DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आधा अधूरा पर असरदार कानून

सोलह दिसंबर को दिल्ली में हुई भयावह घटना देश के महिला सशक्तीकरण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बिंदु बनकर उभरी है। इसके बाद महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों, मसलन, घरेलू हिंसा, छेड़छाड़, बदसलूकी, बलात्कार, अपहरण, ब्लैकमेलिंग, अभद्र टिप्पणी वगैरह पर चारों ओर बहस छिड़ी है। यौन हिंसा जो तब तक अपने देश में ‘टैबू विषय’ था , जिस पर खुलकर चर्चा करने से लोग कतराते थे, अब उस पर स्कूल-कॉलेज, घर-परिवार, दफ्तर और अन्य कामकाजी क्षेत्रों में बातें होने लगीं। सोच का वह दीवार ढहने लगी, जिसके दायरे में रहकर यह कहा जाता था कि यौन हिंसा के लिए कोई और नहीं, स्वयं महिलाएं ही जिम्मेदार होती हैं। उनके स्वभाव और पहनावे को ही यौन हिंसा के लिए जिम्मेदार माना जाता था। शायद इसलिए भी कानून प्रवर्तन संस्थाएं और आपराधिक न्याय संगठन महिलाओं को यौन हिंसा के मामले में कभी समुचित न्याय दिलाने की स्थिति में नहीं रहे।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देश में बलात्कार के 95,000 मामले लंबित हैं। जितने मामलों में चाजर्शीट दायर होती है, उनमें से महज 26 फीसदी में ही सजा मिल पाती है। यानी चार मामलों में से एक में सजा मिलती है। एक-एक मामले को निपटाने में दस से 14 साल लग जाते हैं। हाल ही में हमारे संस्था की ओर से एक सर्वे आया था कि बलात्कार के मामले में पुराने कानून में सात साल की सजा का प्रावधान है, फिर भी अपराधियों को 11-11 महीने तक की सजा हुई है और जेल से छूटने के बाद ये अपराधी फिर से इसी तरह के अपराध करते हैं। दरअसल, देश में एक तरह से एक ऐसा तंत्र बन गया है, जो अपराधी को कसूरवार ठहराने की जगह पीड़िता को ही अपराधी मानता है। लेकिन 16 दिसंबर की घटना से, जो क्रूरता की पराकाष्ठा थी, जिसने ‘निर्भया’ की जिंदगी छीन ली, समाज की चेतना जुड़ गई और उसके बाद सामाजिक चिंता का विषय यौन अपराध घर-घर जाकर बैठ गया। इसके बाद से एकाएक यह राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है।

सामाजिक मानसिकता बदली और ऐसे अपराध समाज में दोबारा न हों, यह संकल्प का मुद्दा बना। सरकार द्वारा गठित जेएस वर्मा कमीशन ने इस पूरे मुद्दे को संजीदगी से लिया और समाज के सभी अंगों से सुझाव मांगें और उन पर गौर भी किया गया। ऐसे में, वर्मा कमीशन की रिपोर्ट को हम ‘पाथ ब्रेकिंग’ या ‘मील का पत्थर’ कह सकते हैं, क्योंकि इसकी मूल भावना अपराधियों की सोच पर प्रहार करती है। अब तक यौन शोषण और महिला हिंसा के ताने-बाने को शर्म व इज्जत के लबादे में लपेटकर महिला के ऊपर लाद दी गई थी, जबकि अगर यह शर्म और इज्जत का मसला है, तो पूरे समाज के लिए है। इस रिपोर्ट में साफ किया गया कि महिला के खिलाफ किसी भी तरह की जोर-जबरदस्ती, उसकी इच्छा के विपरीत उठाया गया कदम उस पर हमला है। इसके अलावा, इसने यौन हिंसा की परिभाषा भी बदली। हल्की-फुल्की छेड़छाड़, बदतमीजी, अश्लीलता, छूने की कोशिश, फोन पर अभद्र टिप्पणी या संदेश को भी इसमें शामिल किया गया। इन सबके लिए सजा सुनिश्चित करने की बात उठाई गई। साथ ही सजा की कड़ाई को, अर्थात 20 साल से लेकर ता-उम्र सजा को भी सुनिश्चित करने का प्रस्ताव रखा गया। देखा जाए, तो मोटा-माटी वर्मा कमीशन की रिपोर्ट में तीन बातें अहम थीं।

