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हमारा, आपका और उनका भ्रष्टाचार

इन दिनों सारी राजनैतिक पार्टियां भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रही हैं और सारी पार्टियों के बड़े-बड़े नेताओं के भ्रष्टाचार के किस्से सामने आ रहे...

हमारा, आपका और उनका भ्रष्टाचार
Wed, 31 Oct 2012 07:42 PM
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इन दिनों सारी राजनैतिक पार्टियां भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रही हैं और सारी पार्टियों के बड़े-बड़े नेताओं के भ्रष्टाचार के किस्से सामने आ रहे हैं। इससे यह लगने लगा है कि सारी ही पार्टियां लगभग बराबरी के स्तर पर भ्रष्ट हैं, बहुत हुआ तो उन्नीस बीस का फर्क होगा। इससे एक और निष्कर्ष यह निकलता है कि अगर जनता की दिली तमन्ना के मुताबिक सारे भ्रष्ट नेताओं को जेल में डाल दिया जाए तो देश की राजनैतिक व्यवस्था ठप्प हो जाएगी, विधायिका के तमाम संस्थानों में सन्नाटा छा जाएगा और पार्टियों के दफ्तर में सुबह ताला खोलने के लिए भी कोई नहीं होगा। लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ राजनेता ही भ्रष्ट हैं, हालांकि सबको भ्रष्ट राजनेताओं को भला बुरा कहना अच्छा लगता है।

नौकरशाही में हमारे आपके जैसे मध्यमवर्गीय, अपेक्षाकृत पढ़े-लिखे लोग होते हैं और वे भी राजनेताओं जितने ही भ्रष्ट होते हैं। अगर हर आदमी यह सोचे कि उसने क्या किसी मंत्री को कभी रिश्वत दी थी, तो ज्यादातर लोग इसका जवाब ‘नहीं’ में पाएंगे। इसके बरक्स अगर हर व्यक्ति अपने आप से पूछे कि उसने क्या किसी सरकारी कर्मचारी को कभी रिश्वत दी थी, तो शायद हर बार जवाब ‘हां’ में हो। एक बड़े सरकारी विभाग के एक सतर्कता अफसर ने बताया कि वह इधर-उधर इक्का-दुक्का लोगों को पकड़कर अपनी नौकरी बजाते रहते हैं, अगर सारे भ्रष्ट कर्मचारियों को पकड़ लिया जाए, तो विभाग बंद हो जाएगा।

भ्रष्ट लोगों पर गुस्सा जायज है लेकिन सारे भ्रष्ट लोगों को जेल में ठूंस देना व्यावहारिक नहीं है और संभव भी नहीं है। अच्छा हो अगर भारतीय मध्यवर्ग अपने गुस्से को कम करके कुछ गंभीरता से इस समस्या पर सोचे। तब कईं मिथ टूटेंगे, शायद हल भी सूझे। पहला भ्रम तो यही है कि सिर्फ राजनीति में भ्रष्टाचार है, जबकि हमारे जैसे मध्यवर्गीय लोग भी उतने ही भ्रष्ट हो सकते हैं। नेता तो भ्रष्टाचार से कमाया काफी कुछ पैसा वापस जनता के लिए खर्च भी करते हैं, मध्यमवर्गीय लोग तो पूरा ही डकार जाते हैं। दूसरे, दुनिया के जिन देशों में भ्रष्टाचार बहुत कम है, लगभग सभी विकसित लोकतांत्रिक देश हैं। सिंगापुर जैसा एकाध अपवाद है लेकिन वह तो एक शहर बराबर देश है।

मध्यमवर्गीय लोगों का एक मिथ यह है कि लोकतंत्र से भ्रष्टाचार बढ़ता है और इसका इलाज फौजी शासन है। हालांकि निरपवाद रूप से सारी फौजी तानाशाहियां बहुत ज्यादा भ्रष्ट रही हैं। बल्कि यह कहना चाहिए कि किसी भी किस्म की तानाशाही में भ्रष्टाचार पनपता है, चाहे वे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी। पूर्व साम्यवादी देशों में और लातिन अमेरिका के अमेरिका परस्त फौजी तानाशाहियों के तंत्र में भारी भ्रष्टाचार रहा है। यह बहुत साफ है कि जिस व्यवस्था में कठोर सेंसरशिप हो और किसी बड़े आदमी का विरोध करने पर जेल या मृत्युदंड मिल सकता हो उसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना सबसे खतरनाक हो सकता है।

लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी होती है और लोगों को विरोध करने का हक होता है, इसलिए भ्रष्टाचार का शोर बहुत होता है, लेकिन भ्रष्टाचार घटाने की गुंजाइश भी होती है।
तमाम लोकतांत्रिक देश अपने यहां लोकतंत्र के विकास के दौर में एक ऐसी स्थिति से जरूर गुजरे हैं, जब वहां भ्रष्टाचार बहुत रहा है। लोकतंत्र के परिपक्व होते-होते लोग अपने हक के प्रति सचेत होते हैं और तब उन्हें यह महसूस होता है कि साफ-सुथरा और ईमानदार प्रशासन पाना उनका बुनियादी हक है। हम इस प्रक्रिया से अभी गुजर रहे हैं, जब आम नागरिकों को यह लग रहा है कि वे उस तरह के साफ-सुथरे प्रशासन के हकदार हैं, जैसा कई विकसित लोकतांत्रिक देशों में है। भ्रष्टाचार का इलाज किसी तरह की तानाशाही नहीं, बल्कि और ज्यादा लोकतंत्र है।

भ्रष्टाचार के बारे में एक और मिथक यह खासतौर पर समाजवादी रुझान के लोगों में लोकप्रिय है कि आर्थिक उदारीकरण से भ्रष्टाचार बढ़ा है। यह सही है कि उदारीकरण के बाद भ्रष्टाचार का आकार बढ़ा है लेकिन इसकी वजह यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था का ही आकार तेजी से बढ़ा है। पिछले दस साल में हमारी अर्थव्यवस्था का आकार दुगना हो गया है, इतनी तेज रफ्तार से विकास में लुटेरों के हाथ भी ज्यादा लूट लग जाती है। इसके बावजूद तथ्य यह है कि हमारे देश में भारी भ्रष्टाचार की जड़ें नियंत्रित लाइसेंस परमिट वाले राज में थीं। जब हर कदम पर चार सरकारी विभागों से मंजूरी लेनी हो और मामूली घरेलू बिजली का कनेक्शन जैसे काम में दजर्न भर प्रक्रियाओं से गुजरना हो, तो हर कदम पर रिश्वत ही आसानी पैदा कर सकती है।

नियंत्रित अर्थव्यवस्था में चीजों की वास्तविक या कृत्रिम कमी होती है और ऐसे में काला बाजार और भ्रष्टाचार की अर्थव्यवस्था को बल मिलता है। 30-40 साल पहले कई लोगों ने स्कूटर या ट्रकों के कालाबाजार का धंधा खूब किया था। गैस और टेलीफोन कनेक्शन के ब्लैक का भी बाजार था। अब ये धंधे लगभग बंद हो गए। सरकारी प्रक्रियाओं में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक और नया जांच का स्तर बना दिया जाता है और इस तरह भ्रष्टाचार का एक और ठिकाना बन जाता था। इसी के साथ अगर आयकर की दर 90 प्रतिशत तक हो तो कर बचाने में लोगों की दिलचस्पी जागेगी ही और काले पैसे की अर्थव्यवस्था मजबूत होती जाएगी। भ्रष्टाचार रोकने का उपाय ज्यादा कठोर सरकारी नियंत्रण नहीं है, सरकारी प्रक्रियाओं को सरल बनाना और अर्थव्यवस्था को उदार बनाना है। ज्यादा सरकारी नियंत्रण वाली व्यवस्थाएं अनिवार्य रूप से ज्यादा भ्रष्ट होती हैं।

सारी दुनिया में लोगों को राजनेताओं के भ्रष्टाचार पर चर्चा करने में दिलचस्पी होती है, लेकिन यह धारणा गलत है कि भ्रष्टाचार ऊपर से शुरू होता है, इसलिए उसका खात्मा भी ऊपर से ही होना चाहिए। ‘जब नेता हजारों करोड़ डकार रहे हैं तो मैं बीस रुपये ज्यादा क्यों न लूं’ यह ऑटो रिक्शा वाले का तर्क समाजवादी जरूर होगा लेकिन व्यावहारिक तौर पर गलत है। दुनिया के जिन देशों में भ्रष्टाचार लगभग न्यूनतम है, उन देशों में भी राजनैतिक भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ है। जापान के आम नागरिक को रोजमर्रा के कामकाज में भ्रष्टाचार नहीं सहना पड़ता लेकिन वहां पिछले सालों में न जाने कितने प्रधानमंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोपों में इस्तीफा देना पड़ा, यहां तक कि स्वीडन और नार्वे जैसे लगभग आदर्श सार्वजनिक जीवन वाले देशों में भी राजनैतिक भ्रष्टाचार है।

वैसे भी आम आदमी को असली परेशानी बिजली, पानी, सड़क के सरकारी विभागों के भ्रष्टाचार से होती है, और यहां भ्रष्टाचार खत्म होना हमारे आपके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह बात बराबरी के सिद्धांत के खिलाफ लग सकती है लेकिन व्यावहारिक और यथार्थपरक तो यही है। नेताओं के भ्रष्टाचार पर हम बिल्कुल विरोध प्रकट करें लेकिन क्या भारतीय मध्यमवर्ग को अपने गिरेबान में भी नहीं झांकना चाहिए। रिश्वत लेने वाले, बाबू, अफसर, इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक सब हमारे आसपास के ही लोग तो हैं, आखिर हम इनके भ्रष्टाचार को नेताओं के भ्रष्टाचार के शोर में कब तक नजरअंदाज करते रहेंगे।