DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

परीक्षा पर सवाल

भारत की शिक्षा व्यवस्था मूलत: परीक्षा व्यवस्था है, क्योंकि हमारे यहां बच्चों और नौजवानों का आकलन इस या उस परीक्षा पर आधारित होता है और पढ़ाई का एकमात्र उद्देश्य परीक्षा में अच्छे नंबर लाना होता है। ऐसे में, यह बात काफी गंभीर है कि हमारे यहां कई महत्वपूर्ण परीक्षाएं संदिग्ध हो गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में इस साल हुई अखिल भारतीय पीएमटी को रद्द करते हुए सीबीएससी से चार हफ्ते में फिर से परीक्षा करवाने को कहा है। तीन मई को हुई परीक्षा को रद्द करने के लिए कई छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी थी, क्योंकि इस परीक्षा में कई राज्यों में बड़े पैमाने पर धांधलियों और पेपर लीक के आरोप लगे थे। कोर्ट ने इन धांधलियों की जांच कराने और आरोपियों को पकड़ने का भी आदेश दिया है। यह पहली बार नहीं है कि कोई नामी और महत्वपूर्ण परीक्षा इस तरह संदेह के घेरे में आई है। मध्य प्रदेश का व्यावसायिक परीक्षा मंडल घोटाला तो एक ऐसा उदाहरण है, जिसमें कई साल तक लगातार तमाम व्यावसायिक परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर घोटाले होते रहे।

इन घोटालों से यह पता चलता है कि व्यावसायिक परीक्षाओं के पेपर लीक करना या गैर-कानूनी तरीकों से परीक्षा पास करवाना अब छोटे-मोटे और इक्का-दुक्का अपराधों की श्रेणी में नहीं आता, यह संगठित अपराध का स्वरूप ले चुका है, जहां गिरोह कई परीक्षाओं में अपना जाल फैलाते हैं। यह भारत के उन तमाम बच्चों और नौजवानों के प्रति अक्षम्य अपराध है, जिन्हें हम बचपन से यह सिखाते हैं कि पढ़-लिखकर परीक्षा में अच्छे नंबर लाना ही अच्छे भविष्य की चाबी है। अगर इन परीक्षाओं का इतना महत्व है, तो इन्हें ठीक से संचालित करने पर जरूरी ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? जब इस तरह की गड़बड़ी होती है, तो इसकी जवाबदेही किसकी है? जिन लाखों छात्रों ने जी तोड़ मेहनत करके एआईपीएमटी के लिए तैयारी की होगी, उन्हें फिर मेहनत करके परीक्षा देने के लिए जुटना होगा। तमाम छात्र जो 12वीं के बाद उच्च शिक्षा में भर्ती के लिए कोशिश करते हैं, वे कई जगह अर्जियां लगाते हैं और कई जगह परीक्षाएं देते हैं। जो डॉक्टर बनना चाहते हैं, वे दो-तीन जगह तो पीएमटी जरूर देते हैं। अब यह परीक्षा जुलाई में होगी और उसके बाद उसके नतीजे आएंगे, ऐसे में कई छात्र दूसरी जगहों पर प्रवेश ले चुके होंगे।

यह समस्या भी इसलिए पैदा हुई है, क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था 21वीं शताब्दी में है, लेकिन उसके तौर-तरीके 19वीं शताब्दी वाले ही हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था में ज्ञान प्राप्त करने या छात्र की क्षमता व दिलचस्पी पर जोर नहीं है, बल्कि सिर्फ किसी परीक्षा में अच्छे नंबर लाने पर ही जोर होता है। अगर किसी महत्वपूर्ण परीक्षा में किसी कारणवश किसी छात्र के अच्छे नंबर नहीं आ पाए, तो हो सकता है कि उसके जीवन की धारा बदल जाए। किसी एक दिन के खराब प्रदर्शन पर किसी अत्यंत प्रतिभाशाली छात्र को भी किसी अच्छे संस्थान में प्रवेश से वंचित किया जा सकता है। चूंकि सारा जोर सिर्फ नंबरों पर है, इसलिए नंबर पाने के कई जायज और नाजायज तरीके भी ढूंढ़ निकाले गए हैं। कोचिंग सेंटर जायज तरीकों में गिने जा सकते हैं और पेपर लीक करना नाजायज तरीकों में, लेकिन दोनों का ही उद्देश्य छात्र का ज्ञान बढ़ाना नहीं, सिर्फ उसे परीक्षा में अच्छे नंबर दिलवाना है। जिन देशों में छात्रों की योग्यता और ज्ञान के आकलन के लिए बेहतर तरीके अपनाए जाते हैं, वहां परीक्षाओं में धांधली के भी उदाहरण नहीं मिलते। मुश्किल तो यह है कि हमारे देश में शिक्षा में सुधार और उसकी बेहतरी की कोशिशें भी नहीं दिखाई दे रही हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:परीक्षा पर सवाल