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अंग्रेजों के लिए उलझन भी था कुंभ

कुंभ का पहला ब्रिटिश वर्णन 1796 को हरिद्वार में हुए मेले का मिलता है। इस मेले में ब्रिटिश लेखक थॉमस हार्डविक आए थे और एशियाटिक रिसर्च में इस पर विस्तार से लिखा था। उन्होंने इस मेले के विविधतापूर्ण और अव्यवस्थित बतलाया था। उनका कहना था कि मेले में धार्मिक आस्था वाले भी होते हैं, अवसरवादी व्यापारी भी और विभिन्न अखाड़ों के लड़ाकू भी। उन्होंने इसमें नागा साधुओं का भी जिक्र किया था। इस मेले के बारे में उन्होंने अंग्रेज अधिकारी गुसैन से भी बातचीत की थी जिन्होंने यहां आने वाले यात्रियों से कर की वसूली की थी।

इस मेले में उदासी अखाड़े के साधुओं ने हिंसा कर दी थी जिसे कैप्टन मुरी ने सिपाहियों की दो बटालियन के साथ दबाया था। उसने लिखा कि उदासी साधू तलवारे लहराते हुए निकल पड़े थे और रास्ते में जो भी आया वह उनका शिकार बन गया। हार्डविक ने यह भी लिखा है कि मेले में अंग्रेज काफी कम सख्या में थे और गुसैन सबके लिए खलनायक की तरह ही थे। हार्डविक दरअसल सहारनपुर जिले में गए थे जिसमें हरिद्वार आता था। इस जिले को कुछ ही समय पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने मराठों से हासिल किया था।

हरिद्वार के इस कुंभ का यह नाटकीय रूप बाद में कुंभ के बारे में ब्रिटिश सोच का केंद्रीय भाव बन गया। इस घटना का जिक्र सरकारी इतिहासकारों ने गजेटियर में भी किया। सरकर और अखबारों की रपट में तो इसका जिक्र आया ही साथ ही इसे कुंभपर्व महामात्य जैसे ग्रंथ में भी शामिल कर लिया गया।

इसके बाद हरिद्वार कुंभ मेले का जिक्र ईस्ट इंडिया कंपनी के भूगोलशास्त्री कैप्टन फ्रांसिस रैपर ने किया। यह जिक्र भी एशियाटिक रिसर्च में ही छपा था। रैपर ने अपने लेख में लिखा था कि इस बार पूरे इंतजाम हो गए हैं इसलिए 1796 वाली घटना नहीं दोहराई जा सकेगी और 1808 का कुंभ शांति से संपन्न हो जाएगा। इस लेख में रैपर ने 1760 के कुंभ का जिक्र करते हुए बताया कि उस साल शैव और वैष्णव बैरागियों में इससे कहीं भीषण झगड़ा हुआ था और इसमें हजारों वैष्णव मारे गए थे। यह जिक्र भी बताता है कि ब्रिटिशों का कुंभ के बारे में नजरिया क्या बन रहा था। ऐसे किस्सों के सहारे ब्रिटिशर्स की मौजूदगी को भी जायज ठहराया जा रहा था, यह बताया जा रहा था कि अगर ब्रिटिश चले गए तो क्या होगा।

कुंभ मेले जैसे धार्मिक समागमों का प्रबंधन कैसे किया जाए इसे लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी हमेशा उलझन में रही, लेकिन भारत जैसी जगह में ऐसे धर्मिक आयोजनों का क्या महत्व है यह उसे अच्छी तरह पता था। यहां तक कि 1812 के कुंभ मेले में एक मिशनरी को गिरफ्तार करके वापस भेज दिया गया था क्योंकि वह वहां उपदेश दे रहा था। जान चैंबरलिन नाम का यह मिशनरी इससे इतना नाराज हो गया था कि उसने गर्वनर मॉरक्वीज़ आफ हेस्टिंग से इसकी शिकायत कर दी लेकिन गर्वनर ने उसे समझा बुझाकर वापस भेज दिया।
लेकिन बाद में जब साधुओं के आपसी झगड़े कुछ कम हुए तो यह एक शांत मेला माना जाने लगा।

