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3 जून, 2020|10:03|IST

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सादगी और पाखंड की राजनीति

क्या सादगी एक पाखंड है? या वह अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने में लगी राजनीति का एक हिस्सा है? या वह ज्यादा सुख-सुविधा में डूब चुके एक राजनीतिक दल को अनुशासित और सक्रिय बनाने और नैतिक बल प्रदान कर जनता के करीब ले जाने का एक प्रयास है? या फिर सादगी उस ब्राह्मणवादी समाजवाद की एक रणनीति है, जो जातिगत और आथिर्क असमानता बरकरार रखते हुए उसे मिटाने का भ्रम पैदा करता है? या वह खबरों से खाली मीडिया के बक्शे में रंग पैदा करने का एक मसाला है?

दरअसल सादगी एक तरह का केमिकल लोचा (रासायनिक असंतुलन) है, जो थोड़ा-बहुत हर सभ्यता के दिमाग में होता रहा है। पर हमारे यहां उसका कुछ ज्यादा ही असर रहा है। यह केमिकल लोचा महात्मा गांधी के दिमाग में ज्यादा ही हो गया था और उन्होंने अपने समय में बहुत सारे लोगों में वह असंतुलन पैदा किया था। इसीलिए जब भी सादगी की बात होती है तो हमें गांधी बहुत याद आते हैं। लेकिन गांधी उस परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं, जो विभिन्न पीरों- फकीरों, साधु-संतों और धर्मगुरु ओं से होते हुए इस देश में बह रही है। इस देश में और दूसरे देशों में भी शाहखर्ची और सादगी दोनों की परंपराएं रही हैं। उनमें हंसी-मजाक और छेड़-छाड़ भी चलती रही है पर वे दोनों एक दूसरे का आदर भी करती रही हैं। क्योंकि एक के बिना दूसरी परंपरा चल ही नहीं सकती।

सादगी के किस्से हर महान व्यक्ति के साथ जोड़े जाते रहे हैं और हर युग में उनकी जरूरत भी पड़ती है। वह किस्से गांधी और उनके अनुयायियों के साथ ही नहीं लिंकन, लेनिन, माओ और हो ची मिन्ह सभी के साथ जुड़े रहे हैं। सादगी सरलता, निर्धनता और धीमेपन में सौंदर्य देख सकती है, लेकिन उसे विपन्नता मानना ठीक नहीं होगा। क्योंकि बेहद सादगी से रहने वालों ने भी विपन्नता को महान कष्ट माना है। सादगी आलस्य भी नहीं है और सादगी का अर्थ गंदगी भी नहीं है। सादगी एक साफ-सुथरा विचार है और विचारशीलता की समर्थ आधारभूमि है। शायद इसीलिए वहां सादे जीवन में ऊंचे विचार की कल्पना की गई है। सादगी एक वैकल्पिक जीवन पद्धति है, जिसका सुमिरन दुख पड़ने पर पूंजीवादी और समाजवादी सभी करते हैं और जिसे सुख पड़ने पर लोग भूल जाना ही ठीक समझते हैं। लेकिन सादगी के विचार और आचरण में हमेशा उतना ही फर्क बना रहता है, जितना किसी भी विचार के साथ होता है। इसी फर्क के नाते सादगी दिखाने वाले सबसे निष्ठावान व्यक्ति को भी ढोंग और आडंबर के आरोप से मढ़ दिया जाता है। महात्मा गांधी जब रेलगाड़ी के तीसरे दर्जे में यात्रा करते थे तो यह कहने वालों की कमी नहीं थी कि उस डिब्बे को उनके अनुयायी खाली करा कर उसी तरह बना देते हैं जैसे वह प्रथम श्रेणी का हो। बाद में जब स्वास्थ्य खराब होने के कारण उनकी बंगाल यात्राओं पर विशेष रेलगाड़ियां चलाई गईं तो लोगों को उलाहना का स्पष्ट मौका मिला।

