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देशसच्चाई की ओर

लाइव हिन्दुस्तान टीम
Thu, 15 Oct 2015 09:42 PM
सच्चाई की ओर

यह अच्छा फैसला है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए जाएंगे। उम्मीद करनी चाहिए कि इसके बाद नेताजी को लेकर जो अटकलबाजी और कानाफूसी चल रही है, उस पर पूर्ण विराम लग जाएगा। नेताजी की मौत आधुनिक भारत के इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिस पर सबसे ज्यादा अटकलें लगी हैं।

इसकी वजह यह है कि ताइपेई की जिस विमान दुर्घटना में उनकी मौत हुई बताई जाती है, उस पर शुरू से ही संदेह उठाए गए थे। ऐसा नहीं कि उन संदेहों की कोई ठोस वजह थी, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में ऐसी अनेक अफवाहें और षड्यंत्रों की कहानियां चलती रहती थीं। युद्ध के माहौल में उन्हें सत्यापित करना या अंतिम रूप से गलत साबित करना मुश्किल था।

अगर युद्ध के माहौल में ऐसी अटकलबाजी चल रही थी, तो यह समझना जरा मुश्किल है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि आजादी के बाद तमाम सरकारों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं किया। सरकारें इसके लिए कई कारण देती रहीं, लेकिन कोई भी कारण इस बात का ठोस समर्थन नहीं कर सकता कि इतने दिनों तक ये दस्तावेज लोगों की नजरों से दूर रखे जाएं। उस घटनाक्रम में जितने लोग शामिल थे, सब दिवंगत हो गए हैं, तमाम देशों में न जाने कितनी सरकारें बदल चुकी हैं, इसलिए किसी देश से रिश्ते खराब होने जैसे तर्क दमदार नहीं लगते।

नेताजी की मौत का रहस्य क्या है? इसके अलावा इन दस्तावेजों के सार्वजनिक होने से यह भी पता चले सकेगा कि क्यों इतने सालों तक इन दस्तावेजों को गुप्त रखा गया? यह आशंका भी काफी है कि खोदा पहाड़, निकला चूहा जैसी स्थिति हो जाए। पश्चिम बंगाल सरकार ने बड़े दिनों बाद बड़े जोर-शोर से जो दस्तावेज सार्वजनिक किए, उनमें ऐसा कुछ न था, जिससे एक सनसनीखेज खबर भी बन पाती। सिर्फ यह पता चला है कि तब अंग्रेज सरकार को भी शक था कि नेताजी की मौत विमान दुर्घटना में नहीं हुई। कुछ कागजात गायब हैं, लेकिन वे कितने महत्वपूर्ण हैं, यह नहीं कहा जा सकता।

केंद्र सरकार को चाहिए कि वह तमाम कागजात विश्वसनीय ढंग से सार्वजनिक करे, अधूरा रहस्योद्घाटन ज्यादा खतरनाक साबित होगा। अगर कुछ ऐतिहासिक व्यक्तियों पर इससे आंच भी आती है, तो इससे डरना नहीं चाहिए। भारत का लोकतंत्र इतना कमजोर नहीं है कि वह दशकों पहले हुई किसी घटना की सच्चाई से दहल जाए। असत्य और अर्द्धसत्य जितने खतरनाक साबित होते हैं, पूर्ण सत्य उतना खतरनाक कभी नहीं होता। इसके अलावा सच्चाइयां जानने से हमें अपने इतिहास को ठीक से जानने-समझने के साधन मिलते हैं। हम ऐसा देश क्यों बनाएं, जिसे अपने ही इतिहास की ठीक से जानकारी नहीं हो, जो अफवाहों व षड्यंत्र की कहानियों को अपना इतिहास माने।

बल्कि इस मौके का फायदा उठाकर सरकार को दस्तावेज सार्वजनिक करने के लिए एक पारदर्शी और प्रगतिशील व्यवस्था बनानी चाहिए। अगर दस्तावेज किसी को देखने ही नहीं हैं, तो दस्तावेज सहेजने का क्या फायदा? दस्तावेजों को लेकर सरकार की नीति किसी आधुनिक लोकतांत्रिक देश जैसी नहीं है। इतिहासकार यह भी कहते हैं कि भारत में जो विचारधारात्मक और व्याख्या आधारित इतिहास लिखने का चलन है, उसके पीछे एक वजह यह भी है कि इतिहासकारों को तथ्य और दस्तावेज नहीं मिल पाते, जिससे यथासंभव तथ्य आधारित और तटस्थ इतिहास लेखन संभव हो सके। जरूरी है कि नेताजी से संबंधित सारे दस्तावेज पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक हों, और आजादी के आंदोलन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण नेताओं में से एक नेताजी के बारे में सच्चाई स्थापित हो।

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