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10 अप्रैल, 2020|10:56|IST

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कठघरे में लोकतंत्र

उन्होंने तय किया था कि अगले पुलिसिया हमले का जवाब वे अपने कपड़े उतारकर देंगी। वे भी इसी देश की नागरिक हैं, पर संविधान प्रदत्त गरिमा के साथ जीने के बुनियादी अधिकार से लैस होने के बावजूद उनको और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। निर्वस्त्र होने का फैसला, वह भी सार्वजनिक स्थान पर, किसी महिला के लिए आसान नहीं हो सकता। खासकर उस मुल्क में, जिसमें मर्यादा की तमाम इबारतें स्त्री देह पर लिखी जाती हैं। पर उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले के गोविंदपुर गांव की महिलाओं ने यही फैसला किया था। पॉस्को और सत्ता से लेकर विपक्ष तक में बैठे उसके दलालों से त्रस्त इन महिलाओं के लिए शायद कोई और विकल्प बचा भी नहीं था। विडंबना बस यही थी कि उनका यह प्रतिरोध महिला दिवस की पूर्व संध्या पर दर्ज होना था।

यह एक ऐसा फैसला था, जिसने सबको थर्राकर रख दिया। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था। पर इस फैसले ने जुलाई 2004 की उस निर्मम दुपहरी के जख्म को हरा कर दिया, जब इसी मुल्क के मणिपुर की माएं अपने कपड़ उतार असम राइफल्स के मुख्यालय के सामने खड़ी हो गई थीं। अपनी बेटियों का रोज बलात्कार होते देख मणिपुर की माओं का गुस्सा छलक आया था। पर उड़ीसा तो मणिपुर से हजारों किलोमीटर दूर है। अशांति से इसका कोई खास रिश्ता नहीं रहा, फिर यहां की महिलाओं का सरकार और पुलिस से विश्वास वैसे ही क्यों छीज गया, जैसे मणिपुर की माओं का? साफ है, संदेश अच्छे नहीं हैं। न लोकतंत्र के लिए, न नागरिकों के लिए।

मुफस्सिल म्यूजिंग ब्लॉग से

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