पहली, राजनीति में जो हमारा प्रतिनिधित्व करता है, अगर वह यौन हिंसा का अपराधी है, तो उसे तत्काल पद से हटाया जाए और कानूनी कार्रवाई शुरू हो। दूसरी, यौन हिंसा के मामले में सेना या वर्दी की भी जिम्मेदारी तय की गई। तीसरी, वैवाहिक संबंधों में जोर-जबरदस्ती भी यौन हिंसा मानी गई। वर्मा कमीशन की मूल मंशा का पालन तभी मुमकिन है, जब देश में पुलिस व न्यायिक सुधार हों। इस कमीशन ने भी इन दो सुधारों पर प्रकाश डाला। 
बहरहाल, काफी कम रिकॉर्ड समय में जहां वर्मा कमीशन ने अपनी रिपोर्ट दी, वहीं सरकार ने भी महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों को रोकने के लिए काफी कम समय में अध्यादेश लाकर सख्त कानून को बनाया और उसे लागू किया। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि यह अध्यादेश अफरा-तफरी में लाया गया है, इसमें एक राजनीतिक मंशा भी है। दरअसल, सरकार जानती है कि जनता में जबर्दस्त गुस्सा है और किसी भी तरह की सरकारी कोताही को वह स्वीकार करने के मूड में नहीं है।

वहीं दूसरी तरफ, इस कानून के बनने के बाद विरोध के स्वर मुखर हो गए हैं, परंतु इस कानून की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें एक साफ संदेश दिया गया है कि अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा। इसलिए कानून आधा-अधूरा होने के बावजूद प्रशंसनीय है और इसमें अपराध रोकने के खिलाफ सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति प्रकट होती है। बेशक, वर्मा कमीशन की रिपोर्ट के सभी सुझावों को इसमें शामिल किया जाता, तो बात कुछ और होती। वैसे हमारे सामने प्रासंगकि प्रश्न यह है कि देश में कानून तो अच्छे हैं ही, पर वे ठीक तरीके से लागू नहीं हो पाते, क्यों? कहीं व्याख्या बदल जाती है, तो कहीं संदर्भ। देश में 10 लाख की आबादी पर 13 जज हैं, जो अन्य विकसित देशों के मुकाबले काफी कम है। इस तरह के अपराध को निपटाने के लिए दिल्ली में कुल पांच त्वरित न्यायालय होंगे, पर यह बस देश की राजधानी के लिए है, दूर-देहात के लिए नहीं। इसलिए सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी तो यह बनती है कि वह प्रचार-प्रसार के जरिये यौन-अपराधों के खिलाफ अध्यादेश को गांवों तक पहुंचाए। संविधान के तहत सबको सुरक्षा के जो अधिकार मिले हैं, उनकी पूर्ति का यही सबसे बेहतर वक्त है।

इसके अलावा, इस अध्यादेश में एक जगह यह कहा गया है कि पुरुषों द्वारा औरतों पर किया जा रहा अत्याचार यौन हिंसा है, परंतु यह जरूरी तो नहीं कि पुरुष ही औरत पर शारीरिक अत्याचार करे। इसलिए इसे ‘जेंडर न्यूट्रल’ बनाने की भी जरूरत है। बहरहाल, इस अध्यादेश पर आने वाले बजट सत्र में गंभीर बहस होनी चाहिए, तभी सभी खामियां उभरकर सामने आएंगी और उन्हें दूर कर के यौन हिंसा के खिलाफ एक सशक्त कानून बन पाएगा। साथ ही, वर्मा कमीशन की समग्र रिपोर्ट को भी समाहित करने की आवश्यकता है और कानून-व्यवस्था को भी समुचित साधन मिले, वरना इसका हश्र भी घरेलू हिंसा निरोधक कानून जैसा हो सकता है। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:आधा अधूरा पर असरदार कानून