लेकिन विचार और आचरण की चौड़ी फांक को ज्यादा साफ तरीके से देखना हो तो वह गांधी के जीवन और इस साल अपना शताब्दी वर्ष मना रही उनकी मशहूर किताब ‘हिंद स्वराज’ के बीच देखी जा सकती है। रेलगाड़ी, कचहरी और अस्पताल की जरूरत को खारिज करने वाली इस किताब को लेकर महात्मा गांधी ने एक पाठक की प्रतिक्रिया पर सन् 1939 में अपाठ्य फांक शीर्षक से लिखे लेख में पाखंड की रट लगाने वालों को प्रेरक सामग्री दी है। गांधी ने लिखा--
‘‘मैं आधुनिक ढंग से प्रशिक्षित भारतीय सैनिकों द्वारा अपने घर क्षिप्रता की भावना ले जाने पर चिन्तित होने से बच नहीं पाता हूं। गति जीवन का लक्ष्य नहीं है। अपने कर्तव्य पर पैदल चल कर जाता हुआ मनुष्य कहीं ज्यादा देख पाता है और ज्यादा सच्चई से जी पाता है। ’’
(शिमला जाते हुए रेलगाड़ी में, 25 सितंबर 1939)
 इस पर एक पाठक ने आपत्ति दर्ज कराई कि गांधी खुद तो रेलगाड़ी में सफर करते हुए पत्र लिख रहे हैं और दूसरी तरफ अपने कर्तव्य पर पैदल चलने की सलाह दे रहे हैं। इन बातों में कितना अंतर्विरोध है।

गांधी जी ने इसका बचाव इस तरह से किया:--
‘‘अपने मित्र को यह सूचित करते हुए कि जिस लेख का उन्होंने हवाला दिया है, उसे लिखते समय मैं पूरे होश में था, मैं मजाक से उसका डंक हटा रहा हूं। मैं उस लेख के लिखे जाने की ठीक जगह को बताने से आसानी से बच सकता था।’’
‘‘लेकिन मैं अपने वक्तव्य में एक और विंदु को जोड़ना चाहता था कि पाठक उस विशाल फांक को देख सके, जो मुङो मेरे आदर्श से अलगा रही है अगर मुङो अपने आदर्श की ओर लगातार तेजी से बढ़ना है तो मुङो संसार के सामने अपनी कमजोरियां और विफलताएं रख देना चाहिए, ताकि मैं पाखंड से बच सकूं। और उस शर्म के कारण मैं अपने आदर्श की कोशिश में और लग सकूं। मेरे मित्र ने जिस अंतर्विरोध की ओर इशारा किया है, वह यह भी दर्शाता है कि आदर्श और व्यवहार के बीच हमेशा ही एक न पाटी जा सकने वाली फांक होनी चाहिए। आदर्श आदर्श रहेगा ही नहीं, अगर उसे चरितार्थ करना संभव हो जाए। सुख इस प्रयत्न को करने में है, न कि उसे पूरा कर देने में, क्योंकि हम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए एक से बढ़कर एक सम्मोहक दृश्यों को देख पाते हैं।’’
आज सादगी के विमर्श में शशि थरूर जैसे कुशल लेखक फंस रहे हैं और राहुल गांधी को लाने वाली रेलगाड़ी पर पथराव हो रहा है तो इसके दो प्रमुख कारण हैं। एक तो पिछले बीस सालों में सादगी को पीट-पीट कर ही उदारीकरण और बाजारीकरण की विजय यात्रा निकाली गई है। पवन वर्मा की किताब ‘ग्रेट इंडियन मिडल क्लास’ अगर किसी पर सबसे तीखा हमला करती है तो गांधी की सादगी और ब्रह्मचर्य पर। सादगी की इस पिटाई अभियान में मीडिया और उसमें भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सबसे आगे रहा है। इसलिए आज सादगी पर स्टोरी करने वाले बहुत हैं, पर विचार के स्तर पर उसका बचाव करने वाले नहीं है। लेकिन उससे भी बड़ी कमी उन लोगों के संवाद की है, जो इस अभियान को चला रहे हैं। वे उसे राजनीति के दायरे से बाहर विस्तार ही नहीं दे पा रहे हैं। आज सादगी को पर्यावरण रक्षा, खाद्य सुरक्षा और दरिद्रनारायण के अन्य कामों से जोड़ कर देखे जाने की जरूरत है। अगर सादगी को नई मंजिलें तय करनी हैं तो उसे पढ़े-लिखे लोगों की आलोचना के शब्दबाणों और नासमझ लोगों के पत्थरों से घबरा कर भाग खड़े होने की बजाय अपने सफर के लिए नए साधन तलाशने होंगे।

लेखक हिन्दुस्तान में एसोशिएट एडिटर हैं
atripathi@hindustantimes.com

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