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सामाजिक नियंत्रण के गैर-पारम्परिक नुस्खे

ब्रिटेन के पुलिस महकमे में इन दिनों एक नए किस्म के हथियार के आगमन को लेकर काफी सरगर्मी नज़र आ रही है। उसके जवानों के हाथों अब एक ऐसा हथियार पहुंचने वाला है जो 100 फुट की दूरी से ही करंट का झटका देकर किसी को भी पस्त कर देगा।

यह एक अनोखी शॉटगन है जिसकी विशेष ‘गोली’ 500 वोल्ट करंट का झटका दूर से ही दे देगी, जिससे कोई बेहोश भी हो सकता है। अभी तक वहां पारम्परिक स्टन गन का प्रयोग होता था, जिसकी विद्युतीय गोली 25 फुट तक ही पहुंच सकती थी और पांच सेकंड का ही झटका देती थी जबकि बारह बोर की यह नयी शॉटगन 20 सेकंड तक झटका देती है। कई मामलों में इससे जान तक जा सकती है। ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ के मुताबिक वर्ष 2001-2008 के बीच स्टन गन के इस्तेमाल से अकेले अमेरिका में 334 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा।

वैसे भारत के बारे में भी खबर है कि जम्मू-कश्मीर में सरकार इलेक्ट्रोशॉक गन्स के इस्तेमाल के बारे में गम्भीरता से सोच रही है। इसे टेसर हथियार भी कहा जाता है। यह हथियार बिजली के प्रवाह को निर्मित करता है और स्नायुओं के स्वैच्छिक नियंत्रण को बाधित करता है और इस तरह किसी भी तरह के प्रदर्शनकारी या भीड़ को निष्क्रिय कर देता है या किसी खतरनाक व्यक्ति को कुछ समय तक के लिए बिल्कुल बेकार कर देता है।

इस प्रभाव को तात्कालिक न्यूरोमस्क्युलर पंगुपन कह सकते हैं। अगर किसी के सीने को निशाना बना कर इस हथियार को चलाया जाए तो उपरोक्त व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ने की भी आशंका रहती है। एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे मानवाधिकार संगठन इस किस्म के हथियारों का पुरजोर विरोध करते हैं। वे न्यूरोमस्क्युलर विकलांगता को यातना की श्रेणी में ही शुमार करते हैं। जम्मू-कश्मीर ही नहीं पंजाब भी पहले ही ऐसे ऐसे हथियारों की आर्डर दे चुका है तथा मध्यप्रदेश तथा नेशनल सिक्युरिटी गार्डस की अपहरणविरोधी शाखा की तरफ से भी आर्डर देने की तैयारी चल रही है। निश्चित ही गैरपारम्परिक कहे गए हथियारों में अकेले टेसर गन ही नहीं है।

इस बीच ऐसे ही एक और हथियार माइक्रोवेव किरण गन विकसित करने की खबर आई है जो भारी शोर को सीधे लोगों के दिमाग तक पहुंचा देगी। इस उत्पाद को युद्ध के अलावा अन्य कामों जैसे भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इस गन में माइक्रोवेव आडियो इफेक्ट का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें छोटे माइक्रोवेव लहरें या पल्सेस तेजी से टिशू को गरम करते हैं और सिर में एक शॉकवेव पैदा करते हैं।

फिलहाल तो इस गन को लेकर दो तरह की बातें चल रही हैं। एक तो गैरसैनिक उपयोग की चर्चा है। जैसे कहीं टिड्डी दल का हमला हो जाए तो ऐसे कीड़ों को भगाया जा सकता है। इसके अलावा ऐसी तकनीक से उन लोगों को लाभ हो सकता है जिनकी सुनने की क्षमता ठीक नहीं है।

दूसरा यह भी कहा जा रहा है कि इसका इस्तेमाल युद्ध के साथ ही दंगाइयों या आतंकवादियों को भगाने के लिए भी किया जा सकता है, लेकिन आमतौर पर पाया यह गया है कि ऐसे हथियारों को लेकर शुरू में बातें चाहे जो भी कही जाएं लेकिन उनका इस्तेमाल भीड़ का नियंत्रित करने और प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए होता है, यहां तक कि अपनी जायज मांगों के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ भी। इसके अलावा ऐसे हथियारों का इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों और उनके समर्थकों को यातना देने तक में होता है।

अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने तो बाकायदा ऐसा एक विभाग ही बना दिया है जो इसी तरह के हथियारों को विकसित करने में लगा हुआ है। ‘जाइन्ट नान-लेथल वेपन्स डायरेक्टोरेट’ अर्थात ‘गैर-प्राणघातक हथियार निदेशालय’ में विकसित किए जा रहे अकोस्टिक माइक्रोवेव आर्मामेंटस्, लेसर चालित प्लाजमा चैनल्स या वोर्टेक्स रिंग गन्स जैसे हथियारों के नाम सुनने में किसी विज्ञान कथा के हिस्से लगते हैं। लेकिन लोगों को अक्षम बना देने वाले इस तरह के हथियार एक हकीकत हैं और इनका विकास तेजी से हो रहा है।

हालांकि इस तरह के हथियारों का विरोध भी कम नहीं हो रहा। कई विचारकों और वैज्ञानिकों ने इनका लगातार विरोध किया है। टॉम बुर्गहार्ड द्वारा सम्पादित किताब ‘पोलिस स्टेट अमेरिका’ में प्रकाशित लेख ‘नान-लेथल वारफेअर’ इस परिघटना पर बखूबी रोशनी डालता है। ऐसी ही एक और किताब ‘द कम्प्लेक्स’ में बताया गया है कि किस तरह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी अकादमिक जगत अपने अनुसन्धान और विकास की परियोजनाओं के लिए अधिकाधिक तौर पर अमेरिकी रक्षा विभाग की फंडिंग पर निर्भर रहने लगा है जिसके कारण ऐसे हथियारों की तकनीक तेजी से विकसित हो रही है।

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं

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