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विद्या भास्कर होने का मतलब

क्या आप पत्रकार हैं? या, पत्रकारिता और पत्रकारों में रुचि रखते हैं? क्या आपने विद्या भास्कर का नाम सुना है? अगर नहीं, तो यह हमारा और हमारे समय का दुर्भाग्य है। विद्या भास्कर उस परंपरा की आखिरी कड़ी थे, जब संपादक सिर्फ अखबार के कर्ता-धर्ता नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों के चलते-फिरते लाइट हाउस हुआ करते थे।

आज अगर वह होते, तो हम उनके साथ उनकी जन्मशती मना रहे होते। सवाल उठता है, क्या किसी कर्मयोगी की जन्म शताब्दी मनाने के लिए उसका हमारे बीच होना जरूरी है? यकीनन नहीं। वे चले जाते हैं, पर देह धारण करने और उसे त्यागने के बीच किया गया काम उन्हें अनश्वर बना देता है। भास्कर जी ऐसे ही लोगों में से थे। गर्व है कि मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला। उन्हें याद करते हुए इस समय मन 1980 की उस दोपहर की ओर भटक चला है, जब मैंने आज में बहैसियत प्रशिक्षु काम शुरू किया था। उसी रात अस्सी की एक चाय की दुकान पर कुछ नौजवान पत्रकारों ने कहा था- ‘तू बहुत भाग्यसाली हया कि तुहैं भास्कर जी के साथे काम करै कै मउका मिला बा।’ मैं कुछ ही दिन पहले आगरा से वहां गया था। उनके यश से परिचित था, पर उन्हें नजदीक से जानने-समझने का मौका नहीं मिला था। हिंदी पत्रकारिता के आसमान पर उन दिनों धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी और रघुवीर सहाय जगमगा रहे थे। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ सक्रिय पत्रकारिता छोड़ चुके थे, पर उनकी बहुआयामी शख्सियत के मुकुट में संपादकत्व की भी एक मणि झिलमिलाया करती थी। इसके अलावा क्षेत्रीय पत्रकारिता के अपने नायक, खलनायक और विदूषक हुआ करते थे।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सूबे की दिक्कत यह थी कि पूरब, पश्चिम और मध्य के हिस्से एक-दूसरे से बहुत ज्यादा बावस्ता नहीं थे, पर पत्रकारिता के लोग भास्कर जी को बहुत इज्जत से देखा करते थे। नई तकनीक और नई पीढ़ी आगे आने को थी। इस पीढ़ी के लोग आजादी के बाद जन्मे थे। उनके सरोकार और सोच अलग थी, फिर भी स्वतंत्रता के यज्ञ में आहुति दे चुके लोग आज की तरह अतीत का हिस्सा नहीं बने थे। उनका बहुत सम्मान था और हम जैसे लोग संसार भर की क्रांतियों का इतिहास पढ़ते हुए उन्हें ‘प्रज्जवलित ज्योति’ की तरह देखते-समझते थे। भास्कर जी हमारे लिए ऐसी ही शख्सियत हुआ करते थे। मेरे मन में एक कौतूहल यह भी था कि तेलुगू परिवार में जन्मा व्यक्ति देश के सबसे प्रतिष्ठित हिंदी समाचारपत्रों में से एक आज का संपादक कैसे?

इसीलिए उन्हें नजदीक से देखने की लालसा बहुत थी। भास्कर जी तब तक रोजमर्रा के अखबारी कामों से खुद को मुक्त कर चुके थे। आज अखबार के मालिक के कमरे से सटा हुआ एक ऐसा कमरा था, जहां वह अपने दो साथियों के साथ बैठकर संपादकीय लेख लिखा करते थे। विद्या भास्कर, चंद्र कुमार और लक्ष्मीशंकर व्यास की यह त्रिमूर्ति गजब की थी। भास्कर जी तेलुगू परिवार में जन्मे थे और व्यास जी गुजराती परिवार में। सिर्फ चंद्र कुमार जी हिंदीभाषी थे। यह काशी का ही कमाल था, जहां अहिंदीभाषी लोग पत्रकारिता के पुरोधा थे।

