकोर्ट में केस किया और केस जीते। आदिवासी संग्राम के लिए बुधन इसीलिए प्रतीक है। गणेश ने बुधन के अंक भी अत्यंत मनोयोग से निकाले थे। गणेश ने दिखा दिया है कि रचनाकारों को रचना-कर्म के अलावा समाज में अन्य रचनात्मक कार्य किस भाँति करना चाहिए। गणेश गुजराती, मराठी और अंग्रेजी में समान गति से लिखते रहे हैं और इन तीनों भाषाओं में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिले हैं। गणेश को कई अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले हैं जिनमें प्रमुख हैं - ‘कामल वेल्थ अकादमिक एक्सीलेन्स फेलोशिप’, ‘द टीएचबी सीमन्स फेलोशिप’ (ब्रिटेन), फुलब्राइट एक्सचेंज फेलोशिप (अमेरिका), ‘सार्क राइटर्स फाउन्डेशन एवार्ड’, ‘प्रिन्स क्लास अवार्ड (नीदरलैंड)’ और रोटरी फाउन्डेशन फेलोशिप।

डॉ. गणेश नारायण देवी की अंग्रेजी में छपी जो किताबें अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद समादृत रहीं, वे हैं- ‘इन अनादर टाँग’ (1993), ‘ट्रेडीशन एण्ड मॉडर्नेटी’ (1997), ‘प्रिन्टेड वर्डस’ (2002), ‘इंडियन लिटरेरी क्रिटिसिजम : थ्योरी एंड इंटरप्रीटेशन’ (2002), ए नोमेड काल्ड थीफ : ‘रिफ्लेक्शन अन आदिवासी वायस एँड साइलेंस’  (2006), ‘इण्डिजेनिटी : एक्प्रेशन एण्ड रीप्रेजेन्टेशन’ (2008)। पिछले साल द जी़  एऩ  देवी रीडर नामक ग्रंथ आया जिसमें उनके लम्बे निबंध संकलित हैं । जी. एन. देवी ने कई साहित्यिक पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। ‘सेतु’ पत्रिका वे अंग्रेजी और गुजराती दोनों भाषाओं में निकालते रहे हैं। ग्यारह आदिवासी भाषाओं में वे ‘ढोल’ नामक पत्रिका निकालते रहे हैं। देवी दूसरी संस्थाओं को भी मूल्यवान ग्रंथ संकलित कर प्रकाशित करने की प्रेरणा देते रहे हैं। गुजरात से लेकर महाराष्ट्र तक उनका असर है। उन्हीं की प्रेरणा से पुणे के भारती विद्यापीठ विश्वविद्यालय और साहित्य प्रेमी भगिनीमंडल ने मिलकर ‘बूमेन्स लिटरेचर इन इंडियन लैंग्वेजेज (1850-2000)’ नामक ग्रंथ दो खण्डों में निकाला है। पहला खंड 632 पृष्ठों का है जबकि दूसरा खण्ड 590 पृष्ठों वाला। इस ग्रंथ के लोकार्पण समारोह में गणेश के साथ मुङो भी पिछले माह शरीक होने का मौका मिला। इस किताब से भारतीय भाषाओं में बहुमूल्य योगदान करने वाली लेखिकाओं का सम्यक परिचय मिलता है। पुणे में हम हाल में दिवंगत मराठी के मशहूर लेखक दिलीप चित्रे के घर भी गए। बल्कि पुणे जाने का एकमात्र मकसद वही था। दिलीप की पत्नी अपने एकमात्र पौत्र के साथ रह रही हैं। दिलीप ने जिस तरह से भारत के लेखकों को अनुवाद के जरिए विश्व पटल पर उपस्थित किया था, वही काम आदिवासी साहित्य के संदर्भ में गणेश देवी भी कर रहे हैं। उनकी पत्नी सुरेखा भी उनके काम में पूरी तरह हाथ बंटाती हैं। सुरेखा पहले बड़ौदा के एम एस विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र की प्रोफेसर थीं। पति-पत्नी ने मिलकर आदिवासियों के बीच रचनात्मक कार्य का एक उदाहरण देश के सामने प्रस्तुत किया है।

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