नकल का इलाज

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भारत में परीक्षाओं में होने वाली नकल या अन्य किस्म की धोखाधड़ी बड़ी समस्या है। लेकिन भारतीय थलसेना ने इस समस्या से निपटने का जो तरीका अपनाया, वह चौंकाने वाला है। बिहार के मुजफ्फरपुर में सेना की...

नकल का इलाज

भारत में परीक्षाओं में होने वाली नकल या अन्य किस्म की धोखाधड़ी बड़ी समस्या है। लेकिन भारतीय थलसेना ने इस समस्या से निपटने का जो तरीका अपनाया, वह चौंकाने वाला है।

बिहार के मुजफ्फरपुर में सेना की भर्ती के लिए आए नौजवानों को अंडरवियर के अलावा सारे कपड़े उतारकर लिखित परीक्षा में बैठना पड़ा। परीक्षा लेने वाले सेना के अधिकारियों का कहना था कि पहले हुई ऐसी ही परीक्षा में कुछ उम्मीदवारों ने नकल की कोशिश की थी, इसलिए उन्होंने यह गुंजाइश ही खत्म कर दी कि उम्मीदवार नकल का कोई साधन अपने पास रख सकें। करीब 1,100 परीक्षार्थियों को खुले मैदान में काफी दूर-दूर बिठाया गया था, ताकि आपस में पूछताछ की गुंजाइश भी न रहे।

पिछले वर्ष बिहार में परीक्षाओं के दौरान नकल की कुछ तस्वीरें बहुत चर्चित हुई थीं, शायद उसके बाद सेना ने कोई जोखिम मोल न लेने का फैसला किया होगा, हालांकि सरकार और अदालत ने इस पर आपत्ति करते हुए सैनिक प्रशासन से जवाब-तलब किया है।

परीक्षा में नकल की समस्या नई नहीं है, बल्कि तीन-चार दशक पहले कुछ ज्यादा ही नकल होती थी, खासकर सत्तर और अस्सी के दशक शिक्षा में भारी अराजकता के दशक थे। उन दिनों बिहार व कुछ अन्य राज्यों में परीक्षाओं का होना ही मुहाल था। ऐसा नहीं है कि अब शिक्षा तंत्र से यह बुराई खत्म हो गई है, लेकिन अब परंपरागत नकल से ज्यादा जोर व्यापम जैसे बड़े घोटालों का है, जिसमें प्रतियोगी परीक्षाओं में पास करवाने के लिए बड़े-बड़े गिरोह अनेक स्तरों पर सक्रिय रहते हैं। जाहिर है, व्यापम जैसी परीक्षाओं में सेना का तरीका आजमाना असंभव है और वह बेअसर भी रहेगा, क्योंकि उनमें घोटाला तो परीक्षा दे चुकने के बाद किया जाता है।

स्कूलों, कॉलेजों की आम परीक्षाओं में तो नकल कुटीर उद्योग के स्तर पर होती है, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं में उसने आधुनिक तकनीक और अर्थतंत्र को अपना लिया है। शिक्षा के इस हद तक व्यवसायीकरण और अपराधीकरण होने से इसकी गरिमा किस हद तक कम हो गई है, इसका प्रतीकात्मक रूप हमें सिर्फ अंडरवियर पहने परीक्षार्थियों में दिखाई पड़ता है। सेना का तरीका आपत्तिजनक जरूर कहा जा सकता है, लेकिन हमारे समाज में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता ही इस हद तक पहुंच गई है। एक बड़ी वजह यह भी है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में परीक्षा पर ही सारा जोर रहता है, जबकि नकल का होना ही इसके अविश्वसनीय होने का प्रमाण है।

स्थिति के इस हद तक पहुंचने की वजह यह है कि शिक्षा कभी नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता में नहीं रही और हर सरकार ने शिक्षा पर पैसा खर्च करने में कंजूसी की। इसका नतीजा यह हुआ कि सरकारी शिक्षा प्रणाली जर्जर हो गई, बेलगाम निजी शिक्षा संस्थान खडे़ हो गए और हमने ऐसी नई पीढ़ी तैयार कर ली, जो पढ़ने या काम करने की उम्र में है, लेकिन उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए संस्थान नहीं हैं, और चूंकि अच्छी पढ़ाई नहीं है, इसलिए उसे अच्छा काम मिलने की संभावना कम है। इस वक्त दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी भारत में है, जो पढ़ाई या रोजगार के सीमित अवसरों को झपटने के लिए किसी भी किस्म के तरीके अपनाने को मजबूर है।

अगर एक अच्छा शिक्षा तंत्र नहीं होगा, तो ये करोड़ों युवा देश के निर्माण में सहायक कैसे होंगे? अब भी वक्त है कि हम स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च बढ़ाएं, ताकि हमारी नई पीढ़ी अपनी पूरी संभावनाओं को हासिल कर सके। मुजफ्फरपुर की घटना ने हमें आईना दिखाया है। अगर हम अब भी आंख मूंदे रहते हैं, तो किसी का क्या दोष है?

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