आज के तो पहले संपादक ही मराठी थे। पलटकर जब उन दिनों को याद करता हूं, तो आह निकलती है। यह ठीक है कि हिंदी पत्रकारिता प्रसार की दृष्टि से बढ़ी है, पर आज हमारे पास कोई तेलुगू या मराठी संपादक नहीं है। इसे पतन मानें या विकास? आज में आते-जाते कई महीने हो गए थे, पर भास्कर जी से मिलने का मौका नहीं मिला। एक दिन अचानक उनका बुलावा आया। खद्दर की धोती और कुर्ता में वह सामने थे। मोटे फ्रेम के चश्मे के पीछे से उनकी बड़ी-बड़ी आंखें मुझे घूरती हुई लगीं। उन्होंने पूछा, ‘आप कौन?’ मैं अचकचा गया।
समझने में पल-दो-पल लग गए कि वह मेरा नाम पूछ रहे हैं। मैंने अदब से सिर झुकाकर उन्हें अपना नाम बताया। उन्होंने पूछा कि आपको ही ‘साइंस कांग्रेस’ कवर करने के लिए कहा गया है? मैंने हामी भरी। उसके बाद उन्होंने पूछा कि क्या कभी विज्ञान पढ़ा है? मैंने कहा, नहीं। इस पर उनका कहना था कि देखिए, आज में रिपोर्टिंग की एक विशेष परंपरा है। अनायास जटिल विषयों को कवर करने की कोशिश मत कीजिएगा।

जो भी लिखें, उस विषय के किसी न किसी प्राध्यापक से जरूर बात कर लें। उन्हें यह जानकर तसल्ली हुई कि मैंने पहले से ही कई प्राध्यापकों की सूची बना रखी है और अधिवेशन में भाग लेनेवालों पर क्या-क्या खबरें की जा सकती हैं, इसका एक खाका मेरे दिमाग में तैयार है। उन्होंने मुझे रुखसत होने का संकेत किया। ऐसा लगा कि वह मुस्कुरा रहे हैं।

बाद में मालूम हुआ कि रुखाई उनके स्वभाव में नहीं थी, किंतु समूचे व्यक्तित्व पर गंभीरता का अद्भुत लेप था। उनके लेखन और कार्यशैली में विचारों की गहराई के साथ खरी साफगोई हमेशा झलकती थी। उनका कॉलम ‘अपना भारत’ पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के हजारों लोगों के लिए सोमवार के सूरज का पर्याय हुआ करता था। उन दिनों के चलन के अनुसार भाषा भले ही संस्कृतनिष्ठ थी, पर गति इतनी कि बरबस ही भवभूति या जयदेव का काव्य याद आ जाता था।

‘भागलपुर अंखफोड़वा कांड’ पर जिस तरह उन्होंने सत्ताधारियों और अपराधियों के निरंकुश गठजोड़ पर टिप्पणी की थी, उसकी कठोरता आज भी शब्द-दर-शब्द याद आती है। वह उन लोगों में थे, जिन्हें अंग्रेजों ने जेल में बंद किया और आजादी के बाद वे सत्ताधारियों की आंख की किरकिरी बने रहे। भास्कर जी के लिए पत्रकारिता सिर्फ आजीविका नहीं थी। एक बार इलाहाबाद में ममफोर्डगंज स्थित उनके घर पर मैंने उनसे पूछा था कि आपने जब अखबार में काम शुरू किया, तब यह मिशन हुआ करता था। अब बहुसंस्करणीय अखबारों का समय शुरू हो रहा है। सरकार ने इसे उद्योग का दर्जा दे दिया है।

देश-सेवा से उद्योग तक का यह सफर आपको कैसा लग रहा है? उनके चेहरे पर वही कठोरता झलकी, जो उनके हर लेख का हिस्सा हुआ करती थी। जवाब देने की बजाय उन्होंने उस दिन के एक अखबार की प्रति उठाई और एक खबर पर उंगली रखकर पूछा, इसे किसने लिखा है? जी मैंने। मेरा जवाब सुनकर वह वैसे ही मुस्कुराते हुए लगे, जैसे पहले दिन प्रतीत हुए थे। बोले, अच्छी है। तकनीकी दृष्टि से कोई कमी नहीं है और मानवता की झलक भी है। उन कुछ लम्हों में ही उनसे दो बातें सीखने को मिलीं। एक, चुप रहकर भी कैसे जवाब दिया जाता है। दूसरी, तकनीक और मानवता के तालमेल की। आज तीन दशक बाद बड़ी शिद्दत से महसूस हो रहा है कि हर रोज बलवान होती तकनीक के इस युग में इंसान की सबसे बड़ी जरूरत इंसानियत है। वक्त के साथ पत्रकारिता की चाल और चेहरा भी बदला है। जब इसके चरित्र को बदलने की जुगत देखता हूं, तो विद्या भास्कर बहुत याद आते हैं। उन्होंने देश-समाज के चाल और चेहरे को बदलने की पुरजोर कोशिश की, पर अपना चरित्र कभी डगमगाने नहीं दिया। वह हमारे लिए लाइट हाउस थे और हमेशा रहेंगे।

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