इसके बाद तरह तरह के यात्री और पर्यटक कुंभ मेले की ओर आकर्षित होने लगे। इसके बाद इसका जिक्र कई यूरोपीय लेखकों के यात्रा वृतांत में मिलने लगा। इन वृतांतों में मोटी मोटी जानकारियों और निजी अनुभवों का घालमेल था। वृतांत लिखने वाले सैनिक और सरकारी अधिकरी थे, चर्च के लोग या मिशनरी थे, या वे लोग थे किसी तरह से राज की सेवा के लिए यहां आए थे। इनमें कुछ घुमक्कड़ भी थे जो सदिर्या बिताने के लिए भारत आए थे और गर्मी पड़ने के पहले ही यहां से भाग जाना चाहते थे। इन वृतांतों में गजेटियर, स्थानीय अधिकारियों और अखबारों से मिली जानकारियां भरी हुईं हैं।

इनके चलते कुंभ के बारे में तरह तरह की धारणाएं बन गईं थीं। यहीं वजह है कि 1906 में जब प्रिंस आफ वेल्स भारत की यात्रा पर आए तो इलाहाबाद में कुंभ चल रहा था लेकिन इलाहाबाद को उनके इस यात्रा कार्यक्रम में शमिल नहीं किया गया था। इंडियन पीपुल अखबार ने इसका विरोध किया था। उसने लिखा था कि पूरी दुनिया में ऐसा समागम कहीं नहीं जुटता और प्रिंस को इसे जरूर देखना चाहिए था। हालांकि प्रिंस के साथ भारत आए सिडने लो कुंभ मेले में गए थे और उन्होंने इस पर लिखा भी था। इस मेले में मुख्य स्नान के दिन भगदड़ मच गई थी और दस तीर्थ यात्री भगदड़ में कुचल कर मर गए थे।

इस पर इलाहाबाद के अखबार सिटीजन ने लिखा था कि समस्या की वजह ब्रिटिश सरकार द्वारा मेले के तौर तरीके को न समझ पाना है। अखबार ने पूछा था कि क्या ब्रिटिश अधिकारी भारतीय ज्योतिषी गणनाओं को समझ सकते हैं। उसका तर्क था कि किस समय स्नान का सबसे शुभ मुहूर्त है और भारी भीड़ जमा होगी इसे अधिकारी समझ ही नहीं पाए थे। मेले के बारे में ब्रिटिश समझ का यह सबसे अच्छा उदाहरण है।

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में जब हरिद्वार मेले की सुरक्ष बढ़ाई गई तो इस वजह से और कई दूसरे सामाजिक आर्थिक कारणों से मेले में भीड़ काफी बढ़ने लगी। इससे कई और तरह के खतरे पैदा हुए। भीड़ को संभालना मुश्किल हो गया और हरिद्वार में 1820 के कुंभ मेले में मची भगदड़ में 485 लोगों की जान चली गई। इस पर अपनी रिपोर्ट में वहां मौजूद मजिस्ट्रेट ने लिखा कि यह एक तरह का धार्मिक उन्माद था और सेना या पुलिस की किसी भी संख्या से इसे रोका नहीं जा सकता था।

ऐसी घटनाओं की वजह से कुंभ मेले का भयावह चित्रण भी हुआ। 1840 के कुंभ में जब हैरियेट एशमोर संगम पर गईं तो उन्हें हैरत हुए कि जिस भयानक दृश्य की कल्पना करके वे यहां आईं थी वह कहीं मौजूद ही नहीं था। उन्होंने सुन रखा था कि मेले में डकैती से अपहरण तक कुछ भी हो सकता है। इसी तरह सी एफ गार्डन को वे मगरमच्छ कहीं नहीं दिखाई दिए जो तीर्थयात्रियों को अपना शिकार बनाते थे। उन्होंने इस मेले के दृश्यों पर कईं ड्राइंग भी बनाईं।

लेखिका इतिहासकार हैं

पिलग्रिमेज़ एंड पॉवर से साभार

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