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ब्लॉग वार्ता : गौरैया के बिना सूना घर-आंगन

इस साल बीस मार्च को एक दिन दुनिया भर में गौरेया के नाम तय हुआ है। विश्व गौरैया दिवस। गौरैया हमारे गांव, घरों से लुप्त हो रही है। ऐसा न हो गिद्ध की तरह गौरैया भी धरती से गायब हो जाए। शहरों से तो गौरैया को बिल्कुल गायब कर दिया गया है। चिड़ियों को लेकर लोगों की संवेदनशीलता किताबी रह गई है।

गाजियाबाद के जिस हिस्से में मैं रहता हूं वहां हर रविवार गोली चलने जैसी आवाज आती है और बड़ी संख्या में कबूतर फड़फड़ाते हुए भागते नजर आते हैं। पता चलता है कि कोई अपने एयरकंडीशनर पर कबूतरों की बीट से परेशान है तो कोई बालकनी के खराब होने से। फिर जब अपने गांव जितवारपुर जाता हूं तो हर घर में गौरैया का घोंसला नजर आता है। मां जतन करती है कि घोंसला बना रहे। गौरैया की चहचहाहट को शुभ माना जाता है। ये अंतर है गांव और शहर के नजरिये में। शहर वाले सफाई को लेकर हिंसक हैं तो गांववाले थोड़ी गंदगी के साथ गौरैया के साथ जीने के आदी हैं।

प्रथम विश्व गौरैया दिवस की जानकारी मिली dudhwalive.com से। पर्यावरण, प्रति, जैवविविधता और वन्य जीवों के संरक्षण को लेकर यह हिन्दी की पहली इंटरनेट पत्रिका है। इस पर कोशिश हो रही है कि इन मुद्दों पर लिखे जा रहे तमाम लेखों को एक जगह लाया जा सके ताकि हिन्दी में इस मुद्दे पर जानकारियों का प्रसार हो सके। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब कॉलेजों में पर्यावरण की पढ़ाई हो रही है लेकिन वहां यह विषय परिपक्व नहीं हुआ है, खासकर हिन्दी के छात्र पठन सामग्री ढूंढ़ते रहते हैं लेकिन उन्हें नहीं मिलती।

गौरैया क्यों खत्म हो रही है, इस पर काफी जानकारी है।  बिजली के तार, माइक्रोवेव, मोबाइल टावर की वजह से गौरैया खत्म होती जा रही हैं। बचाने के भी उपाय बताये गए हैं। आधुनिक मकानों में कुछ खुली जगहों पर गड्ढेनुमा आकृतियां बनवायें, लकड़ी आदि के बक्सों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं ताकि गौरैया घोसला बना सके। नालियों, सिंक व डस्टबिन में बचे हुए अन्न को बहाने के बजाय खुली जगहों पर रखें जिससे ये पक्षी अपनी भूख मिटा सकें। 

कृष्णकुमार मिश्र का एक लेख है कि किस तरह से लखीमपुर खीरी के ग्राम सरेली के लोगों ने पक्षियों का संरक्षण किया है। बिना संरक्षणवादियों और सरकार की मदद के गांव वाले यह काम सदियों से कर रहे हैं। ओपनबिल स्टार्क प्रजाति के पक्षी सिकोनिडी परिवार के सदस्य हैं। चिड़ियों की यह प्रजाति दो सौ साल से हजारों की संख्या में हर साल यहां आती है और इमली, बरगद, पीपल के पेड़ों पर घोंसला बनाती है। मांसाहारी होने के कारण फसलों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता।

गांव वालों का कहना है कि कोई सौ साल पहले जमींदार बलदेव प्रसाद ने इन पक्षियों को संरक्षण प्रदान किया था। तभी से यह परंपरा कायम है, लेकिन आज जब गांवों में पेड़ों की कटाई हो रही है और तालाब खत्म हो रहे हैं इन पर संकट मंडराने लगा है।

इस साइट पर चिड़ियों के संरक्षण और नेताओं की भूमिका पर अच्छा लेख है। लेखक बताते हैं कि किस तरह इन्दिरा गांधी ने भरतपुर पक्षी विहार में अस्सी चिड़ियों को नाम से पहचाना था। इन्दिरा के इस ज्ञान से अधिकारियों के होश उड़ गए थे। अब नेताओं का हाल यह है कि आठ चिड़ियों का नाम भी बताना मुश्किल हो जाए। नतीजा है कि प्रोजेक्ट टाइगर कागज पर ही बना रहा और बाघ खत्म हो गए। चौदह सौ बाघ बच गए हैं। क्या कभी किसी ने सोचा था कि तितलियों, पक्षियों, घास और अनाज की हमारी अनेक प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। हम कब तक प्रति के इस खजाने को लुटने देंगे।

दुधवा नेशनल पार्क की समस्याओं को भी उजागर किया गया है। राष्ट्रीय उद्यान बनने के बाद पास के ग्रामीणों को वन उपजों से वंचित कर दिया गया। इसके कारण वन तथा वन्यजीवों के संरक्षण से उनका भावनात्मक लगाव खत्म हो गया। वन उपज की चोरी होने लगी और जंगलों के प्रति ग्रामीणों का स्वभाव उग्र हो गया। वन्यजीवों द्वारा मारे गए पालतू पशु का मुआवजा भी कम किया गया। जैसे अगर कोई जंगली पशु बैल को मार देता है तो मुआवजा 2300 रुपये मिलेगा। इतने में नया बैल नहीं खरीद सकते। यहां तक कि गैंडे के कारण जो फसलों को नुकसान पहुंचता है उसका मुआवजा कितना होगा, यही तय नहीं हुआ। वाजिब भरपाई न होने से ग्रामीण अब वन्यजीवों को दुश्मन की निगाह से देखते हैं। इस साइट पर सुल्तान बुलबुल की सुंदर तस्वीर है। अच्छा प्रयास है।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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